ShareChat
click to see wallet page
search
#मेरे विचार #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏 प्रेरणादायक विचार
मेरे विचार - अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते। Iగైన బfEFTTIT: तेउपि चातितरन्त्येव || परन्तु इनसे दूसरे अर्थात्  पुरुप সথানূ নলন हैेँ, वे इस प्रकार न जानते हुए  दूसरोंसे সানননাল सुनकर ही तदनुसार उपासना पुरुपौंसे करते हैं और वे श्रवणपरायण पुरुप भी मृत्युरूप संसार - सागरको निःसन्देह तर जाते हैं Il २५ Il यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्। क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्पभ ।। हे अर्जुन! यावन्मात्र जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी उत्पन्न होते हैं॰ उन सबको तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे ही उत्पन्न जान II २६ ।I # तिष्ठन्तं   परमेश्वरम्। भूतेपु समं विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति I। होते हुए जो पुरुप   नष्ट भूतोंमें ٦٩ चराचर परमेश्वरको नाशरहित और समभावसे स्थित देखता है, वही यथार्थ देखता हैं Il २७ Il समं   पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्। न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्।।  क्योकिजो पुरुप सवमें समभावसे स्थित परमेश्वरको समान देखता हुआ अपने द्वारा अपनेको नष्ट नहों करता , इससे वह परम गतिको प्राप्त होता हैं Il २८ I श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १३ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते। Iగైన బfEFTTIT: तेउपि चातितरन्त्येव || परन्तु इनसे दूसरे अर्थात्  पुरुप সথানূ নলন हैेँ, वे इस प्रकार न जानते हुए  दूसरोंसे সানননাল सुनकर ही तदनुसार उपासना पुरुपौंसे करते हैं और वे श्रवणपरायण पुरुप भी मृत्युरूप संसार - सागरको निःसन्देह तर जाते हैं Il २५ Il यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्। क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्पभ ।। हे अर्जुन! यावन्मात्र जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी उत्पन्न होते हैं॰ उन सबको तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे ही उत्पन्न जान II २६ ।I # तिष्ठन्तं   परमेश्वरम्। भूतेपु समं विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति I। होते हुए जो पुरुप   नष्ट भूतोंमें ٦٩ चराचर परमेश्वरको नाशरहित और समभावसे स्थित देखता है, वही यथार्थ देखता हैं Il २७ Il समं   पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्। न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्।।  क्योकिजो पुरुप सवमें समभावसे स्थित परमेश्वरको समान देखता हुआ अपने द्वारा अपनेको नष्ट नहों करता , इससे वह परम गतिको प्राप्त होता हैं Il २८ I श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १३ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat