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#❤️जीवन की सीख #🙏 प्रेरणादायक विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #गीता #📖जीवन का लक्ष्य🤔
❤️जीवन की सीख - अफलाकाङिक्षभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।  यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ।। जो शास्त्रविशिसे नियत, करना हो कर्तव्य 45 है इस प्रकार मनको समाधान करके॰ फल न चाहने- वाले पुरुपौंद्वारा किया जाता है॰ वह सात्त्विक है I। ११ II अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्। a் fafaa इच्यते भरतश्रेष्ठ तं राजसम्।। परन्तु हे अर्जुन! केवल दम्भाचरणके लिये अथवा फलको भी द्ष्टिमें रखकर जो यज्ञ किया जाता है॰ उस यज्ञको तू राजस সান Il ?২ Il विधिहीनमसृष्टात्रं  मन्त्रहीनमदक्षिणम् | ஸa87 " श्रद्द्वाविरहितं यज्ञं तामसं शास्त्रविधिसे होन, अन्नदानसे रहित, चिना मन्त्रोंके बिना दक्षिणाके और बिना श्रद्धाके किये जानेवाले यज्ञको तामस यज्ञ कहते हैँ II १३ ।। शौचमार्जवम् ।  देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शारीरं সসম্ত্রযসটিমা उच्यते য F और ज्ञानीजनौंका पूजन, देवता, ब्राह्मण, g5? और पवित्रता , ಇಫಾ 317_7 सरलता , शरोर- सम्बन्ध्धी সানা ষ II ?8 Il तप कहा़ अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं 4 4</ स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङमयं तप उच्यते ।। जो उह्वेग न करनेवाला प्रिय और हितकारक &? वेद- शास्त्रोंके a तथा जो यथार्थ भापण पठनका एवं परमेश्वरके नाम-्जपका अभ्यास है वही वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता हैII १५ Il १. यर्हों * गुरु ' शब्दसे माता, पिता, आचार्य और वृर एवं अपनेसे जो किसी प्रकार भी यड़े र्ें॰ ठन सचको समघ्ना चारिये। २. मन और एन्द्रियोंद्वारा जैसा अनुभव किया णो ठोक वैसा 'यधार्थ   भापण ' *। फी कानेका नाफ श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १७ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार अफलाकाङिक्षभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।  यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ।। जो शास्त्रविशिसे नियत, करना हो कर्तव्य 45 है इस प्रकार मनको समाधान करके॰ फल न चाहने- वाले पुरुपौंद्वारा किया जाता है॰ वह सात्त्विक है I। ११ II अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्। a் fafaa इच्यते भरतश्रेष्ठ तं राजसम्।। परन्तु हे अर्जुन! केवल दम्भाचरणके लिये अथवा फलको भी द्ष्टिमें रखकर जो यज्ञ किया जाता है॰ उस यज्ञको तू राजस সান Il ?২ Il विधिहीनमसृष्टात्रं  मन्त्रहीनमदक्षिणम् | ஸa87 " श्रद्द्वाविरहितं यज्ञं तामसं शास्त्रविधिसे होन, अन्नदानसे रहित, चिना मन्त्रोंके बिना दक्षिणाके और बिना श्रद्धाके किये जानेवाले यज्ञको तामस यज्ञ कहते हैँ II १३ ।। शौचमार्जवम् ।  देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शारीरं সসম্ত্রযসটিমা उच्यते য F और ज्ञानीजनौंका पूजन, देवता, ब्राह्मण, g5? और पवित्रता , ಇಫಾ 317_7 सरलता , शरोर- सम्बन्ध्धी সানা ষ II ?8 Il तप कहा़ अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं 4 4</ स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङमयं तप उच्यते ।। जो उह्वेग न करनेवाला प्रिय और हितकारक &? वेद- शास्त्रोंके a तथा जो यथार्थ भापण पठनका एवं परमेश्वरके नाम-्जपका अभ्यास है वही वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता हैII १५ Il १. यर्हों * गुरु ' शब्दसे माता, पिता, आचार्य और वृर एवं अपनेसे जो किसी प्रकार भी यड़े र्ें॰ ठन सचको समघ्ना चारिये। २. मन और एन्द्रियोंद्वारा जैसा अनुभव किया णो ठोक वैसा 'यधार्थ   भापण ' *। फी कानेका नाफ श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १७ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat