#पौराणिक कथा
भगवान श्रीकृष्ण का मोहिनी रूप और अरावन की कथा
महाभारत से जुड़ी अनेक अद्भुत कथाएँ प्रचलित हैं। उन्हीं में से एक अत्यंत विलक्षण कथा है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने मोहिनी रूप धारण करके एक राजकुमार से विवाह किया। यही कथा आज भी दक्षिण भारत में किन्नर समाज की आस्था का प्रमुख आधार है।
महाभारत के अनुसार, एक बार अर्जुन को एक प्रतिज्ञा के उल्लंघन के कारण इंद्रप्रस्थ छोड़कर तीर्थयात्रा पर जाना पड़ा। अपनी यात्रा के दौरान वे उत्तर-पूर्व भारत पहुँचे, जहाँ उनकी भेंट नागकन्या उलूपी से हुई। उलूपी अर्जुन पर मोहित हो गईं और दोनों का विवाह हुआ। समय आने पर उनके यहाँ एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम अरावन (इरावन) रखा गया।
अर्जुन आगे अपनी यात्रा पर निकल गए और अरावन अपनी माता के साथ नागलोक में ही बड़ा हुआ। युवावस्था प्राप्त करने पर वह अपने पिता अर्जुन के पास आया। उस समय कुरुक्षेत्र का महायुद्ध चल रहा था। अर्जुन ने अरावन को भी पांडवों की ओर से युद्ध में सम्मिलित होने के लिए भेज दिया।
युद्ध के दौरान पांडवों को विजय प्राप्ति हेतु देवी काली को एक वीर राजकुमार की बलि देने की आवश्यकता बताई गई। कोई भी राजकुमार इस बलिदान के लिए तैयार नहीं हुआ। तब अरावन स्वयं आगे आया, किन्तु उसने एक शर्त रखी—वह अविवाहित अवस्था में मृत्यु नहीं चाहता था। इसलिए उसने बलि से पूर्व विवाह करने की इच्छा व्यक्त की।
पांडवों ने उसकी शर्त स्वीकार कर ली, परंतु कोई भी राजा अपनी पुत्री का विवाह अरावन से करने को तैयार नहीं हुआ, क्योंकि विवाह के तुरंत बाद उसकी बलि दी जानी थी और कन्या तत्काल विधवा हो जाती।
तब भगवान श्रीकृष्ण ने इस समस्या का समाधान किया। उन्होंने अपना दिव्य मोहिनी रूप धारण किया और अरावन से विवाह किया। इस प्रकार अरावन की अंतिम इच्छा पूर्ण हुई।
विवाह के अगले दिन अरावन ने देवी काली के चरणों में अपना बलिदान अर्पित कर दिया। अरावन की मृत्यु के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण मोहिनी रूप में उसकी पत्नी की भाँति विलाप करने लगे और उसके अंतिम संस्कार की सभी विधियाँ संपन्न कीं।
इसी घटना की स्मृति में दक्षिण भारत का किन्नर समुदाय अरावन को अपना आराध्य देव मानता है। विशेष रूप से तमिलनाडु में अरावन की पूजा बड़े श्रद्धाभाव से की जाती है। वहाँ किन्नरों को "अरावनी" भी कहा जाता है।
तमिलनाडु के विल्लुपुरम जिले के कूवगम गाँव में स्थित अरावन का प्राचीन मंदिर इस परंपरा का मुख्य केंद्र है। प्रत्येक वर्ष तमिल नववर्ष के समय यहाँ लगभग अठारह दिनों तक भव्य उत्सव मनाया जाता है।
उत्सव के दौरान देश-विदेश से हजारों किन्नर कूवगम पहुँचते हैं। सत्रहवें दिन विशेष पूजा के पश्चात अरावन के नाम का मंगलसूत्र (थाली) किन्नरों को पहनाया जाता है और प्रतीकात्मक रूप से उनका विवाह अरावन से कराया जाता है। अगले दिन अरावन की प्रतिमा का विशाल जुलूस निकाला जाता है। जुलूस के पश्चात प्रतिमा का विसर्जन या प्रतीकात्मक विघटन किया जाता है। इसके साथ ही किन्नरों के मंगलसूत्र उतार दिए जाते हैं और वे श्वेत वस्त्र धारण कर अरावन की पत्नी के रूप में शोक व्यक्त करते हैं।
यह परंपरा आज भी श्रद्धा और भक्ति के साथ निभाई जाती है और अरावन की स्मृति को जीवित रखती है।
नोट: यह कथा मुख्यतः दक्षिण भारतीय लोक-परंपराओं, विशेषकर तमिल परंपरा और कूवगम उत्सव से संबंधित है। महाभारत के विभिन्न संस्करणों और लोककथाओं में इसके विवरण में कुछ भिन्नताएँ मिलती हैं।


