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- ♥️💔#🙏 जय जगन्नाथ1322
- Ariyan Singh#🚩🙏जय श्री जगन्नाथ महाप्रभु 🙏🚩 #जय श्री जगन्नाथ 🚩🙏🏻🔱🌞 #🚩🏵️ जय श्री जगन्नाथ पुरी मंदिर उड़ीसा 🏵️🚩626
- sn vyas#🚩🙏जय श्री जगन्नाथ महाप्रभु 🙏🚩 #श्री जगन्नाथ भगवान की जय #जय जगन्नाथ #जगन्नाथ यात्रा #जगन्नाथ भगवान #भगवान जगन्नाथ #जय श्री कृष्णा #🙏 जय जगन्नाथ बहुत समय पहले की बात है। नीलाचल धाम, श्री जगन्नाथ पुरी में वार्षिक रथ यात्रा का भव्य उत्सव चल रहा था। चारों दिशाओं से लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और माता सुभद्रा के दर्शन के लिए पुरी पहुंचे थे। पूरा नगर "जय जगन्नाथ" के जयघोष, शंखध्वनि, मृदंग और कीर्तन से गूंज रहा था। मंदिर के विशाल प्रांगण में श्रद्धालुओं की ऐसी भीड़ उमड़ी थी कि कदम रखने तक की जगह नहीं बची थी। हर भक्त के चेहरे पर अपने प्रभु के दर्शन की लालसा और महाप्रसाद पाने की आशा झलक रही थी। कोई दूर-दराज के गांवों से पैदल आया था, कोई जंगलों और पहाड़ों को पार करके पहुंचा था, तो कोई कई दिनों की कठिन यात्रा के बाद पहली बार श्रीक्षेत्र के दर्शन करने आया था। उसी भीड़ में एक वृद्ध विधवा अपने दो छोटे पोतों के साथ धीरे-धीरे मंदिर की ओर बढ़ रही थी। उसके वस्त्र पुराने थे, पैरों में चप्पल भी नहीं थी और चेहरे पर लंबी यात्रा की थकान साफ दिखाई दे रही थी। उसके साथ एक गरीब किसान भी था, जिसने रास्ते भर उन बच्चों को सहारा दिया था। तीनों के पास खाने के लिए कुछ भी नहीं बचा था। यात्रा के दौरान जो थोड़ा-बहुत भोजन साथ लाए थे, वह दो दिन पहले ही समाप्त हो चुका था। बच्चे भूख से व्याकुल थे, लेकिन उनकी दादी उन्हें बार-बार समझाती, "बेटा, धैर्य रखो। हम जगन्नाथ के घर आए हैं। यहां से कोई भक्त भूखा नहीं लौटता। प्रभु अपने बच्चों का ध्यान अवश्य रखते हैं।" मंदिर के भीतर उस दिन महाप्रसाद की व्यवस्था करने वाले सेवकों पर असाधारण दबाव था। रसोई में सैकड़ों रसोइए लगातार भोजन बना रहे थे। विशाल हांड़ियों में खिचड़ी, दाल, सब्जियां और भोग तैयार हो रहे थे। लेकिन श्रद्धालुओं की संख्या इतनी अधिक थी कि भोजन कम पड़ने लगा। सेवक चिंतित थे। कई भक्तों को प्रसाद मिल गया, लेकिन हजारों लोग अब भी प्रतीक्षा कर रहे थे। कुछ निराश होकर लौटने लगे। किसी ने कहा, "आज शायद हमें प्रसाद नहीं मिलेगा।" यह सुनकर कई वृद्ध, महिलाएं और बच्चे उदास हो गए। उसी समय भगवान जगन्नाथ अपने दिव्य सिंहासन से यह दृश्य देख रहे थे। उन्होंने देखा कि उनके अपने भक्त भूखे लौट रहे हैं। उनके करुणामय हृदय में पीड़ा उमड़ पड़ी। उन्होंने माता लक्ष्मी की ओर देखा और गंभीर स्वर में कहा, "देवी, मेरे द्वार से यदि कोई भक्त भूखा लौट जाए, तो इससे बड़ा दुख मेरे लिए और क्या हो सकता है?" माता लक्ष्मी ने मधुर मुस्कान के साथ उत्तर दिया, "प्रभु, आज आपके भक्तों की नहीं, आपकी करुणा की परीक्षा है।" इतना सुनते ही भगवान जगन्नाथ ने बिना एक क्षण विलंब किए अपना दिव्य रूप त्याग दिया। उन्होंने एक साधारण ग्रामीण युवक का रूप धारण किया। उनके शरीर पर साधारण धोती थी, सिर पर एक कपड़ा बंधा था और चेहरे पर अत्यंत सरल, मधुर मुस्कान थी। उन्हें देखकर कोई भी यह नहीं पहचान सकता था कि यही स्वयं जगत के पालनहार हैं। वे चुपचाप मंदिर के पीछे स्थित उस विशाल आंगन में पहुंचे जहां कुछ वृद्ध महिलाएं और सेवक जल्दी-जल्दी आटा गूंध रहे थे, ताकि जितना संभव हो सके उतने लोगों के लिए रोटियां तैयार की जा सकें। युवक बिना कुछ कहे वहीं बैठ गया। उसने अपने हाथों में आटा लिया और बड़े प्रेम से रोटियां बेलने लगा। पास बैठी एक वृद्धा मुस्कुराकर बोली, "बेटा, लगता है पहले कभी रोटियां नहीं बनाई।" युवक भी मुस्कुराया और बोला, "मां, आज पहली बार अपने परिवार के लिए बना रहा हूं।" उसके उत्तर में ऐसी आत्मीयता थी कि वहां बैठे सभी लोग सहज ही उसके अपने बन गए। धीरे-धीरे सभी भक्त उसके साथ मिलकर काम करने लगे। कोई आटा गूंधने लगा, कोई रोटियां बेलने लगा, कोई तवे पर सेंकने लगा और कोई घी लगा-लगाकर उन्हें टोकरी में रखने लगा। कुछ ही देर बाद एक अद्भुत चमत्कार होने लगा। जितना आटा उपयोग किया जाता, परात में उससे कहीं अधिक आटा अपने आप दिखाई देने लगता। घी का पात्र कभी खाली नहीं होता। लकड़ियां समाप्त होने का नाम नहीं लेतीं। रोटियां इतनी तेजी से बनने लगीं कि कोई गिन भी नहीं पा रहा था। पूरे आंगन में ताजी रोटियों की सुगंध फैल गई। भूखे बैठे भक्तों को गरमागरम रोटियां और महाप्रसाद मिलने लगा। बच्चों के चेहरे खिल उठे। वृद्धों की आंखों में संतोष के आंसू आ गए। कोई कह रहा था, "इतना स्वादिष्ट भोजन जीवन में कभी नहीं खाया।" कोई हाथ जोड़कर बार-बार भगवान का नाम ले रहा था। वह वृद्ध विधवा भी अपने दोनों पोतों के साथ वहीं बैठ गई। जैसे ही उसके हाथ में गरम रोटी आई, उसकी आंखें भर आईं। उसने रोटी को माथे से लगाया और बोली, "प्रभु, मुझे पता था कि आप अपने बच्चों को भूखा नहीं रहने देंगे।" उसके दोनों पोते प्रेम से भोजन करने लगे। कई दिनों बाद उनके चेहरे पर मुस्कान लौटी थी। गरीब किसान भी प्रसाद ग्रहण करते हुए बार-बार भगवान का धन्यवाद कर रहा था। उधर मंदिर के सेवकों को आश्चर्य हुआ कि जिन भक्तों को प्रसाद नहीं मिल पाया था, वे सब अचानक तृप्त होकर लौट रहे हैं। उन्होंने देखा कि मंदिर के पीछे हजारों लोगों को भोजन कराया जा रहा है। वे दौड़ते हुए वहां पहुंचे। उनके सामने रोटियों के विशाल ढेर लगे थे। घी, आटा और भोजन जैसे समाप्त ही नहीं हो रहे थे। मुख्य पुजारी भी वहां पहुंचे। उन्होंने चारों ओर देखा और पूछा, "यह सब किसने किया?" लोगों ने उस साधारण युवक की ओर इशारा करना चाहा, लेकिन वह कहीं दिखाई नहीं दिया। वह बिना किसी को बताए चुपचाप वहां से जा चुका था। मुख्य पुजारी कुछ क्षण मौन रहे। फिर उनकी आंखों से आंसू बह निकले। उन्होंने कांपते स्वर में कहा, "यह कोई साधारण मनुष्य नहीं था। आज स्वयं महाप्रभु जगन्नाथ अपने भक्तों की सेवा करने आए थे। उन्होंने ही अपने हाथों से रोटियां बनाईं और अपने बच्चों की भूख मिटाई।" यह सुनते ही वहां उपस्थित सभी भक्त "जय जगन्नाथ" के उद्घोष से गूंज उठे। पूरा वातावरण भक्ति और प्रेम से भर गया। जब पुजारी गर्भगृह में पहुंचे तो उन्होंने देखा कि भगवान जगन्नाथ के श्रीविग्रह के हाथों पर आटे की हल्की परत लगी हुई थी और उनके अधरों पर वैसी ही मधुर मुस्कान थी जैसी उस ग्रामीण युवक के चेहरे पर थी। अब किसी के मन में कोई संदेह नहीं रहा। सभी समझ गए कि प्रभु ने स्वयं अपने भक्तों की सेवा की है। यह समाचार कुछ ही समय में पूरे श्रीक्षेत्र में फैल गया। लोग एक-दूसरे से कहते, "आज हमने अपनी आंखों से देखा कि भगवान केवल मंदिर में विराजमान नहीं रहते, वे अपने भक्तों के बीच भी आते हैं।" उस दिन के बाद से पुरी धाम में यह विश्वास और भी गहरा हो गया कि भगवान जगन्नाथ को राजसी वैभव से अधिक अपने भक्तों की सेवा प्रिय है। उन्हें सोने-चांदी के महलों से अधिक वह स्थान प्रिय है जहां किसी भूखे को प्रेम से भोजन कराया जाता है। वे उसी रोटी को सबसे उत्तम भोग मानते हैं जो अहंकार से नहीं, सेवा, करुणा और निष्काम प्रेम से बनाई गई हो। आज भी श्री जगन्नाथ धाम में यह कथा श्रद्धा के साथ सुनाई जाती है कि जब भी कोई भूखा प्रेम से प्रभु को पुकारता है, भगवान किसी न किसी रूप में उसकी सहायता अवश्य करते हैं। वे केवल सिंहासन पर विराजने वाले देवता नहीं, बल्कि अपने भक्तों के सुख-दुख में सहभागी बनने वाले करुणामय पिता हैं। यही कारण है कि भक्त पूरे विश्वास के साथ कहते हैं—जिसके सिर पर जगन्नाथ का हाथ हो, वह कभी भूखा, असहाय या अकेला नहीं रह सकता। जय जगन्नाथ।613
- sn vyas#🙏 जय जगन्नाथ ओडिशा के पवित्र नगर पुरी में, जहाँ समुद्र की लहरें भी मानो "जय जगन्नाथ" का जाप करती थीं, वहीं भगवान जगन्नाथ का विशाल मंदिर करोड़ों भक्तों की आस्था का केंद्र था। हर सुबह मंदिर की घंटियाँ बजते ही भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती। कोई आँखों में आँसू लिए प्रभु से प्रार्थना करता, तो कोई महाप्रसाद पाकर स्वयं को धन्य समझता। पूरे नगर में भक्ति, सेवा और विश्वास का वातावरण था। लेकिन उसी पुरी में एक ऐसा व्यक्ति भी रहता था, जिसके हृदय में धन का घमंड भगवान से भी बड़ा हो चुका था। उसका नाम था धनंजय सेठ। दूर-दूर तक उसका व्यापार फैला हुआ था। सोने-चाँदी से भरे खजाने, अनाज से लबालब गोदाम, नौकर-चाकरों से भरी हवेली और समुद्र में चलते उसके विशाल व्यापारिक जहाज़—सब कुछ उसके पास था। लोग उसे सफल कहते थे, लेकिन सफलता के साथ उसका अहंकार भी आसमान छूने लगा था। वह अक्सर कहा करता, "दुनिया में धन से बड़ा कोई देवता नहीं। मेहनत और पैसा ही इंसान की असली ताकत है।" एक दिन उसके कर्मचारियों ने विनम्रता से कहा, "सेठ जी, रथयात्रा का शुभ समय आ गया है। पूरा नगर भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए जा रहा है। यदि आप भी चलें तो बड़ा पुण्य मिलेगा।" धनंजय व्यंग्य से हँस पड़ा। उसने कहा, "दर्शन से व्यापार नहीं चलता। पत्थर की मूर्तियाँ किसी की किस्मत नहीं बदलतीं। धन कमाना ही सबसे बड़ा धर्म है।" उसकी बात सुनकर सभी कर्मचारी चुप हो गए। उसी समय वहाँ से मंदिर के एक वृद्ध पुजारी गुज़रे। उन्होंने शांत स्वर में कहा, "बेटा, धन से सुख खरीदा जा सकता है, लेकिन शांति नहीं। अहंकार मनुष्य को बाहर से नहीं, भीतर से निर्धन बना देता है।" धनंजय मुस्कराया और बोला, "अगर आपके भगवान में इतनी शक्ति है, तो वे स्वयं आकर मुझे समझा दें।" पुजारी ने उसकी ओर करुणा से देखा और बोले, "कभी-कभी भगवान दंड देने नहीं, बदलने आते हैं। लेकिन जब वे आते हैं, तब मनुष्य का जीवन पहले जैसा नहीं रहता।" धनंजय ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया और अपनी हवेली लौट गया। उसे क्या पता था कि उसके जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा अब आरंभ होने वाली है। उस रात समुद्र की ठंडी हवाएँ बह रही थीं। नगर शांत था। तभी उसकी हवेली के मुख्य द्वार पर किसी ने धीरे से दस्तक दी। सेवक ने द्वार खोला तो सामने एक साधारण वस्त्र पहने वृद्ध यात्री खड़े थे। उनके चेहरे पर अद्भुत तेज था, लेकिन वेश बिल्कुल सामान्य। उन्होंने विनम्रता से कहा, "बेटा, कई दिनों से यात्रा पर हूँ। बहुत भूखा हूँ। यदि थोड़ा भोजन और रातभर विश्राम करने की जगह मिल जाए तो बड़ी कृपा होगी।" इतने में धनंजय स्वयं वहाँ आ पहुँचा। उसने वृद्ध को ऊपर से नीचे तक देखा और कठोर स्वर में बोला, "यह कोई धर्मशाला नहीं है। जाओ, मंदिर में माँग लो। लोग कहते हैं तुम्हारा भगवान सबकी सहायता करता है।" वृद्ध ने शांत मुस्कान के साथ कहा, "याद रखना बेटा... जो दूसरों के लिए अपना द्वार बंद कर देता है, उसके लिए भाग्य के द्वार भी एक दिन बंद हो जाते हैं।" इतना कहकर वे धीरे-धीरे अंधेरे में चले गए। धनंजय ने उपहास करते हुए दरवाज़ा बंद कर दिया। अगली ही सुबह उसके जीवन में पहला आघात आया। बंदरगाह से समाचार मिला कि उसका सबसे बड़ा व्यापारिक जहाज़ समुद्र में आए भीषण तूफ़ान में डूब गया। लाखों की संपत्ति एक ही रात में समाप्त हो गई। वह अभी इस आघात से उबर भी नहीं पाया था कि दूसरा कर्मचारी दौड़ता हुआ आया। "सेठ जी! दक्षिण वाले गोदाम में आग लग गई है। पूरा अनाज जलकर राख हो गया।" धनंजय तुरंत वहाँ पहुँचा। आग इतनी भयंकर थी कि देखते ही देखते वर्षों की कमाई धुएँ में बदल गई। फिर भी उसका घमंड पूरी तरह नहीं टूटा। उसने स्वयं को समझाया, "धन गया है, फिर आ जाएगा।" लेकिन भगवान की लीला अभी पूरी कहाँ हुई थी। कुछ ही दिनों में उसके व्यापारिक साझेदार उससे दूर होने लगे। जिन लोगों ने कभी उसकी प्रशंसा की थी, वही लोग अब मुँह फेरने लगे। बाज़ार में उसकी साख गिर गई। कर्ज़ बढ़ने लगा। और तभी सबसे बड़ा आघात आया। उसकी इकलौती बेटी गौरी गंभीर रूप से बीमार पड़ गई। बड़े-बड़े वैद्य बुलाए गए, दुर्लभ औषधियाँ मँगाई गईं, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। अंत में वैद्य ने निराश होकर कहा, "अब इसकी रक्षा केवल भगवान ही कर सकते हैं।" उस रात गौरी ने कमजोर आवाज़ में पूछा, "पिताजी... क्या भगवान जगन्नाथ सचमुच सबकी सुनते हैं?" धनंजय के पास कोई उत्तर नहीं था। कुछ देर बाद उसने फिर पूछा, "अगर वे सबकी सुनते हैं... तो क्या मेरी भी सुनेंगे?" यह सुनकर पहली बार धनंजय का कठोर हृदय टूट गया। उसकी आँखों से आँसू बह निकले। वर्षों बाद वह अपने घर के मंदिर में गया। वहाँ रखा दीपक स्वयं अपने हाथों से जलाया और काँपती आवाज़ में बोला— "प्रभु... यदि आप सचमुच हैं... तो मेरी बेटी को बचा लीजिए। मैंने जीवन भर आपका अपमान किया। मुझे मेरे अपराधों का दंड दीजिए, लेकिन मेरी बेटी को जीवन दे दीजिए।" उसी क्षण बिना हवा के दीपक की लौ तेज़ हो उठी। पूरे कक्ष में चंदन की दिव्य सुगंध फैल गई। मंदिर की घंटी अपने आप बजने लगी। धनंजय ने आश्चर्य से चारों ओर देखा। तभी उसे वही परिचित करुणामयी आवाज़ सुनाई दी— "जिस हृदय में सच्चा पश्चाताप जन्म ले लेता है, वहाँ मेरी कृपा का द्वार स्वयं खुल जाता है।" अगली सुबह वह अपनी बेटी को लेकर भगवान जगन्नाथ के मंदिर पहुँचा। मंदिर में आरती चल रही थी। शंख और घंटियों की ध्वनि वातावरण को अलौकिक बना रही थी। वहीं उसे वही वृद्ध पुजारी मिले। उन्होंने मुस्कुराकर पूछा, "बेटा, अब तुम्हारी आँखों में घमंड नहीं दिखाई देता।" धनंजय रो पड़ा। उसने सारी घटना सुनाई और पूछा, "वह वृद्ध यात्री कौन थे?" पुजारी ने भगवान जगन्नाथ की विशाल आँखों की ओर संकेत करते हुए कहा, "कभी-कभी प्रभु अपने भक्तों की परीक्षा लेने नहीं, उनका अहंकार तोड़ने साधारण मनुष्य का रूप धारण करते हैं।" धनंजय ने जैसे ही भगवान की ओर देखा, उसे वही मुस्कान, वही करुणा और वही दृष्टि दिखाई दी, जो उस वृद्ध यात्री के चेहरे पर थी। वह फूट-फूटकर रो पड़ा। "प्रभु... उस दिन मेरे द्वार पर आप स्वयं आए थे... और मैं आपको पहचान नहीं सका।" उसी समय उसकी बेटी गौरी, जो कई दिनों से बिस्तर पर थी, धीरे-धीरे उठकर अपने पैरों पर खड़ी हो गई। उसके चेहरे पर मुस्कान लौट आई। वैद्य आश्चर्यचकित रह गए। पुजारी ने केवल इतना कहा, "जहाँ मनुष्य की शक्ति समाप्त होती है, वहीं से ईश्वर की कृपा प्रारंभ होती है।" उस दिन के बाद धनंजय का जीवन पूरी तरह बदल गया। उसने अपने गोदाम गरीबों के लिए खोल दिए। प्रतिदिन महाप्रसाद वितरण करवाने लगा। यात्रियों के लिए धर्मशालाएँ बनवाईं। अनाथ बच्चों की शिक्षा का भार उठाया। और सबसे पहले उसने अपने घर का मुख्य द्वार हमेशा के लिए खुला रखने का आदेश दिया। वर्षों बाद लोग उसे उसके धन से नहीं, उसकी सेवा और विनम्रता से पहचानने लगे। जब भी कोई भूखा, असहाय या थका हुआ यात्री उसके द्वार पर आता, वह स्वयं बाहर निकलकर उसका स्वागत करता। क्योंकि उसके मन में हमेशा एक ही विचार रहता— "कहीं इस बार मेरे द्वार पर फिर से स्वयं प्रभु जगन्नाथ तो नहीं आए हैं?" इस कथा का संदेश आज भी उतना ही सत्य है जितना उस समय था। भगवान को सोना-चाँदी, महल और वैभव नहीं चाहिए। उन्हें चाहिए केवल निष्कपट प्रेम, विनम्रता और सच्ची भक्ति। जो अपने अहंकार को छोड़कर सच्चे मन से उनके चरणों में झुक जाता है, उसके लिए प्रभु कृपा के ऐसे द्वार खोल देते हैं, जिन्हें संसार की कोई शक्ति बंद नहीं कर सकती। जय जगन्नाथ। साभार~ पं देव शर्मा🔥2615
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- अजेय सुद (लंगा)#🚩🙏जय श्री जगन्नाथ महाप्रभु 🙏🚩 #😇प्रेरणा संग शुभकामना #🌅 सूर्योदय शुभकामनाएं #🕊 चहचहाती शुभकामनाएं #💕दिल वाली शुभकामनाएं1688
- SK8748#जय श्री कृष्णा #जय श्री कृष्ण #राधे राधे #🙏🌹 जय द्वारकाधीश 🌹🙏 #🙏 जय जगन्नाथ1K1K
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