.🙏श्रीकृष्ण प्राणवल्लभा–‘राधा’🙏
श्रीराधाजी भगवान् श्रीकृष्ण की परम प्रिया हैं तथा उनकी अभिन्न मूर्ति भी। राधाजी भगवान् श्रीकृष्ण के प्राणों की अघिष्ठात्री देवी हैं, अत: भगवान् इनके अधीन रहते हैं। श्रीराधाजी का एक नाम कृष्णवल्लभा भी है क्योंकि वे श्रीकृष्ण को आनन्द प्रदान करने वाली हैं।
भगवान् श्रीकृष्ण दो रूपों में प्रकट हैं–द्विभुज और चतुर्भुज। चतुर्भुज रूप में वे बैकुण्ठ में देवी लक्ष्मी, सरस्वती, गंगा और तुलसी के साथ वास करते हैं परन्तु द्विभुज रूप में वे गौलोक धाम में राधाजी के साथ वास करते हैं। राधा-कृष्ण का प्रेम इतना गहरा था कि एक को कष्ट होता तो उसकी पीड़ा दूसरे को अनुभव होती। राधाजी श्रीकृष्ण का अभिन्न भाग हैं।
इस तथ्य को इस कथा से समझा जा सकता है कि वृन्दावन में श्रीकृष्ण को जब दिव्य आनन्द की अनुभूति हुई तब वह दिव्यानन्द ही साकार होकर बालिका के रूप में प्रकट हुआ और श्रीकृष्ण की यह प्राण शक्ति ही राधाजी हैं।
राधाजी का नाम कृष्ण से भी पहले लिया जाता है।
राधा नाम के जाप से श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं और भक्तों पर दया करते हैं।
राधाजी का श्रीकृष्ण के लिए प्रेम नि:स्वार्थ था तथा उसके लिए वे किसी भी तरह का त्याग करने को तैयार थीं। राधाजी ने यह कहकर अपनी चरण धूलि दी कि भले ही मुझे 100 नरकों का पाप भोगना पडे तो भी मैं अपने प्रिय के स्वास्थ्य लाभ के लिए चरण धूलि अवश्य दूँगी।
श्रीकृष्ण का राधा से इतना प्रेम था कि कमल के फूल में राधाजी की छवि की कल्पना मात्र से वो बेहोश हो गये तभी तो विद्ववत जनों ने कहा
राधा तू बडभागिनी, कौन पुण्य तुम कीन।
तीन लोक तारन तरन सो तोरे आधीन॥ जय जय श्री राधे॥
#जय श्री राधे


