sn vyas
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#पौराणिक कथा
देवताओं के राजा इंद्र, जिनके वज्र के एक ही प्रहार से विशाल पर्वत भी चूर-चूर हो जाते थे, एक दिन ऐसे शत्रु के सामने खड़े थे जिसने पूरे स्वर्गलोक को चुनौती दे दी थी। वह गरजकर बोला, "इंद्र! आज या तो तुम जीवित बचोगे या फिर मैं।" यह चुनौती देने वाला कोई साधारण दैत्य नहीं था। उसका नाम था वृत्रासुर। एक ऐसा महाबलशाली असुर जिसने अकेले ही देवताओं की पूरी सेना को पराजित कर दिया था। लेकिन इस युद्ध की सबसे बड़ी सच्चाई यह थी कि वृत्रासुर कोई जन्मजात राक्षस नहीं था। वह अपने पिछले जन्म में भगवान विष्णु का परम भक्त राजा चित्रकेतु था। आखिर ऐसा क्या हुआ कि एक महान भक्त को राक्षस बनना पड़ा? और कैसे एक ऋषि ने अपनी हड्डियों का दान देकर देवताओं को ऐसा दिव्य अस्त्र दिया जिसने इतिहास बदल दिया? यही है इस अद्भुत कथा का रहस्य।
यह कथा सतयुग की है। उस समय राजा चित्रकेतु भगवान विष्णु के महान भक्त थे। उनका मन सदैव भक्ति में लगा रहता था। एक दिन वे अपने दिव्य विमान से कैलाश पर्वत के ऊपर से गुजर रहे थे। वहां उन्होंने भगवान शिव को माता पार्वती के साथ प्रेमपूर्वक विराजमान देखा। उस दृश्य को देखकर उनके मुख से अनायास मुस्कान निकल गई। लेकिन माता पार्वती ने उस मुस्कान का अर्थ अपमान समझ लिया। उन्होंने क्रोधित होकर कहा, "हे चित्रकेतु! तुमने देवाधिदेव महादेव का उपहास किया है। इसलिए अगले जन्म में तुम्हें राक्षस योनि प्राप्त होगी।" राजा चित्रकेतु ने बिना विरोध किए वह श्राप स्वीकार कर लिया क्योंकि उन्हें विश्वास था कि भगवान की इच्छा में ही कल्याण छिपा होता है।
उधर देवलोक में भी एक बड़ा संकट जन्म ले रहा था। देवराज इंद्र अपने वैभव और शक्ति के कारण धीरे-धीरे अहंकारी हो गए थे। एक दिन जब देवगुरु बृहस्पति उनकी सभा में आए तो इंद्र ने उनका उचित सम्मान नहीं किया। अपमानित होकर बृहस्पति स्वर्ग छोड़कर चले गए। गुरु के चले जाने से देवताओं की शक्ति कमजोर पड़ने लगी। तब इंद्र ने महर्षि त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप को अपना नया गुरु बना लिया। विश्वरूप अत्यंत विद्वान थे, लेकिन उनकी माता दैत्य कुल से थीं। इसलिए वे गुप्त रूप से यज्ञ का एक भाग दैत्यों को भी अर्पित कर देते थे।
जब इंद्र को यह रहस्य पता चला तो उनका क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया। बिना विचार किए उन्होंने अपने ही गुरु विश्वरूप का वध कर दिया। यह समाचार जब महर्षि त्वष्टा तक पहुंचा तो उनका हृदय शोक और क्रोध से भर उठा। उन्होंने प्रतिशोध लेने का निश्चय किया और एक भयंकर यज्ञ आरंभ किया। यज्ञ की अग्नि से उठती ज्वालाएं आकाश को छूने लगीं। मंत्रों की शक्ति से अग्नि के मध्य एक विशाल, विकराल और अत्यंत शक्तिशाली दैत्य प्रकट हुआ। उसका शरीर पर्वत के समान विशाल था, आंखें अग्नि की तरह धधक रही थीं और उसकी गर्जना से तीनों लोक कांप उठे। वही था वृत्रासुर।
महर्षि त्वष्टा ने आदेश दिया, "जाओ वृत्रासुर! इंद्र और समस्त देवताओं का विनाश कर दो।" आदेश मिलते ही वृत्रासुर अपनी विशाल सेना के साथ स्वर्गलोक की ओर बढ़ चला। देवताओं और दैत्यों के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। इंद्र ने अपने वज्र से अनेक प्रहार किए, लेकिन वृत्रासुर पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उसने एक-एक करके देवताओं को पराजित कर दिया। अंततः इंद्र भी उसके सामने टिक न सके और देवताओं सहित स्वर्ग छोड़कर भागने को विवश हो गए। देखते ही देखते स्वर्ग पर वृत्रासुर का अधिकार हो गया।
पराजित और निराश देवता भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, "प्रभु! अब हमारी रक्षा केवल आप ही कर सकते हैं।" भगवान विष्णु ने शांत स्वर में कहा, "वृत्रासुर का वध सामान्य अस्त्र से संभव नहीं है। इसके लिए महर्षि दधीच की अस्थियों से बना दिव्य वज्र चाहिए। वही अस्त्र उसकी मृत्यु का कारण बनेगा।"
देवता तुरंत महर्षि दधीच के आश्रम पहुंचे। उन्होंने पूरी विनम्रता से अपनी समस्या बताई। सब सुनकर महर्षि दधीच मुस्कुराए और बोले, "यदि मेरे शरीर से देवताओं और धर्म की रक्षा हो सकती है तो इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा?" इतना कहकर उन्होंने योगबल से अपने प्राण त्याग दिए। देवताओं ने अत्यंत श्रद्धा के साथ उनकी पवित्र अस्थियां एकत्रित कीं। विश्वकर्मा ने उन्हीं अस्थियों से ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली अस्त्र बनाया—दिव्य वज्र।
अब इंद्रदेव एक बार फिर युद्धभूमि में लौटे। उनके हाथ में महर्षि दधीच की अस्थियों से बना दिव्य वज्र चमक रहा था। दूसरी ओर वृत्रासुर पहले से भी अधिक प्रचंड रूप में खड़ा था। उसने हंसते हुए कहा, "इंद्र! क्या फिर हारने आए हो?" यह कहकर उसने ऐसा भयंकर प्रहार किया कि इंद्र का रथ दूर जा गिरा और स्वयं इंद्र भूमि पर लुढ़क गए।
लेकिन तभी एक आश्चर्यजनक घटना हुई। वृत्रासुर स्वयं इंद्र के पास आया और उन्हें उठाते हुए बोला, "उठो इंद्र! युद्ध से भागना तुम्हें शोभा नहीं देता। अपने हाथ का वज्र उठाओ और मेरा वध करो।" यह सुनकर इंद्र आश्चर्यचकित रह गए। वास्तव में वृत्रासुर के भीतर अभी भी भगवान विष्णु का वही महान भक्त जीवित था। वह जानता था कि इस राक्षस शरीर से मुक्ति का मार्ग केवल भगवान की इच्छा से ही संभव है। इसलिए वह स्वयं चाहता था कि इंद्र के हाथों उसका अंत हो।
दोनों के बीच फिर से भीषण युद्ध शुरू हुआ। आकाश में अस्त्रों की वर्षा होने लगी। पृथ्वी कांप उठी। समुद्र उफान मारने लगे। तभी वृत्रासुर ने अपना विशाल मुख खोल दिया और एक ही झटके में इंद्र सहित उनके रथ को निगल गया। देवताओं की सांसें थम गईं। लेकिन इंद्र ने हार नहीं मानी। उन्होंने वृत्रासुर के पेट के भीतर से ही अपने दिव्य वज्र का प्रहार किया। वज्र की शक्ति से उसका पेट फट गया और इंद्र बाहर निकल आए।
बाहर आते ही उन्होंने पूरी शक्ति के साथ महर्षि दधीच की अस्थियों से बने दिव्य वज्र को घुमाया और वृत्रासुर के मस्तक पर अंतिम प्रहार किया। वज्र के स्पर्श से पूरा आकाश प्रकाश से भर गया। वृत्रासुर भूमि पर गिर पड़ा। लेकिन उसके चेहरे पर पराजय का दुख नहीं बल्कि अद्भुत शांति थी। उसने अंतिम क्षणों में भगवान विष्णु का स्मरण किया और प्रसन्न मन से अपने प्राण त्याग दिए। उसी क्षण उसका तेजस्वी स्वरूप राक्षस देह से मुक्त होकर सीधे वैकुंठ धाम पहुंच गया।
देवताओं ने महर्षि दधीच के महान त्याग को प्रणाम किया। इंद्र ने भी स्वीकार किया कि विजय केवल शक्ति से नहीं, बल्कि त्याग, धर्म और सच्ची भक्ति से प्राप्त होती है। और वृत्रासुर की यह कथा आज भी हमें याद दिलाती है कि कभी-कभी बाहरी रूप भले ही राक्षस का हो, लेकिन उसके भीतर भगवान का सच्चा भक्त भी छिपा हो सकता है।
कमेंट में श्रद्धा से लिखिए—"जय श्री विष्णु" और "महर्षि दधीच अमर रहें।"
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