sn vyas
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#पौराणिक कथा #भक्ति भावना सूर्यवंश में 'सत्यव्रत' नाम के एक अत्यंत प्रतापी और पराक्रमी राजा हुए। वे अपनी प्रजा का पालन-पोषण धर्मपूर्वक करते थे, परंतु उनके भीतर अपने सौंदर्य, बल और सत्ता का एक सूक्ष्म अहंकार पनप रहा था ​एक दिन राजसभा में बैठे-बैठे उनके मन में एक अनूठा और अभिमानी विचार आया: ​संसार में जितने भी पुण्य आत्मा हैं, वे मृत्यु के बाद अपना यह शरीर छोड़कर केवल आत्मा रूप में स्वर्ग जाते हैं। परंतु मैं इतना महान और शक्तिशाली राजा हूँ कि मुझे अपने इस पंचभौतिक मानव देह (सशरीर) के साथ ही स्वर्ग जाना चाहिए, ताकि देवता भी मेरे इस हाड़-मांस के शरीर का आदर करें! सत्यव्रत अपने कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ के आश्रम पहुँचे और प्रणाम करके बोले:हे ब्रह्मर्षि! आप अपनी तपस्या के बल से एक ऐसा यज्ञ कराइए, जिसके प्रभाव से मैं अपने इसी जीवित शरीर के साथ स्वर्गलोक चला जाऊँ। महर्षि वशिष्ठ ने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा और राजा से शांत स्वर में कहा: हे राजन्! यह विचार धर्म, प्रकृति और विधि के विधान के विरुद्ध है। यह नश्वर शरीर पृथ्वी के पंचतत्त्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से बना है। इसे स्वर्ग में ले जाना असंभव और अधर्म है। अपनी इस व्यर्थ हठ को त्याग दो और निष्काम भाव से प्रजा-पालन करो। परंतु राजा सत्यव्रत पर हठ का भूत सवार था। उन्होंने वशिष्ठ जी की बात मानने के बजाय कहा कि यदि आप यह यज्ञ नहीं कराएंगे, तो मैं किसी अन्य ऋषि के पास चला जाऊँगा वशिष्ठ जी के इंकार करने पर राजा सत्यव्रत उनके १०० पुत्रों के पास गए। वशिष्ठ-पुत्रों ने जब देखा कि राजा उनके गुरु और पिता के निर्णय की अवहेलना कर रहा है, तो वे अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने राजा को शाप दे दिया: "रे अभिमानी नृप! गुरु की आज्ञा का अनादर करने के कारण तू अत्यंत नीच और कुरूप 'चांडाल' बन जा! शाप मिलते ही राजा सत्यव्रत का दिव्य रूप, राजसी वस्त्र और आभूषण नष्ट हो गए। उनका शरीर काला, बाल बिखरे हुए, और वस्त्र जीर्ण-शीर्ण हो गए। वे एक भयानक व कुरूप चांडाल के रूप में बदल गए। इस रूप में अयोध्या की प्रजा ने भी उन्हें पहचानने से इंकार कर दिया। दुखी और अपमानित होकर सत्यव्रत वन-वन भटकने लगे। अंत में वे महर्षि विश्वामित्र के आश्रम पहुँचे। विश्वामित्र जी उस समय महर्षि वशिष्ठ से अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए प्रयासरत थे। चांडाल रूपी राजा सत्यव्रत ने विश्वामित्र के चरणों में गिरकर रोते हुए अपनी व्यथा सुनाई। विश्वामित्र जी ने सोचा कि यदि वे वशिष्ठ के मना किए गए कार्य को अपनी तपस्या से पूरा कर दें, तो संपूर्ण ब्रह्मांड में उनकी श्रेष्ठता सिद्ध हो जाएगी। विश्वामित्र जी ने प्रतिज्ञा की: हे राजन्! तुम वशिष्ठ के शाप से चांडाल बने हो, परंतु मैं अपने उग्र तपोबल से तुम्हें इसी शरीर के साथ देवराज इंद्र के सामने स्वर्ग में बिठाकर रहूँगा! विश्वामित्र जी ने एक विशाल महायज्ञ का आयोजन किया और सभी ऋषियों को निमंत्रण भेजा। परंतु वशिष्ठ जी के पुत्रों ने इस अस्वाभाविक यज्ञ में आने से मना कर दिया। यज्ञ की पूर्णाहुति के समय विश्वामित्र ने देवताओं को अपना हविर्भाग (आहुति) लेने के लिए आवाह्न किया, परंतु धर्म-विरुद्ध कार्य होने के कारण कोई भी देवता यज्ञ-स्थल पर प्रकट नहीं हुआ। इससे विश्वामित्र जी का क्रोध प्रचंड हो उठा। उन्होंने अपने हाथ में जल लिया और अपनी वर्षों की तपस्या का पुण्य राजा सत्यव्रत को अर्पित करते हुए कहा: हे राजन्! देवताओं के न आने पर भी मेरी तपस्या का फल देखो। मैं तुम्हें अपनी साधना के बल से आकाश में ऊपर स्वर्ग की ओर उछालता हूँ महान तपोबल के प्रभाव से राजा सत्यव्रत का चांडाल शरीर धरती छोड़कर तेज़ी से आकाश की ओर उड़ने लगा। राजा सत्यव्रत उड़ते हुए सीधे स्वर्ग लोक के द्वार पर पहुँच गए। जब देवताओं के राजा इन्द्र ने एक चांडाल रूपी मनुष्य को सशरीर स्वर्ग में प्रवेश करते देखा, तो वे क्रोधित हो गए। इंद्र ने देवताओं के साथ मिलकर राजा को रोका और कहा: हे नीच! तू गुरु के शाप से पतित हुआ है और प्रकृति के नियम को तोड़कर सशरीर यहाँ आया है। तेरा स्वर्ग में कोई स्थान नहीं है! इंद्र ने एक शक्तिशाली प्रहार करके राजा सत्यव्रत को स्वर्ग से नीचे फेंक दिया। राजा सत्यव्रत सिर के बल (उलटे) आकाश से धरती की ओर तेज़ी से गिरने लगे। भयभीत होकर वे आर्तनाद करने लगे—हे विश्वामित्र! हे ऋषिश्रेष्ठ! मेरी रक्षा कीजिए, मैं नीचे गिर रहा हूँ! विश्वामित्र जी ने जब राजा की यह दुर्दशा देखी, तो उन्होंने अपने कमंडलु के जल से संकल्प लिया और गड़गड़ाती वाणी में कहा: "तिष्ठ! तिष्ठ!" (वहीं ठहर जाओ!) विश्वामित्र के तपोबल की शक्ति नीचे से ऊपर ढकेल रही थी और इंद्र का बल ऊपर से नीचे फेंक रहा था। परिणाम यह हुआ कि राजा सत्यव्रत न तो ऊपर स्वर्ग जा सके और न ही नीचे धरती पर गिर पाए। वे आकाश और पृथ्वी के बीचों-बीच अधर में (उलटे लटके हुए) अटक गए! स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल—इन तीनों लोकों से अलग तीन संकटापन्न स्थितियों में फँसने के कारण उनका नाम 'त्रिशंकु' पड़ा। जब इंद्र ने त्रिशंकु को स्वीकार नहीं किया, तो विश्वामित्र जी ने इसे अपना व्यक्तिगत अपमान माना। उन्होंने अपने क्रोध और तपोबल से अधर में लटके त्रिशंकु के चारों ओर एक नया स्वर्ग, नए सप्तर्षि और नए नक्षत्र-मंडल (दूसरा ब्रह्मांड) बनाना शुरू कर दिया! विश्वामित्र जी ने कहा: यदि इंद्र मेरे राजा को अपने स्वर्ग में नहीं रहने देगा, तो मैं अपने तपोबल से एक दूसरा इंद्र और नया देवलोक बनाकर इस राजा को वहाँ का स्वामी बनाऊँगा सृष्टि के इस नए समानांतर विधान को देखकर ब्रह्मा जी और सभी देवता भयभीत होकर विश्वामित्र जी के पास पहुँचे। ब्रह्मा जी ने अत्यंत मधुर वाणी में विश्वामित्र जी से कहा: "हे ब्रह्मर्षि! शांत हो जाइए। आपका तपोबल अगाध है, परंतु सनातन प्रकृति और धर्म की मर्यादा को नष्ट मत कीजिए। नश्वर शरीर कभी मुख्य देवलोक में नहीं रह सकता। विश्वामित्र जी द्वारा रचे गए ये नए नक्षत्र और तारे 'त्रिशंकु मंडल' के नाम से जाने जाएँगे राजा त्रिशंकु इसी अधर में बने नए लोक (त्रिशंकु लोक) में सशरीर निवास करेंगे, परंतु वे मुख्य स्वर्ग में प्रवेश नहीं करेंगे।वे उलटे लटके रहेंगे और उनके मुँह से जो लार टपकेगी, वही पृथ्वी पर 'कर्मनाशा नदी' के रूप में बहेगी (मान्यता है कि इस नदी के जल को छूने से संचित पुण्य नष्ट हो जाते हैं)। अधर में उलटे लटके रहने के बाद राजा सत्यव्रत (त्रिशंकु) की आँखें खुलीं। उनका सारा अहंकार चूर-चूर हो गया। उन्होंने स्वीकार किया मेरे कुलगुरु वशिष्ठ जी का ज्ञान ही सत्य था। मैंने व्यर्थ के अहंकार और देह-सक्ति में पड़कर अपना लोक और परलोक दोनों बिगाड़ लिया। !! जय श्री कृष्णा!!
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