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> चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः। > आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च॥१॥ [ ऋग्वेद संहिता १.११५.१ ] अर्थात 👉🏻देवताओं का अद्भुत मुखमण्डल उदित हुआ , जो मित्र , वरुण ( जल ) एवं अग्नि का नेत्र है । उसने द्युलोक , पृथ्वी तथा अन्तरिक्ष को भर दिया । सूर्य चर-अचर जगत की आत्मा है । { संसार में हमको जितनी प्रकार की शक्तियाँ दिखाई देती हैं उन समस्त का मूल सूर्य में ही निहित है । जल का बहना , वायु का चलना , अग्नि का जलना , पृथ्वी का भाँति−भाँति की वनस्पतियों को उत्पन्न करना आदि सबका आधार सूर्य ही है । वास्तविकता तो यह है कि हमारी पृथ्वी , ग्रह , उपग्रह सब सूर्य से ही उत्पन्न हुए हैं एवं उसी के द्वारा पाले जा रहे हैं । इसलिए पंचतत्वों से उत्पन्न कोई भी पदार्थ अथवा प्राणी सूर्य की शक्ति के द्वारा ही अपने अस्तित्व को स्थिर रखता है , वृद्धि को प्राप्त होता है एवं समयानुसार परिवर्तित रूप को ग्रहण करता है । साधारणतः लोग सूर्य को केवल प्रकाश तथा उष्णता का साधन मानते हैं तथा उससे रोगों के निवारण का कार्य भी लेते हैं । किन्तु सूर्य का महत्व इससे कहीं अधिक है औऱ वह मनुष्य के लिए भोजन अथवा आहार का काम भी देता है । यदि सूर्य प्रकाश ठीक ढंग से न मिले या उससे बिल्कुल ही वंचित रहना पड़े तो मनुष्य थोड़े समय में अवश्य ही निर्बल तथा अस्वस्थ हो जायेगा । } 🌄🌄 प्रभात वंदन 🌄🌄 #शुभ रविवार
शुभ रविवार - ShareChat