sn vyas
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#पौराणिक कथा
उद्धार की कथा
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बहुत समय पहले गोकुल की पवित्र भूमि पर एक ऐसा राक्षस आया, जिसकी शक्ति देखकर बड़े-बड़े योद्धा भी भयभीत हो जाते। उसका नाम था तृणावर्त। वह केवल एक साधारण असुर नहीं था, बल्कि वायु और भयंकर बवंडर की मायावी शक्ति से संपन्न था। जब वह अपनी शक्ति का प्रयोग करता, तो देखते ही देखते आकाश धूल से भर जाता, सूर्य तक दिखाई देना बंद हो जाता और चारों ओर ऐसा अंधकार छा जाता मानो दिन के बीच रात उतर आई हो। लेकिन तृणावर्त को अपनी शक्ति पर इतना घमंड था कि वह स्वयं को अजेय समझता था। कंस ने उसे गोकुल भेजते हुए आदेश दिया था कि किसी भी तरह नंदलाल श्री कृष्ण को अपने साथ ले आए। तृणावर्त के मन में एक ही विचार था कि वह उस नन्हे बालक को गोकुल से हमेशा के लिए दूर ले जाएगा और कंस के सामने अपनी शक्ति का प्रमाण देगा।
उधर गोकुल में सब कुछ सामान्य था। माता यशोदा अपने नन्हे कृष्ण को गोद में लेकर दुलार रही थीं। कभी उनके गाल चूमतीं, कभी उनके बालों को सहलातीं और कभी उनकी मनमोहक मुस्कान देखकर स्वयं हंसने लगतीं। नन्हे कृष्ण भी अपनी चंचल आंखों से कभी माता को देखते तो कभी आसपास खेलते ग्वाल-बालों की ओर मुस्कुराते। किसी को भी अंदाजा नहीं था कि कुछ ही क्षणों में गोकुल पर एक भयंकर संकट आने वाला है।
अचानक माता यशोदा को महसूस हुआ कि कृष्ण का शरीर असाधारण रूप से भारी होता जा रहा है। उन्होंने सोचा कि शायद बालक को नीचे बैठाना उचित होगा। उन्होंने प्रेम से कृष्ण को भूमि पर बैठाया और घर के कुछ काम में लग गईं। उसी समय दूर आकाश में एक भयंकर गर्जना सुनाई दी। देखते ही देखते तेज हवाएं चलने लगीं। धूल के गुबार उठने लगे और कुछ ही क्षणों में पूरा गोकुल एक विशाल बवंडर की चपेट में आ गया।
लोग अपनी आंखें तक नहीं खोल पा रहे थे। पेड़ जोर-जोर से हिलने लगे। घरों के दरवाजे और खिड़कियां तेज हवा से कांपने लगीं। पशु इधर-उधर भागने लगे और गोकुलवासी अपने बच्चों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाने लगे। चारों ओर केवल धूल, अंधकार और तेज हवाओं का शोर था। इसी भयंकर बवंडर के बीच तृणावर्त ने अपना मायावी रूप धारण किया और अवसर पाते ही नन्हे कृष्ण को उठा लिया।
तृणावर्त कृष्ण को लेकर तेजी से आकाश की ओर बढ़ने लगा। वह इतना ऊपर उड़ गया कि कुछ ही क्षणों में गोकुल नीचे बहुत छोटा दिखाई देने लगा। उसके मन में अहंकार भर गया। वह सोचने लगा कि अब इस बालक को कोई नहीं बचा सकता। उसने कल्पना की कि कंस के पास जाकर वह गर्व से बताएगा कि उसने गोकुल के सबसे प्रिय बालक को अपनी शक्ति से उठा लिया है।
लेकिन तृणावर्त यह नहीं जानता था कि जिसे वह अपनी शक्ति का शिकार समझकर आकाश में ले जा रहा है, वही स्वयं समस्त ब्रह्मांड का आधार है। अचानक श्री कृष्ण का शरीर भारी होने लगा। पहले तृणावर्त को लगा कि शायद यह उसका भ्रम है। उसने अपनी गति बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन कृष्ण का भार लगातार बढ़ता गया। कुछ ही क्षणों में ऐसा लगने लगा मानो उसने अपनी बाहों में कोई विशाल पर्वत उठा लिया हो।
तृणावर्त की सांसें तेज हो गईं। उसने पूरी शक्ति लगा दी, लेकिन कृष्ण का भार कम होने के बजाय और बढ़ता चला गया। अब वह न तो ऊपर उड़ पा रहा था और न ही नीचे लौट पा रहा था। उसका सारा अहंकार भय में बदल गया। जिस बालक को वह अपने नियंत्रण में समझ रहा था, वही अब उसकी सारी शक्ति को निष्फल कर रहा था।
तभी श्री कृष्ण ने अपनी दिव्य लीला दिखाई। नन्हे कृष्ण ने अपने छोटे-छोटे हाथ तृणावर्त के गले के चारों ओर डाल दिए। तृणावर्त बुरी तरह छटपटाने लगा। उसने कृष्ण को हटाने का प्रयास किया, लेकिन उसकी सारी शक्ति जैसे समाप्त हो चुकी थी। वह समझ चुका था कि उसके सामने कोई साधारण बालक नहीं है। उसकी गति रुक गई और उसका मायावी बवंडर भी धीरे-धीरे शांत होने लगा।
कुछ ही समय बाद तृणावर्त अपनी शक्ति खो बैठा और अपने वास्तविक राक्षसी रूप में आकाश से नीचे गिर पड़ा। उसका विशाल शरीर गोकुल की भूमि पर आ गिरा। चारों ओर सन्नाटा छा गया। लेकिन जिस नन्हे बालक को वह अपने साथ लेकर गया था, वही श्री कृष्ण उसके ऊपर पूरी तरह सुरक्षित बैठे हुए थे।
उधर माता यशोदा अपने लाल को खोजते हुए व्याकुल हो चुकी थीं। उन्हें कृष्ण कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे। वह बार-बार उनका नाम लेकर पुकार रही थीं। गोकुलवासी भी चारों ओर खोजने लगे। तभी अचानक उन्हें तृणावर्त का विशाल शरीर दिखाई दिया। सभी लोग उस ओर दौड़े और वहां का दृश्य देखकर स्तब्ध रह गए।
माता यशोदा ने जैसे ही कृष्ण को सुरक्षित देखा, उनकी आंखों से आंसू बहने लगे। वह दौड़कर अपने लाल को गोद में उठा लेती हैं और उन्हें अपने सीने से लगा लेती हैं। कृष्ण बिल्कुल शांत थे, जैसे कुछ हुआ ही न हो। माता यशोदा बार-बार उन्हें देखतीं और अपने हृदय से लगाकर भगवान को धन्यवाद देतीं कि उनका लाल सुरक्षित है।
गोकुलवासियों को समझ नहीं आ रहा था कि इतना विशाल और शक्तिशाली असुर एक छोटे से बालक के सामने कैसे पराजित हो गया। लेकिन देवताओं के लिए यह रहस्य नहीं था। वे जानते थे कि गोकुल में खेलता हुआ यह नन्हा बालक कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि स्वयं भगवान श्री कृष्ण हैं। आकाश से देवताओं ने पुष्पों की वर्षा की और उनकी इस दिव्य लीला का गुणगान किया।
तृणावर्त को अपनी शक्ति पर बहुत घमंड था। उसे लगता था कि उसकी गति, उसका मायावी बवंडर और उसका विशाल बल उसे अजेय बना देते हैं। लेकिन श्री कृष्ण ने बिना किसी बड़े अस्त्र-शस्त्र के केवल अपनी दिव्य शक्ति से उसके अहंकार का अंत कर दिया। यह कथा केवल एक राक्षस के वध की कहानी नहीं है, बल्कि यह संदेश देती है कि कितना भी बड़ा संकट क्यों न हो और सामने वाला कितना भी शक्तिशाली क्यों न दिखाई दे, सच्ची शरण और विश्वास के सामने अहंकार टिक नहीं सकता।
गोकुल में उस दिन फिर से उत्सव जैसा वातावरण बन गया। लोग कृष्ण के दर्शन करने लगे और माता यशोदा उन्हें अपनी गोद से नीचे ही नहीं उतारना चाहती थीं। नंद बाबा और सभी ग्वाल-बाल भी कृष्ण को देखकर प्रसन्न हो गए। किसी को यह समझ नहीं आ रहा था कि उनका नन्हा कान्हा बार-बार ऐसे संकटों से कैसे बच जाता है। लेकिन श्री कृष्ण अपनी बाल लीलाओं से सबके हृदय में प्रेम भरते रहे।
तृणावर्त की कथा हमें यह भी सिखाती है कि शक्ति का वास्तविक अर्थ दूसरों को डराना नहीं, बल्कि धर्म और निर्दोषों की रक्षा करना है। अहंकार चाहे कितना भी ऊंचा उड़ जाए, उसे एक दिन सत्य के सामने झुकना ही पड़ता है। तृणावर्त आकाश की ऊंचाइयों तक पहुंच गया था, लेकिन उसका घमंड उसे बचा नहीं सका। वहीं नन्हे कृष्ण ने दिखा दिया कि भगवान की शक्ति उम्र, आकार या बाहरी रूप से नहीं पहचानी जाती।
इस प्रकार श्री कृष्ण ने गोकुल को एक और बड़े संकट से बचाया और तृणावर्त जैसे मायावी असुर का अंत कर दिया। माता यशोदा के लिए उनका कान्हा आज भी वही नन्हा बालक था जिसे वह अपनी गोद में लेकर दुलारना चाहती थीं, लेकिन देवताओं के लिए वही बालक समस्त सृष्टि के पालनकर्ता थे। यही तो श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सबसे अद्भुत रहस्य है—वह स्वयं अनंत शक्ति के स्वामी होकर भी अपने भक्तों के बीच एक नन्हे, चंचल और प्यारे बालक की तरह खेलते हैं।
जय श्री कृष्ण।
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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