#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣6️⃣8️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
राजा पाण्डु की मृत्यु और माद्री का उनके साथ चितारोहण...(दिन 368)
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तं तथाधिगतं पाण्डुम्मृषयः सह चारणैः ।
अभ्येत्य सहिताः सर्वे शोकादश्रूण्यवर्तयन् ।। अस्तं गतमिवादित्यं सुशुष्कमिव सागरम् । दृष्ट्वा पाण्डुं नरव्याघ्रं शोचन्ति स्म महर्षयः ।। समानशोका ऋषयः पाण्डवाश्च बभूविरे । ते समाश्वासिते विप्रैः विलेपतुरनिन्दिते ।।
इस प्रकार मृत्यु-शय्या पर पड़े हुए पाण्डु के पास चारणों सहित सभी ऋषि-मुनि जुट आये और शोकवश आँसू बहाने लगे। अस्ताचल को पहुँचे हुए सूर्य तथा एकदम सूखे हुए समुद्र की भाँति नरश्रेष्ठ पाण्डु को देखकर सभी महर्षि शोकमग्न हो गये। उस समय ऋषियों को तथा पाण्डुपुत्रोंको समानरूप से शोक का अनुभव हो रहा था। ब्राह्मणों ने पाण्डु की दोनों सती-साध्वी रानियों को समझा-बुझाकर बहुत आश्वासन दिया, तो भी उनका विलाप बंद नहीं हुआ।
कुन्त्युवाच
हा राजन् कस्य नौ हित्वा गच्छसि त्रिदशालयम् ।। हा राजन् मम मन्दायाः कथं माद्रीं समेत्य वै। निधनं प्राप्तवान् राजन् मद्भाग्यपरिसंक्षयात् ।। युधिष्ठिरं भीमसेनमर्जुनं च यमावुभौ । कस्य हित्वा प्रियान् पुत्रान् प्रयातोऽसि विशाम्पते ।। नूनं त्वां त्रिदशा देवाः प्रतिनन्दन्ति भारत । यथा हि तप उग्रं ते चरितं विप्रसंसदि ।। आवाभ्यां सहितो राजन् गमिष्यसि दिवं शुभम् । आजमीढाजमीढानां कर्मणा चरितां गतिम् ।।
कुन्ती बोली- हा! महाराज! आप हम दोनोंको किसे सौंपकर स्वर्गलोकमें जा रहे हैं। हाय! मैं कितनी भाग्यहीना हूँ। मेरे राजा! आप किसलिये अकेली माद्रीसे मिलकर सहसा कालके गालमें चले गये। मेरा भाग्य नष्ट हो जानेके कारण ही आज यह दिन देखना पड़ा है। प्रजानाथ ! युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन तथा नकुल-सहदेव-इन प्यारे पुत्रोंको किसके जिम्मे छोड़कर आप चले गये? भारत ! निश्चय ही देवता आपका अभिनन्दन करते होंगे; क्योंकि आपने ब्राह्मणोंकी मण्डलीमें रहकर कठोर तपस्या की है। अजमीढकुलनन्दन ! आपके पूर्वजोंने पुण्य-कर्मोंद्वारा जिस गतिको प्राप्त किया है, उसी शुभ स्वर्गीय गतिको आप हम दोनों पत्नियोंके साथ प्राप्त करेंगे।
वैशम्पायन उवाच
(विलपित्वा भृशं त्वेवं निःसंज्ञे पतिते भुवि । युधिष्ठिरमुखाः सर्वे पाण्डवा वेदपारगाः ।
तेऽप्यागत्य पितुर्मूले निःसंज्ञाः पतिता भुवि ।। पाण्डोः पादौ परिष्वज्य विलपन्ति स्म पाण्डवाः ।।)
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! इस प्रकार अत्यन्त विलाप करके कुन्ती और माद्री दोनों अचेत हो पृथ्वीपर गिर पड़ीं। युधिष्ठिर आदि सभी पाण्डव वेदविद्यामें पारंगत हो चुके थे, वे भी पिताके समीप आकर संज्ञाशून्य हो पृथ्वीपर गिर पड़े। सभी पाण्डव पाण्डुके चरणोंको हृदयसे लगाकर विलाप करने लगे।
कुन्त्युवाच
अहं ज्येष्ठा धर्मपत्नी ज्येष्ठं धर्मफलं मम । अवश्यम्भाविनो भावान्मा मां माद्रि निवर्तय ।। २३ ।। अन्विष्यामीह भर्तारमहं प्रेतवशं गतम् । उत्तिष्ठ त्वं विसृज्यैनमिमान् पालय दारकान् ।। २४ ।।
अवाप्य पुत्रॉल्लब्धात्मा वीरपत्नीत्वमर्थये।
कुन्तीने कहा-माद्री ! मैं इनकी ज्येष्ठ धर्मपत्नी हूँ, अतः धर्मके ज्येष्ठ फलपर भी मेरा ही अधिकार है। जो अवश्यम्भावी बात है, उससे मुझे मत रोको। मैं मृत्युके वशमें पड़े हुए अपने स्वामीका अनुगमन करूँगी। अब तुम इन्हें छोड़कर उठो और इन बच्चोंका पालन करो। पुत्रोंको पाकर मेरा लौकिक मनोरथ पूर्ण हो चुका है; अब मैं पतिके साथ दग्ध होकर वीरपत्नीका पद पाना चाहती हूँ ।। २३-२४ ।।
माद्युवाच
अहमेवानुयास्यामि भर्तारमपलायिनम् ।
न हि तृप्तास्मि कामानां ज्येष्ठा मामनुमन्यताम् ।। २५ ।।
माद्री बोली- रणभूमिसे कभी पीठ न दिखानेवाले अपने पतिदेवके साथ मैं ही जाऊँगी; क्योंकि उनके साथ होनेवाले कामभोगसे मैं तृप्त नहीं हो सकी हूँ। आप बड़ी बहिन हैं, इसलिये मुझे आपको आज्ञा प्रदान करनी चाहिये ।। २५ ।।
मां चाभिगम्य क्षीणोऽयं कामाद् भरतसत्तमः ।
तमुच्छिन्द्यामस्य कामं कथं नु यमसादने ।। २६ ।।
ये भरतश्रेष्ठ मेरे प्रति आसक्त हो मुझसे समागम करके मृत्युको प्राप्त हुए हैं; अतः मुझे किसी प्रकार परलोकमें पहुँचकर उनकी उस कामवासनाकी निवृत्ति करनी चाहिये ।। २६ ।।
न चाप्यहं वर्तयन्ती निर्विशेषं सुनेषु ते ।
वृत्तिमार्ये चरिष्यामि स्पृशेदेनस्तथा च माम् ।। २७ ।।
आर्ये! मैं आपके पुत्रोंके साथ अपने सगे पुत्रोंकी भाँति बर्ताव नहीं कर सकूँगी। उस दशामें मुझे पाप लगेगा ।। २७ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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