sn vyas
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#पौराणिक कथा जनकपुर (मिथिला) में 'बहुलाश्व' नाम के एक अत्यंत धर्मनिष्ठ और प्रतापी राजा राज्य करते थे। वे भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे। उसी नगर में 'श्रुतदेव' नाम के एक अत्यंत निर्धन, शांत और संतोषी ब्राह्मण रहते थे। श्रुतदेव जी की स्थिति यह थी कि वे कभी किसी से कुछ माँगते नहीं थे। प्रारब्ध से जो स्वतः मिल जाता, उसी में अपनी पत्नी के साथ भगवान का भोग लगाकर जीवन व्यतीत करते थे। टूटी हुई झोपड़ी, फटे वस्त्र, परंतु हृदय में निरंतर श्रीकृष्ण का ध्यान रहता था। एक बार भगवान श्रीकृष्ण अपने प्रिय सखा अर्जुन और कई महर्षियों (व्यास, नारद, और कश्यप आदि) के साथ जनकपुर पधारे। जब राजा बहुलाश्व और दरिद्र श्रुतदेव को पता चला कि साक्षात भगवान पधारे हैं, तो दोनों अत्यंत आनंदित हुए और दोनों ने एक ही समय पर हाथ जोड़कर प्रभु से अपने-अपने घर पधारने की प्रार्थना की।भगवान श्रीकृष्ण ने दोनों भक्तों का निष्काम प्रेम देखा। किसी एक को मना करके उसका दिल दुखाना प्रभु को स्वीकार नहीं था। इसलिए भगवान ने अपनी योगमाया का प्रयोग किया: भगवान ने अपने दो समान रूप धारण कर लिए एक रूप से वे राजा बहुलाश्व के साथ उनके स्वर्ण-भवन की ओर चले दूसरे रूप से वे ब्राह्मण श्रुतदेव के साथ उनकी टूटी झोपड़ी की ओर चले। मजे की बात यह थी कि राजा को लगा प्रभु केवल उनके यहाँ आए हैं, और श्रुतदेव को लगा प्रभु केवल उनके यहाँ आए हैं! राजा ने प्रभु को रत्नजटित सिंहासन पर बिठाया। सोने के बर्तनों में छप्पन भोग अर्पित किए, दिव्य इत्र छिड़का और बहुमूल्य वस्त्र-आभूषण भेंट किए। श्रुतदेव जी के पास न तो बैठने के लिए सुंदर आसन था और न ही देने के लिए छप्पन भोग। उन्होंने चटाई बिछाकर प्रभु को बिठाया। मिट्टी के पात्र में कुएँ का शीतल जल लाकर प्रभु और ऋषियों के पाँव धोए और उस जल को अपने पूरे परिवार के मस्तक पर छिड़का। फिर जंगलों से लाए हुए फल और सुखाया हुआ अन्न ही अत्यंत प्रेम से परोस दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने दोनों स्थानों पर एक ही समय में भोजन ग्रहण किया। परंतु श्रुतदेव जी की टूटी झोपड़ी में प्रभु इतने प्रसन्न हुए कि वे अश्रु पूरित नेत्रों से बोले: "हे श्रुतदेव! तुम्हारे इस निष्काम प्रेम, संतोष और भक्ति ने मुझे पूरी तरह से खरीद लिया है। राजा ने मुझे अपना वैभव दिया, परंतु तुमने मुझे अपना संपूर्ण हृदय दे दिया। ज्ञानी, राजा या तपस्वी होना बड़ा नहीं है, सच्चा बड़ा वह है जिसके पास 'संतोष' और 'निष्कपट भक्ति' है।" भगवान ने दोनों भक्तों को अलौकिक ज्ञान देकर अंत में वैकुंठ का परम पद प्रदान किया। !! जय श्री कृष्णा!!
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