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#satnam waheguru ji #satnam shri waheguru ji #Meetha Lage Tera bhana
satnam waheguru ji - सुखु नाही बहुतै धनि खाटेगा सुखु नाही पेखे निरति नाटे।। सुखु नाही बहु देस कमाएँग सरब सुखा हरि हरि गुण गाए। अर्थः बहुत सारा धन कमा लेने या दौलत के ढेर लगा लेने से मन को वास्तविक शांति या सुख प्राप्त नहीं होती। धन सुविधाएं तो दे मीठा सकता है, लेकिन संतुष्टि और मानसिक शांति नहीं। तृष्णा हमेशा है। तरहन्तरह के नाच गाने , मनोरंजन या तमाशों को बनी रहती देखने में भी स्थायी सुख नहीं है। इंद्रियों के स्वाद और मनोरंजन क्षणिक होते हैं। जब तमाशा खत्म होता है, तो इंसान फिर से उसी लगे बहुत से देशों को जीत लेने खालीपन और उदासी में लौट आता है। या दुनिया भर की यात्रा करने से भी आत्मा को चैन नहीं मिलता। बाहरी विस्तार से अहंकार तो बढ सकता है, लेकिन अंतर्मन की तेरा व्याकुलता शांत नहीं होती है। असली संपूर्ण सुख केवल परमात्मा के गुण गाने और उस जुड़ने में है। : जब मनुष्य अपनी चेतना अनंत शक्ति के साथ को उस परमात्मा या सत्य से जोड़ लेता है, तब उसे वह भाणा आनंद मिलता है जो धन , मनोरंजन या सत्ता से कहीं ऊपर जी स्पष्ट कर रहे हैं कि संसार की वस्तुएं साधन हो है। गुरु ` सकती हैं, लेकिन साध्य (लक्ष्य) नहीं। असली खजाना आपके भीतर है। बाहर की दौड़ आपको थका सकती है, परमात्मा की याद और सादगी आपको तृप्त हरि गुण ' लेकिन करती है। सुखु नाही बहुतै धनि खाटेगा सुखु नाही पेखे निरति नाटे।। सुखु नाही बहु देस कमाएँग सरब सुखा हरि हरि गुण गाए। अर्थः बहुत सारा धन कमा लेने या दौलत के ढेर लगा लेने से मन को वास्तविक शांति या सुख प्राप्त नहीं होती। धन सुविधाएं तो दे मीठा सकता है, लेकिन संतुष्टि और मानसिक शांति नहीं। तृष्णा हमेशा है। तरहन्तरह के नाच गाने , मनोरंजन या तमाशों को बनी रहती देखने में भी स्थायी सुख नहीं है। इंद्रियों के स्वाद और मनोरंजन क्षणिक होते हैं। जब तमाशा खत्म होता है, तो इंसान फिर से उसी लगे बहुत से देशों को जीत लेने खालीपन और उदासी में लौट आता है। या दुनिया भर की यात्रा करने से भी आत्मा को चैन नहीं मिलता। बाहरी विस्तार से अहंकार तो बढ सकता है, लेकिन अंतर्मन की तेरा व्याकुलता शांत नहीं होती है। असली संपूर्ण सुख केवल परमात्मा के गुण गाने और उस जुड़ने में है। : जब मनुष्य अपनी चेतना अनंत शक्ति के साथ को उस परमात्मा या सत्य से जोड़ लेता है, तब उसे वह भाणा आनंद मिलता है जो धन , मनोरंजन या सत्ता से कहीं ऊपर जी स्पष्ट कर रहे हैं कि संसार की वस्तुएं साधन हो है। गुरु ` सकती हैं, लेकिन साध्य (लक्ष्य) नहीं। असली खजाना आपके भीतर है। बाहर की दौड़ आपको थका सकती है, परमात्मा की याद और सादगी आपको तृप्त हरि गुण ' लेकिन करती है। - ShareChat