sn vyas
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#पौराणिक कथा #भक्ति पौराणिक कथा उज्जयिनी नगरी में महर्षि सांदीपनि का एक अत्यंत पवित्र गुरुकुल था, जहाँ दूर-दूर के राजकुमार, ऋषिपुत्र और ब्राह्मण बालक ज्ञान प्राप्त करने आते थे। एक दिन उसी गुरुकुल में नंदनंदन श्रीकृष्ण और बलराम भी साधारण विद्यार्थियों के रूप में पहुँचे। यद्यपि वे स्वयं परमात्मा के अवतार थे, फिर भी उन्होंने गुरु के समक्ष पूर्ण विनम्रता के साथ शिष्य धर्म निभाया। महर्षि सांदीपनि ने उन्हें वेद, वेदांग, धनुर्वेद, शास्त्र, अस्त्र-विद्या तथा चौंसठ कलाओं का ज्ञान देना आरम्भ किया। आश्चर्य की बात यह थी कि जिस विद्या को सीखने में सामान्य मनुष्य को वर्षों लग जाते थे, उसे दोनों भाइयों ने मात्र चौंसठ दिनों और रातों में पूर्णतः आत्मसात कर लिया। गुरु सांदीपनि यह देखकर समझ गए कि उनके सामने बैठे ये दोनों बालक कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि दिव्य शक्ति से युक्त हैं। समय आने पर शिक्षा पूर्ण हुई। विदाई का क्षण आया तो श्रीकृष्ण और बलराम ने गुरु के चरणों में प्रणाम कर अत्यंत विनम्रता से कहा कि बिना गुरु दक्षिणा दिए वे गुरुकुल से नहीं जा सकते। उन्होंने आग्रहपूर्वक निवेदन किया कि गुरुदेव जो भी चाहें, वे उसे अवश्य पूर्ण करेंगे। यह सुनकर महर्षि सांदीपनि की आँखें भर आईं। उनके हृदय में वर्षों से दबा हुआ एक गहरा दुःख फिर जाग उठा। उन्होंने बताया कि प्रभास क्षेत्र में तीर्थयात्रा के समय उनका एकमात्र पुत्र समुद्र में स्नान करते हुए किसी भयंकर जलदैत्य का ग्रास बन गया था। उनकी पत्नी आज तक पुत्र-वियोग में व्याकुल रहती है। यदि वास्तव में वे गुरु दक्षिणा देना चाहते हैं, तो उनके मृत पुत्र को वापस ले आएँ। गुरु की आज्ञा सुनते ही श्रीकृष्ण और बलराम बिना किसी विलंब के प्रभास क्षेत्र की ओर चल पड़े। वहाँ पहुँचकर उन्होंने समुद्र देव का आवाहन किया। समुद्र देव प्रकट हुए और हाथ जोड़कर बोले कि उन्होंने उस बालक को नहीं लिया, बल्कि पंचजन नामक एक भयानक दैत्य ने उसे निगल लिया था। यह सुनते ही श्रीकृष्ण समुद्र की अथाह गहराइयों में उतर गए। वहाँ उनका पंचजन दैत्य से भीषण युद्ध हुआ। अंततः उन्होंने उसका वध कर दिया और उसके शरीर की खोज की, किन्तु गुरु पुत्र वहाँ नहीं मिला। हाँ, उसी दैत्य के शरीर से उन्हें एक दिव्य शंख प्राप्त हुआ, जो आगे चलकर पंचजन्य शंख के नाम से प्रसिद्ध हुआ। जब यह स्पष्ट हो गया कि बालक की आत्मा मृत्यु लोक से आगे जा चुकी है, तब श्रीकृष्ण और बलराम वरुण देव के लोक पहुँचे। उन्होंने वरुण देव से ऐसा दिव्य रथ माँगा जो उन्हें यमलोक तक ले जा सके। वरुण देव ने अत्यंत श्रद्धा के साथ उन्हें मन की गति से चलने वाला अद्भुत रथ प्रदान किया। दोनों भाई उस रथ पर आरूढ़ होकर यमपुरी की ओर प्रस्थान कर गए, जहाँ से कोई जीव सामान्यतः कभी लौटकर नहीं आता। यमलोक पहुँचते ही श्रीकृष्ण ने अपना दिव्य पंचजन्य शंख बजाया। उसकी ध्वनि से समस्त यमलोक गूँज उठा। वह कोई साधारण नाद नहीं था, बल्कि स्वयं ओंकार का स्वरूप था। उस दिव्य ध्वनि को सुनते ही नर्क में यातना भोग रही असंख्य आत्माओं के पाप नष्ट हो गए और वे भगवान के दर्शन मात्र से मुक्त होकर वैकुण्ठ को प्राप्त हो गईं। देखते ही देखते नर्क सूना हो गया। यमदूत भयभीत होकर यमराज के पास पहुँचे और सारी घटना सुनाई। यमराज क्रोधित हो उठे कि किसने उनके लोक के नियमों को भंग करने का साहस किया है। यमराज अपनी विशाल सेना के साथ यमपुरी के द्वार पर पहुँचे, जहाँ श्रीकृष्ण और बलराम उनका शांत भाव से प्रतीक्षा कर रहे थे। शीघ्र ही दोनों पक्षों के बीच भीषण युद्ध प्रारम्भ हो गया। यमराज ने अनेक दिव्य अस्त्रों का प्रयोग किया, परंतु श्रीकृष्ण और बलराम ने उन्हें सहजता से निष्फल कर दिया। अंततः यमराज ने अपना सबसे भयंकर अस्त्र कालदंड उठाया और उसे बलराम की ओर छोड़ दिया। परंतु बलराम ने उस कालदंड को खेल-खेल में अपने हाथ से पकड़ लिया। फिर उन्होंने उसी अस्त्र को यमराज पर चलाने का संकल्प किया। उस क्षण सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में भय व्याप्त हो गया, क्योंकि यदि यमराज का अंत हो जाता, तो सृष्टि का संतुलन ही बिगड़ जाता। उसी समय सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी वहाँ प्रकट हुए। उन्होंने बलराम से निवेदन किया कि वे कालदंड का प्रयोग न करें, क्योंकि यमराज भी ईश्वर द्वारा नियुक्त धर्मपाल हैं। इसके बाद उन्होंने श्रीकृष्ण से भी प्रार्थना की कि वे यमराज को क्षमा करें। श्रीकृष्ण ने शांत स्वर में कहा कि उनका उद्देश्य यमराज का अपमान करना नहीं था। वे केवल अपने गुरु की आज्ञा का पालन करने और गुरु पुत्र को वापस ले जाने आए हैं। यह सुनकर ब्रह्माजी ने यमराज को आदेश दिया कि वे तत्काल महर्षि सांदीपनि के पुत्र को उनके समक्ष प्रस्तुत करें। यमराज का सारा अहंकार समाप्त हो चुका था। उन्होंने हाथ जोड़कर श्रीकृष्ण और बलराम से क्षमा माँगी। फिर उन्होंने गुरु पुत्र की आत्मा को पुनः उसके शरीर में स्थापित किया और पूर्ण सम्मान के साथ उसे श्रीकृष्ण को सौंप दिया। इस प्रकार मृत्यु के लोक से किसी मृत व्यक्ति को जीवित वापस लाने का अद्भुत चमत्कार सम्पूर्ण सृष्टि ने पहली बार देखा। श्रीकृष्ण और बलराम गुरु पुत्र को साथ लेकर पुनः उज्जयिनी पहुँचे। जब महर्षि सांदीपनि और उनकी पत्नी ने अपने पुत्र को जीवित देखा तो उनके आनंद और विस्मय का ठिकाना न रहा। उनकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली। दोनों भाइयों ने अपने गुरु के चरणों में झुककर कहा कि उनकी गुरु दक्षिणा पूर्ण हुई। महर्षि सांदीपनि ने उन्हें हृदय से आशीर्वाद दिया और कहा कि उनका यह आदर्श युगों-युगों तक संसार को यह शिक्षा देगा कि सच्चा शिष्य गुरु की आज्ञा के लिए किसी भी सीमा तक जा सकता है। यह कथा हमें केवल भगवान श्रीकृष्ण की दिव्यता ही नहीं बताती, बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा की सर्वोच्च महिमा भी प्रकट करती है। श्रीकृष्ण ने यह सिद्ध कर दिया कि गुरु का ऋण धन या वैभव से नहीं, बल्कि समर्पण, सेवा और आज्ञापालन से चुकाया जाता है। जब संकल्प शुद्ध हो, भक्ति निष्कपट हो और उद्देश्य धर्ममय हो, तब स्वयं मृत्यु के देवता भी मार्ग देने के लिए विवश हो जाते हैं। यही कारण है कि यह प्रसंग सनातन धर्म में गुरु भक्ति के सर्वोच्च आदर्शों में गिना जाता है।
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