sn vyas
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#पौराणिक कथा कल्पना कीजिए उस क्षण की, जब न कोई आकाश था, न धरती, न सूर्य, न चंद्रमा, न दिन था और न रात। समय भी जैसे अपने जन्म की प्रतीक्षा कर रहा था और चारों ओर केवल अनंत मौन और अथाह शून्यता व्याप्त थी। लेकिन उस शून्य के भीतर एक ऐसी सत्ता विद्यमान थी, जिसका न कोई आरंभ था और न कोई अंत। पुराणों में उसी परम सत्ता को नारायण कहा गया है। अनंत कारण जल के ऊपर शेषनाग की दिव्य शैया पर योगनिद्रा में विराजमान भगवान विष्णु, जिनके भीतर मानो संपूर्ण सृष्टि अपने अव्यक्त रूप में समाई हुई थी। यह योगनिद्रा साधारण निद्रा नहीं थी, बल्कि ऐसी अवस्था थी जिसमें चेतना पूर्ण रूप से जागृत होते हुए भी सृष्टि का विस्तार अभी प्रकट नहीं हुआ था। सब कुछ शांत था, लेकिन उस शांति के भीतर आने वाले अनंत ब्रह्मांड की संभावना छिपी हुई थी। समय के अनंत प्रवाह में वह क्षण आया जब सृष्टि के पुनः प्रकट होने का संकल्प हुआ। भगवान नारायण की दिव्य चेतना में एक सूक्ष्म स्पंदन उत्पन्न हुआ और उसी के साथ कारण जल में सृष्टि की पहली हलचल दिखाई देने लगी। भगवान विष्णु की नाभि से धीरे-धीरे एक दिव्य कमल प्रकट हुआ। वह साधारण कमल नहीं था। वह प्रकाश से भरा हुआ था और उसके भीतर पूरी सृष्टि के बीज के समान एक महान रहस्य छिपा था। इसी दिव्य कमल को हिरण्यगर्भ से जोड़ा जाता है और इसी पर प्रकट हुए चार मुखों वाले ब्रह्मा। जब ब्रह्मा ने पहली बार अपनी आंखें खोलीं तो उन्होंने चारों ओर देखा। सामने केवल अनंत जल था और उनके अलावा कोई दिखाई नहीं दे रहा था। उनके मन में प्रश्न उठा कि मैं कौन हूं? मेरा जन्म कैसे हुआ? मेरा उद्देश्य क्या है और इस अनंत संसार की शुरुआत कहां से हुई? अपने अस्तित्व का रहस्य जानने के लिए ब्रह्मा कमल के तने के भीतर उतरने लगे। उन्होंने उस कमल की जड़ और उसके स्रोत को खोजने का प्रयास किया, लेकिन जितना आगे बढ़ते गए, रहस्य उतना ही गहरा होता गया। उन्हें उस यात्रा का कोई अंत नहीं मिला। अंततः वे वापस लौट आए और समझ गए कि केवल बाहरी खोज से उस सत्य को नहीं पाया जा सकता। तभी उनके भीतर तपस्या का विचार उत्पन्न हुआ। उन्होंने अपने मन को एकाग्र किया और लंबे समय तक कठोर तप में लीन हो गए। उनकी तपस्या से ब्रह्मांडीय चेतना में कंपन उत्पन्न हुआ और अंततः उनके सामने भगवान नारायण का दिव्य स्वरूप प्रकट हुआ। ब्रह्मा ने विनम्र होकर अपने जन्म का रहस्य पूछा। तब नारायण ने उन्हें बताया कि उनका प्राकट्य सृष्टि की दिव्य योजना का हिस्सा है और उन्हें संसार की रचना का दायित्व सौंपा गया है। यहीं से सृष्टि के महान चक्र का आरंभ हुआ। ब्रह्मा को सृजन का कार्य मिला, भगवान विष्णु को पालन और संरक्षण का दायित्व तथा भगवान शिव को संहार और पुनर्निर्माण की शक्ति से जोड़ा गया। भारतीय दर्शन में इन तीनों को केवल तीन अलग-अलग देवताओं के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि सृष्टि के तीन मूल कार्यों के प्रतीक के रूप में भी समझा जाता है। जन्म होता है, जीवन चलता है और समय आने पर परिवर्तन होता है। यही परिवर्तन आगे नए सृजन का कारण बनता है। इस प्रकार सृष्टि का चक्र निरंतर चलता रहता है। अलग-अलग परंपराओं में इस परम सत्य को अलग-अलग रूपों में समझाया गया है। वैष्णव परंपरा भगवान विष्णु को सर्वोच्च मानती है, शैव परंपरा भगवान शिव को परम तत्व मानती है और शाक्त परंपरा आदि शक्ति को मूल चेतना के रूप में देखती है। इन विविध दृष्टिकोणों में भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की गहराई दिखाई देती है। भगवान विष्णु के स्वरूप को समझने के लिए उनके दिव्य निवास की कल्पना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। पुराणों में क्षीरसागर का वर्णन मिलता है, जहां भगवान विष्णु शेषनाग की शैया पर विराजमान दिखाई देते हैं और देवी लक्ष्मी उनके चरणों की सेवा करती हैं। उनका नील वर्ण अनंत आकाश और अथाह समुद्र की याद दिलाता है। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म दिखाई देते हैं। शंख को दिव्य नाद और चेतना के जागरण से जोड़ा जाता है, चक्र समय और धर्म की गति का प्रतीक माना जाता है, गदा शक्ति और व्यवस्था का संकेत देती है तथा कमल निर्मलता और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक माना जाता है। शेषनाग के अनंत फन समय के अनंत प्रवाह का प्रतीक समझे जाते हैं। इस प्रकार भगवान विष्णु का पूरा स्वरूप केवल एक धार्मिक चित्र नहीं बल्कि गहरे प्रतीकों से भरी हुई आध्यात्मिक अवधारणा भी है। क्षीरसागर से आगे विष्णु के दिव्य धाम वैकुंठ का वर्णन मिलता है। वैकुंठ को ऐसा लोक माना गया है जहां भगवान विष्णु अपनी दिव्य सत्ता में विराजमान रहते हैं। इसी संदर्भ में जय और विजय की प्रसिद्ध कथा भी आती है। जय और विजय भगवान विष्णु के द्वारपाल थे। एक बार सनकादि ऋषियों के साथ हुए प्रसंग के कारण उन्हें श्राप मिला कि उन्हें पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ेगा। कहा जाता है कि उन्होंने भगवान विष्णु से प्रार्थना की और अंततः यह स्वीकार किया कि वे बार-बार जन्म लेकर भगवान के हाथों मुक्ति प्राप्त करेंगे। इसी कथा से हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप जैसे असुरों से लेकर रावण और कुंभकर्ण तथा आगे शिशुपाल और दंतवक्र तक की परंपराओं को जोड़ा जाता है। इस प्रसंग में एक गहरा संदेश छिपा है कि दिव्य व्यवस्था में कर्म का नियम सभी पर लागू होता है और मुक्ति भी अंततः उसी परम सत्य की ओर लौटने का मार्ग बन जाती है। लेकिन जब-जब संसार में धर्म का संतुलन बिगड़ता है, तब भगवान विष्णु के अवतारों की कथाएं सामने आती हैं। दशावतार की प्रसिद्ध परंपरा में मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और भविष्य में माने जाने वाले कल्कि अवतार का वर्णन मिलता है। विभिन्न ग्रंथों और परंपराओं में सूची और विवरण में कुछ अंतर भी पाए जाते हैं, लेकिन मूल विचार यही है कि जब धर्म संकट में पड़ता है और अधर्म बढ़ने लगता है, तब दिव्य शक्ति किसी न किसी रूप में संतुलन स्थापित करती है। मत्स्य अवतार में जल से जुड़ी कथा सामने आती है, कूर्म अवतार में समुद्र मंथन का आधार बनता है, वराह पृथ्वी की रक्षा करते हैं और नरसिंह भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए अद्भुत स्वरूप धारण करते हैं। नरसिंह अवतार की कथा भगवान विष्णु के अवतारों में सबसे रहस्यमय कथाओं में से एक है। हिरण्यकश्यप को वरदान प्राप्त था कि वह न दिन में मरेगा, न रात में, न घर के भीतर और न बाहर, न मनुष्य से और न पशु से तथा न किसी अस्त्र से। उसे अपने बल पर इतना अहंकार हो गया कि उसने स्वयं को ही सर्वोच्च मान लिया। लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था। जब हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद से पूछा कि तुम्हारा भगवान कहां है, तो प्रह्लाद ने उत्तर दिया कि भगवान हर जगह हैं। क्रोध में हिरण्यकश्यप ने स्तंभ की ओर संकेत करके पूछा कि क्या तुम्हारा भगवान इसमें भी है। तभी उस स्तंभ से नरसिंह का अद्भुत स्वरूप प्रकट हुआ। न पूर्ण मनुष्य, न पूर्ण पशु। संध्या के समय, महल की दहलीज पर, अपने नखों से उन्होंने हिरण्यकश्यप का अंत किया और प्रह्लाद की रक्षा की। यह कथा अहंकार के सामने भक्ति और धर्म की विजय का प्रतीक बन गई। इसके बाद वामन अवतार की कथा आती है, जहां भगवान विष्णु एक छोटे से ब्राह्मण बालक के रूप में राजा बलि के सामने पहुंचे। राजा बलि शक्तिशाली और दानी थे। उन्होंने वामन से पूछा कि उन्हें क्या चाहिए। वामन ने केवल तीन पग भूमि मांग ली। बलि ने वचन दे दिया। तभी वामन ने विराट रूप धारण किया। एक पग में पृथ्वी, दूसरे में आकाश नाप लिया और जब तीसरे पग के लिए स्थान नहीं बचा तो बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। भगवान ने उसके समर्पण को स्वीकार किया। इस कथा में शक्ति से अधिक महत्वपूर्ण वचन, दान, समर्पण और अहंकार के त्याग का संदेश दिखाई देता है। फिर आता है भगवान राम का अवतार, जिसे मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में स्मरण किया जाता है। राम की कथा केवल रावण के वध की कहानी नहीं है। यह त्याग, सत्य, कर्तव्य, परिवार, मित्रता और धर्म की परीक्षा की कथा है। राजमहल छोड़कर वनवास जाना हो, कठिन परिस्थितियों में भी मर्यादा बनाए रखना हो या अन्याय के विरुद्ध युद्ध करना हो, राम का जीवन यह दिखाता है कि धर्म का पालन हमेशा आसान नहीं होता, लेकिन कठिन समय में भी अपने सिद्धांतों पर टिके रहना ही सच्ची शक्ति है। उनके साथ हनुमान जैसे परम भक्त का जुड़ना इस कथा को और भी दिव्य बना देता है। इसके बाद भगवान कृष्ण का अवतार आता है, जिसमें विष्णु तत्व का एक अलग ही रूप दिखाई देता है। कृष्ण कभी बालक बनकर प्रेम का संदेश देते हैं, कभी मित्र बनकर साथ निभाते हैं और कभी सारथी बनकर अर्जुन को जीवन का सबसे गहरा ज्ञान देते हैं। कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन जब अपने ही संबंधियों को सामने देखकर भ्रमित हो जाते हैं, तब श्रीकृष्ण उन्हें कर्म, आत्मा, कर्तव्य और धर्म का ज्ञान देते हैं। भगवद्गीता का संदेश यही है कि मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन करते हुए कर्म करना चाहिए और परिणाम के प्रति अत्यधिक आसक्ति से मुक्त रहने का प्रयास करना चाहिए। भगवान विष्णु की कथाओं का एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे केवल युद्ध करने वाले देवता के रूप में नहीं दिखाई देते। उनका वास्तविक तत्व संरक्षण और संतुलन से जुड़ा है। जहां जीवन की रक्षा होती है, जहां करुणा दिखाई देती है, जहां कोई व्यक्ति अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर किसी दूसरे की सहायता करता है, वहां विष्णु तत्व की अभिव्यक्ति मानी जा सकती है। एक मां अपने बच्चे के लिए रातभर जागती है, कोई व्यक्ति भूखे को भोजन देता है, कोई कमजोर की सहायता करता है या कोई व्यक्ति कठिन परिस्थिति में भी न्याय और सत्य का साथ नहीं छोड़ता, तो इन कार्यों में संरक्षण और संतुलन की वही भावना दिखाई देती है। कलियुग की बात करें तो पुराणों में भविष्य के कल्कि अवतार का वर्णन मिलता है। मान्यता है कि जब अधर्म अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाएगा और धर्म का संतुलन अत्यंत कमजोर हो जाएगा, तब भगवान विष्णु कल्कि रूप में प्रकट होंगे। उनके श्वेत अश्व पर सवार होने और अधर्म के अंत के बाद नए युग की स्थापना से जुड़ी कथाएं विभिन्न पुराणिक परंपराओं में मिलती हैं। इसे केवल भविष्य की एक घटना के रूप में देखने के बजाय एक आध्यात्मिक संदेश के रूप में भी समझा जा सकता है कि जब अंधकार बढ़ता है तो प्रकाश की आवश्यकता और अधिक महसूस होती है और जब व्यवस्था बिगड़ती है तो उसे संतुलित करने की शक्ति उत्पन्न होती है। इस पूरी कथा को यदि ध्यान से समझें तो भगवान विष्णु केवल क्षीरसागर में शेषनाग पर विराजमान किसी दूरस्थ देवता की कल्पना तक सीमित नहीं रह जाते। वे सृष्टि के उस सिद्धांत का प्रतीक बन जाते हैं जो जीवन को संभालता है, व्यवस्था को बनाए रखता है और जब धर्म का संतुलन बिगड़ता है तो उसे पुनः स्थापित करने का मार्ग दिखाता है। उनका प्रत्येक अवतार अपने समय की एक विशेष समस्या का उत्तर बनकर सामने आता है। कभी वे जल में आते हैं, कभी पृथ्वी को उठाते हैं, कभी भक्त की रक्षा के लिए आधे मनुष्य और आधे सिंह का रूप लेते हैं, कभी छोटे से वामन बनकर अहंकार को चुनौती देते हैं, कभी राम बनकर मर्यादा स्थापित करते हैं और कभी कृष्ण बनकर मनुष्य को कर्म और ज्ञान का मार्ग समझाते हैं। शायद यही कारण है कि भगवान विष्णु की कथा केवल प्राचीन समय की कहानी नहीं लगती। यह मनुष्य के भीतर चलने वाले संघर्ष की कहानी भी बन जाती है। हमारे भीतर भी कभी अहंकार बढ़ता है, कभी भय हमें कमजोर करता है, कभी मोह हमारे निर्णयों को प्रभावित करता है और कभी कठिन परिस्थितियां हमें अपने मार्ग से भटका देती हैं। ऐसे समय में विष्णु तत्व का अर्थ है संतुलन, धैर्य, करुणा, कर्तव्य और धर्म को याद रखना। सृष्टि का चक्र चलता रहता है, समय बदलता रहता है, परिस्थितियां आती-जाती रहती हैं, लेकिन सत्य और संतुलन की खोज कभी समाप्त नहीं होती। और शायद भगवान विष्णु की सबसे बड़ी सीख यही है कि संसार को बचाने के लिए हमेशा किसी चमत्कार की आवश्यकता नहीं होती। कभी किसी की सहायता करना भी संरक्षण है, किसी दुखी को सहारा देना भी संरक्षण है, अन्याय के सामने सत्य बोलना भी धर्म की रक्षा है और अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर किसी दूसरे के जीवन में प्रकाश बन जाना भी उसी दिव्य शक्ति की अभिव्यक्ति है। इसलिए जब भी आप अपने आसपास किसी व्यक्ति को निस्वार्थ भाव से किसी दूसरे की रक्षा करते देखें, किसी भूखे को भोजन मिलता देखें या किसी कठिन परिस्थिति में कोई इंसान धैर्य और करुणा के साथ सही निर्णय लेता देखें, तो याद रखिए कि पुराणों में वर्णित विष्णु तत्व को समझने का यही सबसे सरल मार्ग हो सकता है। सृष्टि की शुरुआत से लेकर आज तक समय अनगिनत बार बदला, युग बदले, राजवंश बदले और मनुष्य की परिस्थितियां बदलीं, लेकिन धर्म और अधर्म के बीच का संघर्ष निरंतर चलता रहा। इसी संघर्ष में भगवान विष्णु की कथाएं मनुष्य को बार-बार यही स्मरण कराती हैं कि जब संतुलन बिगड़ता है तो उसे पुनः स्थापित करना आवश्यक है, जब अहंकार बढ़ता है तो विनम्रता की आवश्यकता होती है और जब अंधकार गहरा होता है तो प्रकाश की खोज करनी चाहिए। भगवान विष्णु की कथा इसलिए केवल एक देवता की कथा नहीं, बल्कि सृष्टि, चेतना, समय, कर्म, धर्म और संतुलन की एक विशाल आध्यात्मिक यात्रा है। अनंत कारण सागर से लेकर ब्रह्मा के प्राकट्य तक, दशावतारों से लेकर कल्कि की भविष्यवाणी तक, यह यात्रा हमें एक ही विचार की ओर ले जाती है कि सृष्टि में परिवर्तन अनिवार्य है, लेकिन धर्म और संतुलन की खोज कभी समाप्त नहीं होती। जय श्री हरि।
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