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#🪔सावन का पवित्र महीना 🙏 #पौराणिक कथा
प्राचीन काल में जब नैमिषारण्य के पवित्र वन में अनेक महान ऋषि-मुनि एकत्रित हुए, तब उन्होंने महर्षि सूत से पूछा, “हे महामुनि, संसार में ऐसा कौन-सा ज्ञान है जो मनुष्य को धर्म का मार्ग दिखा सके और उसे जीवन के वास्तविक उद्देश्य का बोध करा सके?” महर्षि सूत ने कहा, “हे ऋषियों, सनातन परंपरा में पुराण केवल कथाओं का संग्रह नहीं हैं। इनके भीतर सृष्टि की उत्पत्ति, देवताओं की महिमा, ऋषियों की तपस्या, राजाओं के चरित्र, धर्म-अधर्म का संघर्ष और मनुष्य के कर्मों के गहरे रहस्य बताए गए हैं। इन्हीं महान ग्रंथों को महापुराण कहा जाता है और इनके माध्यम से मनुष्य अपने जीवन को सत्य, धर्म और भक्ति की दिशा में ले जा सकता है।”
महर्षि सूत ने आगे कहा कि जब सृष्टि के आरंभ की कल्पना की जाती है, तब न आज जैसा संसार था, न मनुष्य, न नगर, न पर्वत और न ही जीव-जगत का वह स्वरूप जिसे हम जानते हैं। चारों ओर एक रहस्यमयी अवस्था थी। पुराणों में सृष्टि के आरंभ को अलग-अलग परंपराओं में अलग-अलग प्रकार से वर्णित किया गया है, लेकिन एक बात बार-बार सामने आती है कि समस्त जगत के पीछे एक परम सत्य और दिव्य शक्ति विद्यमान थी। उसी परम तत्व से सृष्टि की व्यवस्था आगे बढ़ी और ब्रह्मा को सृजन, विष्णु को पालन तथा शिव को परिवर्तन और संहार से जुड़े दिव्य कार्यों का दायित्व मिला। महर्षि सूत ने समझाया कि सृष्टि में जन्म, जीवन और परिवर्तन तीनों आवश्यक हैं, क्योंकि बिना परिवर्तन के संसार आगे नहीं बढ़ सकता।
समय के साथ पृथ्वी पर ऋषियों, राजाओं और महान भक्तों का जन्म हुआ। उन्होंने तपस्या, यज्ञ, सेवा और भक्ति के माध्यम से धर्म की स्थापना की। लेकिन जहां धर्म होता है, वहां अधर्म की परीक्षा भी आती है। कभी किसी राजा के भीतर अहंकार जन्म लेता, कभी कोई असुर शक्ति प्राप्त करके देवताओं और मनुष्यों को परेशान करने लगता और कभी स्वयं मनुष्य लोभ, क्रोध और मोह में फंसकर अपने धर्म से दूर हो जाता। तब भगवान और उनके विभिन्न दिव्य स्वरूपों की कथाएं सामने आती हैं। इन कथाओं का उद्देश्य केवल चमत्कार दिखाना नहीं था, बल्कि यह समझाना था कि अधर्म चाहे कितना भी शक्तिशाली दिखाई दे, उसका अंत निश्चित है।
महापुराणों में भगवान विष्णु के अनेक अवतारों की कथाएं भी मिलती हैं। जब पृथ्वी पर धर्म कमजोर पड़ता और अधर्म बढ़ने लगता, तब भगवान अलग-अलग रूपों में प्रकट होकर संतुलन स्थापित करते हैं। कभी वे मत्स्य रूप में ज्ञान और जीवन की रक्षा करते हैं, कभी कूर्म रूप में देवताओं की सहायता करते हैं, कभी वराह रूप में पृथ्वी का उद्धार करते हैं और कभी नरसिंह रूप में अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए प्रकट होते हैं। प्रह्लाद की कथा विशेष रूप से यह संदेश देती है कि सच्ची भक्ति बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती। एक बालक भी विपरीत परिस्थितियों में अपने ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास रख सकता है और उसका विश्वास उसके जीवन की सबसे बड़ी शक्ति बन सकता है।
इसी प्रकार महापुराणों में भगवान शिव की अनेक दिव्य कथाएं आती हैं। उन्हें कभी योगी, कभी नटराज, कभी नीलकंठ, कभी पशुपति और कभी करुणामय महादेव के रूप में वर्णित किया जाता है। समुद्र मंथन के समय जब भयंकर विष निकला और देवता तथा असुर दोनों संकट में पड़ गए, तब भगवान शिव ने लोककल्याण के लिए उस विष को अपने कंठ में धारण किया। इसी कारण वे नीलकंठ कहलाए। यह प्रसंग त्याग और लोककल्याण का प्रतीक माना जाता है। भगवान शिव का संदेश यही है कि सच्ची महानता केवल शक्ति रखने में नहीं, बल्कि उस शक्ति का उपयोग दूसरों की रक्षा के लिए करने में है।
महापुराणों में देवी शक्ति की महिमा भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब असुरों का अत्याचार बढ़ता है और देवताओं की शक्तियां कमजोर पड़ती हैं, तब देवी विभिन्न स्वरूपों में प्रकट होकर अधर्म का सामना करती हैं। कहीं वे दुर्गा हैं, कहीं काली, कहीं पार्वती, कहीं लक्ष्मी और कहीं सरस्वती। उनके अलग-अलग स्वरूप यह समझाते हैं कि शक्ति केवल युद्ध करने वाली ऊर्जा नहीं है। ज्ञान भी शक्ति है, करुणा भी शक्ति है, समृद्धि भी शक्ति है और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस भी शक्ति है।
एक समय ऋषियों ने महर्षि सूत से पूछा, “हे मुनिवर, इन सभी कथाओं में मनुष्य के लिए सबसे बड़ा संदेश क्या है?” महर्षि सूत मुस्कुराए और बोले, “मनुष्य को केवल यह नहीं देखना चाहिए कि कौन-सा देवता कितना शक्तिशाली था। उसे यह देखना चाहिए कि उन कथाओं में धर्म का अर्थ क्या बताया गया है। धर्म केवल पूजा करने का नाम नहीं है। सत्य बोलना, माता-पिता का सम्मान करना, जीवों के प्रति दया रखना, अपने कर्तव्य को ईमानदारी से निभाना, लोभ और अहंकार से बचना तथा कठिन परिस्थिति में भी सही मार्ग पर बने रहना ही धर्म का वास्तविक स्वरूप है।”
उन्होंने आगे कहा कि कर्म का सिद्धांत भी पुराणों का एक महत्वपूर्ण संदेश है। मनुष्य जैसा कर्म करता है, उसके जीवन पर वैसा ही प्रभाव पड़ता है। अच्छे कर्म मन को निर्मल करते हैं और बुरे कर्म मनुष्य को स्वयं अपने भीतर के अंधकार से लड़ने के लिए मजबूर करते हैं। इसलिए किसी व्यक्ति का वास्तविक मूल्य उसके धन, शक्ति या पद से नहीं बल्कि उसके कर्मों और आचरण से निर्धारित होता है। यही कारण है कि पुराणों में महान राजाओं के साथ-साथ साधारण भक्तों की कथाएं भी उतनी ही श्रद्धा से सुनाई जाती हैं।
महर्षि सूत ने अंत में कहा, “हे ऋषियों, संसार बदलता रहेगा। युग बदलेंगे, राजाओं का उत्थान और पतन होगा, नगर बनेंगे और मिटेंगे, लेकिन सत्य, धर्म और भक्ति का महत्व कभी समाप्त नहीं होगा। महापुराणों की कथाएं मनुष्य को बार-बार यही स्मरण कराती हैं कि जीवन क्षणभंगुर है, इसलिए अहंकार के पीछे भागने के बजाय ज्ञान, सेवा और सदाचार का मार्ग अपनाना चाहिए। जब मनुष्य अपने भीतर के लोभ, क्रोध और अहंकार पर विजय प्राप्त कर लेता है, तभी उसके भीतर वास्तविक शांति का जन्म होता है।” इतना कहकर महर्षि सूत ने भगवान का स्मरण किया और नैमिषारण्य का वह पवित्र वातावरण “हरि ॐ”, “हर हर महादेव” और “जय माता दी” के दिव्य उद्घोष से गूंज उठा। यही महापुराणों का सनातन संदेश है कि ईश्वर तक पहुंचने के मार्ग अनेक हो सकते हैं, लेकिन सत्य, करुणा, भक्ति और धर्म का मार्ग मनुष्य को हमेशा प्रकाश की ओर ले जाता है।