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🌟|| धीरे-धीरे बढ़ते रहो ||🌟
तिनके-तिनके से घौंसला बनता है, बूँद-बूँद से सागर भरता है, ईंट-ईंट से महल का निर्माण होता है और कदम-कदम से ही हिमालय की ऊँचाई को पार किया जा सकता है। एक-एक फूल से माला का निर्माण होता है व माला पहनाये जाने वाले के सौंदर्य को और बढ़ा देती है। ऐसे ही हमारे छोटे-छोटे प्रयासों के पुष्प से ही विजयश्री की माला का निर्माण होता है जो जीवन को महका देती है।
लक्ष्य की ओर सदैव गतिमान रहना चाहिए। यदि हम दौड़ नहीं पाते हैं तो कोई बात नहीं बस ठहर नहीं जाना है। ठहर जाने की अपेक्षा धीरे-धीरे चलते रहना कई गुना बेहतर है। बैठा हुआ बाज भी पूरे दिन एक ही पेड़ पर रह जाता है और चलती हुई चींटी भी कई योजन की यात्रा कर लेती है। धीरे-धीरे ही सही बस अपने लक्ष्य की ओर सदैव बढ़ते रहने का हौसला रखो, देर तो हो सकती है, लेकिन हार नहीं होगी।🖋️
जय श्री राधे कृष्ण
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