sn vyas
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#पौराणिक कथा
प्राचीन काल में क्षीरसागर के शांत और दिव्य वातावरण में भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या पर विराजमान थे। माता लक्ष्मी उनके चरणों की सेवा कर रही थीं। तभी उनके मन में एक गंभीर प्रश्न उठा। उन्होंने विनम्रता से पूछा, "हे प्रभु, संसार में अनेक स्त्रियाँ संतान सुख से वंचित क्यों रह जाती हैं? किसी का गर्भ बार-बार नष्ट हो जाता है, किसी को संतान प्राप्त ही नहीं होती और किसी की संतान जन्म लेने से पहले या बाद में संसार छोड़ देती है। ऐसा किन कारणों से होता है?" भगवान विष्णु मुस्कुराए और बोले, "हे देवी, यह विषय अत्यंत गूढ़ है। इसमें केवल कर्मों का ही नहीं, आचरण, विचार और जीवन के नियमों का भी गहरा संबंध है। मैं तुम्हें एक प्राचीन कथा सुनाता हूँ, जिसे सुनने और समझने से मनुष्य जीवन का बड़ा रहस्य ज्ञात होता है।"
बहुत समय पहले मध्य भारत की एक समृद्ध नगरी में मधुसूदन नाम का एक प्रतिष्ठित व्यापारी रहता था। उसकी पुत्री मधुरा रूप, गुण और संस्कारों से संपन्न थी। उसका विवाह समीप के नगर के एक युवक सुमित से हुआ। विवाह के बाद मधुरा अपने नए परिवार में प्रेम और सम्मान के साथ रहने लगी। उसके पति सुमित उससे अत्यंत स्नेह करते थे, परंतु उसकी सास कांता स्वभाव से कठोर, लालची और अभिमानी थी। उसे विवाह में मिले दहेज से कभी संतोष नहीं हुआ। वह समय-समय पर मधुरा पर दबाव डालती कि अपने मायके से और धन, वस्त्र, गहने तथा अन्य वस्तुएँ मँगवाए।
मधुरा अपने माता-पिता का सम्मान करती थी और ससुराल में किसी प्रकार का विवाद न हो, इसलिए हर बार अपनी सास की इच्छा पूरी करने का प्रयास करती। उसके पिता भी बेटी की खुशी के लिए बिना किसी शिकायत के सब कुछ भेजते रहे। समय बीतता गया और एक दिन पूरे परिवार में आनंद छा गया जब यह समाचार मिला कि मधुरा गर्भवती है। घर में खुशियाँ मनाई गईं, लेकिन कांता के मन में भी लालच जाग उठा। उसने तुरंत मधुरा के मायके में संदेश भेजा कि पहली संतान आने वाली है, इसलिए बड़े उपहार और धन भेजे जाएँ। मधुरा के पिता ने अपनी सामर्थ्य से बढ़कर सब कुछ भेजा, किंतु कुछ ही समय बाद अचानक मधुरा का गर्भ गिर गया।
इस घटना ने पूरे घर को शोक में डुबो दिया, परंतु जहाँ सबने इसे दुर्भाग्य समझा, वहीं कांता ने अपनी बहू को ही दोषी ठहरा दिया। उसने मधुरा को अपशकुनी और पापिनी कहकर अपमानित करना शुरू कर दिया। मधुरा बार-बार कहती रही कि उसने कोई पाप नहीं किया, पर उसकी कोई बात नहीं सुनी गई। इसके बाद कांता का व्यवहार और कठोर हो गया। वह मधुरा से दिन-रात काम करवाती, उसे पर्याप्त भोजन भी नहीं देती और हर समय ताने देती रहती।
कुछ महीनों बाद मधुरा फिर से गर्भवती हुई। इस बार भी उसने पूरी सावधानी रखी, लेकिन गर्भावस्था में उसे विश्राम नहीं मिला। प्रसव का समय आया और उसने एक पुत्र को जन्म दिया, किंतु वह मृत था। यह देखकर मधुरा का हृदय टूट गया। उसने अपने मृत शिशु को सीने से लगाकर बहुत विलाप किया, पर उसकी सास ने दया करने के बजाय उसे ही दोषी ठहराया। उसने कहा कि यह स्त्री इस घर के लिए अशुभ है और इसके कारण ही वंश का दीपक बुझ गया। क्रोध में आकर उसने मधुरा को घर से निकाल दिया। सबसे अधिक पीड़ा इस बात की थी कि उसका पति सुमित अपनी माँ के भय से मौन खड़ा सब कुछ देखता रहा।
आँखों में आँसू और मन में असहनीय पीड़ा लिए मधुरा घर छोड़कर जंगल की ओर निकल गई। कई दिनों तक भटकने के बाद उसे एक शांत और पवित्र आश्रम दिखाई दिया। उसने वहीं आश्रय लिया और भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए जीवन बिताने लगी। वह किसी से कोई शिकायत नहीं करती थी। उसके मन में केवल यही प्रार्थना रहती कि यदि उसने कोई भूल की हो तो भगवान उसे क्षमा करें और यदि वह निर्दोष हो तो उसे सत्य का मार्ग दिखाएँ।
एक दिन एक तेजस्वी साधु एक गौमाता के साथ उस आश्रम में पहुँचे। उनके मुख पर अद्भुत तेज था। मधुरा ने उनका आदरपूर्वक स्वागत किया और अपने जीवन की पूरी कथा सुनाई। साधु ने ध्यानपूर्वक सब सुना और बोले, "पुत्री, संसार में संतान केवल भाग्य से नहीं, बल्कि शुद्ध आचरण, सात्विक जीवन और धर्मसम्मत नियमों के पालन से भी प्राप्त होती है। गर्भावस्था के समय स्त्री का मन प्रसन्न रहना चाहिए। उसे क्रोध, भय, तनाव और कटु वचन से दूर रहना चाहिए। सात्विक भोजन करना चाहिए, बुरे विचारों और अशुभ कथाओं से बचना चाहिए। पति-पत्नी को भी धर्मशास्त्रों में बताए गए नियमों का पालन करना चाहिए। मासिक धर्म के दिनों में संयम रखना चाहिए और शुद्धि के बाद उचित समय पर ही संतानोत्पत्ति का विचार करना चाहिए। गर्भवती स्त्री को सदैव शुभ विचार, ईश्वर का स्मरण और गौसेवा करनी चाहिए।"
साधु ने आगे कहा, "इन नियमों का पालन करने से उत्तम, गुणवान और स्वस्थ संतान प्राप्त होती है। तुम भगवान विष्णु की भक्ति करो और इस गौमाता की सेवा करो। उचित समय आने पर तुम्हारे सभी दुःख दूर हो जाएँगे।" इतना कहकर वह साधु और गौमाता अचानक अदृश्य हो गए। मधुरा समझ गई कि यह कोई साधारण साधु नहीं, बल्कि स्वयं भगवान की कृपा थी।
उधर एक रात सुमित को स्वप्न में भगवान विष्णु के दर्शन हुए। प्रभु ने उसे आदेश दिया कि वह अपनी पत्नी को खोजकर वापस सम्मानपूर्वक अपने साथ ले आए। नींद खुलते ही सुमित को अपनी भूल का अहसास हुआ। वह जंगल पहुँचा और बहुत खोजने के बाद आश्रम में मधुरा को पाया। उसने अपनी पत्नी से क्षमा माँगी और उसे सम्मान के साथ अपने साथ रहने का आग्रह किया। मधुरा ने भगवान की इच्छा समझकर उसे क्षमा कर दिया।
दोनों ने आश्रम में रहते हुए भगवान विष्णु की भक्ति की और साधु द्वारा बताए गए सभी नियमों का पालन किया। कुछ समय बाद मधुरा फिर गर्भवती हुई। इस बार उसका मन शांत था, भोजन सात्विक था और जीवन भक्ति से भरा हुआ था। नौ महीने पूरे होने पर उसने एक सुंदर, स्वस्थ और तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। आश्रम आनंद से भर उठा। मधुरा और सुमित ने भगवान का धन्यवाद किया कि उन्होंने उनके जीवन का अंधकार दूर कर दिया।
कुछ समय बाद वे अपने पुत्र को लेकर नगर लौटे। जब कांता ने अपने पोते को जीवित और स्वस्थ देखा तो वह आश्चर्यचकित रह गई। उसने मधुरा से पूछा कि यह चमत्कार कैसे हुआ। मधुरा ने भगवान की कृपा, साधु के उपदेश और सात्विक जीवन के नियमों का पूरा वर्णन किया। यह सुनकर भी कांता के मन में पश्चाताप के स्थान पर लालच उत्पन्न हुआ। उसने सोचा कि यदि वही साधु मिल जाएँ तो वह उनसे धन और अमूल्य वस्तुएँ माँग लेगी। इसी लालच में वह अकेली जंगल की ओर चली गई।
आश्रम पहुँचकर उसने कई दिनों तक साधु की प्रतीक्षा की, पर वे नहीं आए। एक दिन वहाँ एक भयंकर राक्षसी प्रकट हुई। उसने कांता से कहा, "जिस स्त्री ने अपनी निर्दोष बहू को सताया, गर्भवती होने पर भी उसे कष्ट दिए, उसके दुःख का उपहास किया और लालच तथा क्रूरता से उसका जीवन नष्ट किया, वह अपने कर्मों का फल अवश्य भोगेगी।" कांता भय से काँपने लगी और क्षमा माँगने लगी, परंतु कर्मों का समय आ चुका था। राक्षसी ने उसे दंड दिया और उसका अंत हो गया।
जब कांता कई दिनों तक वापस नहीं लौटी तो सुमित उसकी खोज में जंगल गया। वहाँ उसे अपनी माँ के अंत का समाचार मिला। उसने समझ लिया कि मनुष्य अपने कर्मों से ही सुख और दुःख का फल प्राप्त करता है। इसके बाद वह मधुरा और अपने पुत्र के साथ धर्म, प्रेम और भक्ति का जीवन बिताने लगा।
कथा समाप्त होने पर भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी से कहा, "हे देवी, जो स्त्री सात्विक जीवन अपनाती है, धर्म का पालन करती है, ईश्वर का स्मरण करती है और गर्भावस्था में शुभ विचार रखती है, उसे उत्तम संतान प्राप्त होती है। लेकिन जो लोग गर्भवती स्त्री को कष्ट देते हैं, उसका अपमान करते हैं, निर्दोष पर अत्याचार करते हैं या लालच और अधर्म में जीवन बिताते हैं, वे अपने ही कर्मों का फल भोगते हैं।"
माता लक्ष्मी ने फिर पूछा, "हे प्रभु, यदि किसी कारण गर्भ में ही शिशु की मृत्यु हो जाए या जन्म के बाद बालक अल्पायु में संसार छोड़ दे, तो उसके लिए क्या करना चाहिए?" भगवान विष्णु ने उत्तर दिया, "ऐसी स्थिति में शोक के साथ-साथ धर्मसम्मत विधियों का पालन करना चाहिए। गर्भ की अवस्था के अनुसार शुद्धि के नियम माने जाएँ, बालकों को अन्न, दूध और वस्त्र का दान दिया जाए तथा भगवान का स्मरण करते हुए पुण्य कर्म किए जाएँ। इससे दिवंगत आत्मा को शांति और परिवार को मानसिक बल प्राप्त होता है।"
भगवान विष्णु ने अंत में कहा, "इस कथा का सार यही है कि संतान केवल भाग्य से नहीं, बल्कि धर्म, संयम, करुणा, सात्विक आहार, शुद्ध विचार और ईश्वर की भक्ति से प्राप्त होने वाला दिव्य आशीर्वाद है। जो दूसरों के साथ अन्याय करता है, विशेषकर गर्भवती स्त्री को कष्ट देता है, वह अपने कर्मों का दुष्परिणाम अवश्य भोगता है। और जो श्रद्धा, प्रेम तथा धर्म का पालन करता है, उसके जीवन में अंततः सुख, शांति और संतान का कल्याण अवश्य होता है। जय श्री हरि।
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