sn vyas
603 views 18 hours ago
#पौराणिक कथा #🪔सावन का पवित्र महीना 🙏 महर्षि विश्वामित्र के शिष्य थे गालव। विद्या पूर्ण होने के बाद गालव ने महर्षि विश्वामित्र से बारंबार गुरु-दक्षिणा माँगने का हठ किया। विश्वामित्र जी ने पहले तो मना किया, परंतु गालव के अत्यधिक हठ करने पर परीक्षा लेने के लिए उन्होंने कहा:यदि तुम्हें दक्षिणा देनी ही है, तो मुझे ऐसे ८०० दुर्लभ श्वेत (सफेद) अश्व (घोड़े) लाकर दो, जिनके कान एक तरफ से पूरी तरह काले हों। गालव ऋषि घोर संकट में पड़ गए। पूरे ब्रह्मांड में ऐसे विचित्र घोड़े मिलना असंभव था। वे सहायता के लिए पक्षीराज गरुड़ जी के पास गए। गरुड़ जी उन्हें चक्रवर्ती राजा ययाति के पास ले गए। राजा ययाति के पास वैसे घोड़े नहीं थे, परंतु उन्होंने गालव को अपनी परम सुंदरी और धर्मशीला पुत्री 'माधवी' को सौंप दिया, ताकि गालव उसके विवाह के माध्यम से राजाओं से वे दुर्लभ घोड़े प्राप्त कर सकें। गालव ऋषि ने राजा हर्यश्व, दिवोदास और उशीनर के यहाँ जाकर ६०० ऐसे घोड़े तो जुटा लिए, परंतु अभी भी २०० काले कान वाले सफेद घोड़ों की कमी रह गई थी थक-हारकर गालव ऋषि बदरिकाश्रम के घने वनों में भटकने लगे। वे भूख-प्यास और चिंता से व्याकुल होकर एक शिला पर बैठकर रोने लगे: यदि मैं बचे हुए २०० घोड़े विश्वामित्र जी को न दे सका, तो मेरी गुरु-भक्ति कलंकित हो जाएगी और मैं जीवित नहीं रह पाऊँगा! तभी वहाँ एक अत्यंत दुर्बल, काँपता हुआ और फटेहाल वस्त्र पहने वृद्ध ब्राह्मण आया। उसके पास लकड़ी की एक टूटी लाठी और मिट्टी का कमंडलु था उस वृद्ध ने गालव से पूछा—हे मुनिवर! आप इस निर्जन वन में इस प्रकार क्यों विलाप कर रहे हैं?गालव ने अपनी संपूर्ण व्यथा सुनाई। वृद्ध ने मुस्कुराकर कहा: "हे गालव! चिंता मत करो। मैं तुम्हारे बचे हुए २०० काले कान वाले दुर्लभ अश्वों की व्यवस्था कर दूँगा। परंतु बदले में तुम्हें मुझे एक वचन देना होगा गालव ने तुरंत हाथ जोड़कर कहा—हे विप्रवर! यदि आप मेरी गुरु-दक्षिणा पूरी करा दें, तो आप जो माँगेंगे, मैं अपना शीश भी दे दूँगा वृद्ध ने कहा—"मुझे तुम्हारा शीश नहीं चाहिए। बस इतना वचन दो कि जब तुम्हारे घोड़े मिल जाएँ, तो तुम अपने मन में कभी यह अहंकार नहीं करोगे कि तुमने अपने तपोबल से यह कार्य सिद्ध किया है, और जीवन भर किसी असहाय जीव का अनादर नहीं करोगे। गालव ने सहर्ष प्रतिज्ञा की। तब उस दरिद्र वृद्ध ने अपनी टूटी हुई लाठी से भूमि पर एक रेखा खींची और गंगा-जल का स्मरण करके भूमि पर छिड़का क्षण भर में धरती से एक दिव्य प्रकाश फूटा और वहाँ ठीक २०० अलौकिक श्वेत अश्व, जिनके कान पूरी तरह काले थे, हिनहिनाते हुए प्रकट हो गए गालव ऋषि चकित रह गए। उन्होंने देखा कि वे घोड़े साधारण नहीं, बल्कि दिव्य गंधर्व स्वरूप थे। गालव दौड़कर उन घोड़ों को बाँधने लगे। घोड़े मिलने के उत्साह में गालव ऋषि इतने मग्न हो गए कि वे उस वृद्ध को धन्यवाद देना तक भूल गए और घोड़ों को हांकते हुए आगे बढ़ने लगे तभी मार्ग में एक अत्यंत तीखा काँटा गालव के पैर में चुभा और वे गिर पड़े। पीछे मुड़कर देखा तो वह वृद्ध ब्राह्मण उसी जगह शांत खड़ा मुस्कुरा रहा था गालव को तुरंत अपनी भूल और उस वृद्ध के दिए वचन का स्मरण हुआ। उन्हें अपनी कृतघ्नता पर घोर पश्चाताप हुआ। वे रोते हुए उस वृद्ध के चरणों में गिर पड़े: हे प्रभु! मुझे क्षमा करें। मैं घोड़ों को पाकर अपनी मर्यादा और आपको धन्यवाद देना भूल गया। आप कोई साधारण वृद्ध नहीं हैं। कृपा करके अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट कीजिए उसी क्षण वह फटेहाल वृद्ध अंतर्ध्यान हो गया और उनके स्थान पर चतुर्भुज रूप में, शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण किए साक्षात बद्रीनारायण (भगवान विष्णु) प्रकट हो गए! "हे गालव! मैं तुम्हारी गुरु-भक्ति से प्रसन्न था, परंतु तुम्हारे भीतर सूक्ष्म रूप से यह अहंकार आ रहा था कि तुम अपने दम पर गुरु-दक्षिणा पूरी कर रहे हो। इसलिए मैंने यह दरिद्र रूप धरकर तुम्हें यह सिखाया कि संसार में किसी भी कार्य की सिद्धि केवल प्रभु-कृपा से होती है, मनुष्य के अहंकार से नहीं भगवान ने गालव को आशीर्वाद दिया। गालव ने विश्वामित्र जी को ८०० अश्व समर्पित करके अपनी गुरु-दक्षिणा पूर्ण की और परम सिद्धि को प्राप्त किया। !! जय श्री कृष्णा!!
12 likes
11 shares

More like this