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#satnam waheguru ji #satnam shri waheguru ji #Meetha Lage Tera bhana
satnam waheguru ji - जउ जानै मै कथनी करताण बिआपारी बसुधा जिउ फिरता ।। जिह हउमै मारी।l ٤٤٨ नानकता कउ मिले मुरारी।I G मीठा अर्थः यदि कोई व्यक्ति यह मान लेता है कि वह बहुत बड़ा ज्ञानी है और केवल धर्म की बातें करने में कुशल है, तो उसकी स्थिति उस लगे व्यापारी के समान है जो केवल लाभ की तलाश में पूरी धरती पर भटकता रहता है। यहाँ व्यापारी का अर्थ उस व्यक्ति से है जो बाहरी दिखावे और शब्दों के जाल में उलझा हुआ है, लेकिन उसके भीतर तेरा शांति या प्रभु का सच्चा प्रेम नहीं है। लेकिन जिस व्यक्ति ने साध संगत के माध्यम से अपने भीतर के अहंकार (हउमै) को खत्म कर दिया है, गुरु नानक देव जी कहते हैं कि उसे ही परमात्मा (मुरारी ) के भाणा दर्शन होते हैं परमात्मा की प्राप्ति ज्ञान की बड़ी बड़ी बातों से नहीं, बल्कि अहंकार को मिटाने और विनम्रता से होती है।केवल बातें करना काफी नहीं हैः अध्यात्म जीवन जीने का नाम है, बोलने का नहीं। परमात्मा और इंसान के बीच सबसे बड़ी दीवार मैं ( अहंकार ) की है। जब तक यह मैं है॰ तब तक वो (परमात्मा ) प्रकट नहीं होता।सत्संग ही वह स्थान है जहाँ अहंकार को गलाने की प्रेरणा और शक्ति मिलती है। मनुष्य कितने भी विद्वान क्यों न बन जाएँ, जब तक हृदय में विनम्रता नहीं आती, तब तक उसकी आध्यात्मिक अधूरी है। যাসা जउ जानै मै कथनी करताण बिआपारी बसुधा जिउ फिरता ।। जिह हउमै मारी।l ٤٤٨ नानकता कउ मिले मुरारी।I G मीठा अर्थः यदि कोई व्यक्ति यह मान लेता है कि वह बहुत बड़ा ज्ञानी है और केवल धर्म की बातें करने में कुशल है, तो उसकी स्थिति उस लगे व्यापारी के समान है जो केवल लाभ की तलाश में पूरी धरती पर भटकता रहता है। यहाँ व्यापारी का अर्थ उस व्यक्ति से है जो बाहरी दिखावे और शब्दों के जाल में उलझा हुआ है, लेकिन उसके भीतर तेरा शांति या प्रभु का सच्चा प्रेम नहीं है। लेकिन जिस व्यक्ति ने साध संगत के माध्यम से अपने भीतर के अहंकार (हउमै) को खत्म कर दिया है, गुरु नानक देव जी कहते हैं कि उसे ही परमात्मा (मुरारी ) के भाणा दर्शन होते हैं परमात्मा की प्राप्ति ज्ञान की बड़ी बड़ी बातों से नहीं, बल्कि अहंकार को मिटाने और विनम्रता से होती है।केवल बातें करना काफी नहीं हैः अध्यात्म जीवन जीने का नाम है, बोलने का नहीं। परमात्मा और इंसान के बीच सबसे बड़ी दीवार मैं ( अहंकार ) की है। जब तक यह मैं है॰ तब तक वो (परमात्मा ) प्रकट नहीं होता।सत्संग ही वह स्थान है जहाँ अहंकार को गलाने की प्रेरणा और शक्ति मिलती है। मनुष्य कितने भी विद्वान क्यों न बन जाएँ, जब तक हृदय में विनम्रता नहीं आती, तब तक उसकी आध्यात्मिक अधूरी है। যাসা - ShareChat