sn vyas
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#पौराणिक कथा
इस कथा को खूब मन से पढ़े :
प्राचीन काल में 'क्षुप' नाम के एक अत्यंत शक्तिशाली और धर्मनिष्ठ राजा हुए, जो ब्रह्मा जी के पुत्र 'रुचि' के वंशज थे। वहीं दूसरी ओर, 'दधीचि' महर्षि भृगु के पौत्र और ऋषि अथर्वा के पुत्र थे। वे अत्यंत तपस्वी, निष्पाप और साक्षात वेद-ज्ञान के पुंज थे।
प्रारंभ में राजा क्षुप और महर्षि दधीचि के बीच अटूट मित्रता थी। दोनों प्रायः एक-दूसरे के आश्रम व महल में आया-जाया करते थे और धर्म-चर्चा करते थे।
एक बार राजसभा में अनेक ऋषियों और मंत्रियों के सामने राजा क्षुप और महर्षि दधीचि में श्रेष्ठता को लेकर बहस छिड़ गई:
राजा क्षुप अपने राजसी वैभव के मद में बोले—हे ऋषिवर! शास्त्रों में राजा को आठों लोकपालों (इंद्र, अग्नि, यम, सूर्य, वरुण, वायु, कुबेर, चंद्रमा) के अंश से निर्मित माना गया है। राजा ही प्रजा का रक्षक है और राजा के भय से ही धर्म टिका है। इसलिए राजा वर्णों में सबसे श्रेष्ठ है और ब्राह्मणों को भी राजा का आदर करना चाहिए।
दधीचि जी ने अत्यंत शांत किंतु दृढ़ स्वर में कहा—हे राजन्! आपका विचार गलत है। राजा का कार्य केवल भौतिक राज्य की सुरक्षा करना है, परंतु ब्राह्मण (ऋषि) अपने तपोबल, त्याग और वेदों के ज्ञान से संपूर्ण ब्रह्मांड का मार्गदर्शन करते हैं। राजा तो स्वयं ऋषियों के आशीर्वाद से सत्ता पाता है। इसलिए 'ज्ञान और तपोबल' सदा सत्ता और धनबल से ऊपर होता है।
तर्क-वितर्क इतना बढ़ा कि राजा क्षुप आपा खो बैठे। उन्होंने अहंकार में आकर अपना वज्र जैसा हाथ उठाकर महर्षि दधीचि के मस्तक पर भयंकर प्रहार कर दिया दधीचि जी ने भी प्रत्युत्तर में अपनी मुट्ठी बाँधकर राजा क्षुप की छाती पर ऐसा मुक्का मारा कि राजा मूर्छित होकर सिंहासन से नीचे गिर पड़े मूर्छा से उठते ही राजा क्षुप अत्यंत क्रोधित हुए। उन्होंने अपनी तीखी तलवार निकाली और क्षण भर का विचार किए बिना महर्षि दधीचि का मस्तक काट दिया। दधीचि जी का शरीर कटकर दो टुकड़ों में धरती पर गिर पड़ा।
मरते-मरते महर्षि दधीचि ने अपने आध्यात्मिक बल से दैत्यगुरु शुक्राचार्य का ध्यान किया। शुक्राचार्य जी भगवान शिव की उग्र तपस्या करके 'संजीवनी विद्या' (मृतक को जीवित करने का ज्ञान) प्राप्त कर चुके थे शुक्राचार्य जी तुरंत वहाँ प्रकट हुए। उन्होंने दधीचि के कटे हुए मस्तक और धड़ को आपस में जोड़ा और संजीवनी मंत्र का जप करके महर्षि दधीचि को पुनः जीवित कर दिया।
जीवित होने पर दधीचि जी फिर से क्षुप से युद्ध करने जाने लगे, परंतु शुक्राचार्य जी ने उन्हें रोक लिया और कहा:
"हे दधीचि! राजा क्षुप ने भगवान विष्णु की कठिन तपस्या की है और विष्णु जी उनकी रक्षा करते हैं। जब तक तुम्हारे पास भगवान शिव का अजेय तपोबल नहीं होगा, तुम विष्णु के भक्त को परास्त नहीं कर सकोगे। इसलिए तुम वन में जाकर साक्षात भगवान शिव की शरण लो।
शुक्राचार्य का उपदेश मानकर महर्षि दधीचि घने वन में चले गए। वहाँ उन्होंने पार्थिव (मिट्टी का) शिवलिंग बनाकर 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का निरंतर जप और घोर तपस्या की।
दधीचि की निष्काम और उग्र भक्ति से प्रसन्न होकर साक्षात भगवान आशुतोष (शिव) भगवती पार्वती के साथ प्रकट हुए और बोले—"हे मुनिश्रेष्ठ! मैं तुम्हारी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूँ, मनोवांछित वर माँगो।"
दधीचि जी ने हाथ जोड़कर तीन वरदान माँगे:
मेरी हड्डियां (अस्थियाँ) वज्र से भी अधिक कठोर हो जाएँ, जिस पर संसार का कोई भी अस्त्र-शस्त्र प्रहार न कर सके।
मुझे देवताओं, दैत्यों, नागों या मनुष्यों में से कोई भी पराजित न कर सके।
मेरे जीवन में कभी दीनता (लाचारी या बेबसी) न आए।
भगवान शिव ने "एवमस्तु" (ऐसा ही हो) कहा और अंतर्ध्यान हो गए।
शिव जी से वरदान पाकर महर्षि दधीचि सीधे राजा क्षुप के महल पहुँचे। उन्होंने राजा के मस्तक पर अपने पैर से प्रहार किया।
क्रोधित होकर राजा क्षुप ने दधीचि पर अनेक दिव्य अस्त्र, तोमर और बाण चलाए, परंतु दधीचि के शरीर से टकराते ही सारे अस्त्र-शस्त्र खिलौनों की तरह टूटकर गिर पड़े जब राजा क्षुप को समझ आया कि वे अपनी शक्ति से दधीचि को नहीं हरा सकते, तो वे बैकुंठ पहुँचे और अपने इष्ट भगवान श्रीविष्णु की शरण में जाकर रोने लगे।
भगवान विष्णु ने अपनी अंतर्दृष्टि से देखा कि दधीचि को भगवान शिव का अभेद्य वरदान प्राप्त है। श्रीविष्णु ने राजा क्षुप से कहा—"हे राजन्! शिव-भक्त दधीचि को कोई पराजित नहीं कर सकता। परंतु तुमने मेरी शरण ली है, इसलिए मैं तुम्हारा मान रखने के लिए स्वयं युद्ध-स्थल पर चलूँगा।
भगवान विष्णु एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण करके महर्षि दधीचि के पास पहुँचे और उनसे दान में 'अभय' (जीवन-रक्षा) माँगने लगे।
दधीचि जी अंतर्यामी थे। उन्होंने मुस्कुराकर कहा:
"हे जनार्दन! आप अपने भक्त क्षुप की रक्षा के लिए वृद्ध ब्राह्मण का छद्म रूप धारण करके आए हैं? आप तो साक्षात भगवान विष्णु हैं। आपको रूप बदलने की आवश्यकता नहीं है, आप जो चाहें मुझसे साक्षात माँग सकते हैं। मैं शिव-कृपा से पूरी तरह निर्भय हूँ।
भगवान विष्णु अपने दिव्य चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए। जब दधीचि ने राजा क्षुप के समक्ष झुकने से मना कर दिया, तो भगवान विष्णु ने दधीचि को डराने और राजा की प्रतिज्ञा रखने के लिए युद्ध शुरू कर दिया।
भगवान विष्णु ने अपने दाहिने हाथ में अत्यंत उग्र और प्रज्वलित 'सुदर्शन चक्र' धारण किया और उसे महर्षि दधीचि पर चला दिया।
सुदर्शन चक्र प्रलय की अग्नि उगलता हुआ तेज़ी से महर्षि दधीचि की छाती की ओर बढ़ा। परंतु जैसे ही वह चक्र दधीचि के शरीर के पास पहुँचा, भगवान शिव के दिए वरदान के कारण सुदर्शन चक्र की धार कुंठित (ठिठक) हो गई! वह चक्र दधीचि का एक बाल भी बाँका न कर सका और उनके चरणों में गिर पड़ा।
इसके बाद भगवान विष्णु ने अपना अत्यंत भयानक 'वैष्णवास्त्र' और ब्रह्मा जी का 'ब्रह्मास्त्र' चलाया, परंतु महर्षि दधीचि के तपोबल की प्रचंड ज्वाला के सामने सारे दिव्य अस्त्र-शस्त्र जलकर शांत हो गए।
तभी दधीचि के तपोबल से अनेक शिवदूत और शक्तियाँ प्रकट हो गईं, जिससे पूरी सेना भयभीत हो गई।
जब युद्ध भयंकर रूप लेने लगा, तब साक्षात ब्रह्मा जी वहाँ प्रकट हुए। उन्होंने भगवान विष्णु और महर्षि दधीचि दोनों को शांत किया।
ब्रह्मा जी ने राजा क्षुप से कहा:
"हे क्षुप! तुम्हारा यह अहंकार व्यर्थ है कि राजा सबसे बड़ा होता है। देखो, साक्षात श्रीविष्णु के अस्त्र भी दधीचि के तपोबल के सामने निष्फल हो गए। ज्ञान, त्याग और शिव-भक्ति से बढ़कर इस संसार में कोई सत्ता नहीं है। तुम्हें महर्षि दधीचि से क्षमा माँगनी चाहिए।
राजा क्षुप का सारा अभिमान चूर-चूर हो गया। वे तुरंत दधीचि जी के चरणों में गिर पड़े और अश्रु बहाते हुए क्षमा माँगने लगे।
परम दयालु महर्षि दधीचि ने राजा क्षुप को उठाकर अपने हृदय से लगा लिया। उन्होंने कहा—"हे राजन्! मेरा आपसे कोई व्यक्तिगत वैर नहीं था, मैं केवल सत्य की रक्षा कर रहा था दोनों मित्रों का पुराना प्रेम पुनः लौट आया और राजा क्षुप ने दधीचि जी को अपना गुरु स्वीकार किया। !!जय श्री कृष्णा!!
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