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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣5️⃣2️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः पाण्डु का कुन्ती को पुत्र-प्राप्ति के लिये प्रयत्न करने का आदेश...(दिन 352) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ आत्मनो मृगशापेन जानन्नुपहतां क्रियाम् । सोऽब्रवीद् विजने कुन्तीं धर्मपत्नीं यशस्विनीम् । अपत्योत्पादने यत्नमापदि त्वं समर्थय ।। २७ ।। वे जानते थे कि मृगरूपधारी मुनिके शापसे मेरा संतानोत्पादन-विषयक पुरुषार्थ नष्ट हो चुका है। एक दिन वे अपनी यशस्विनी धर्मपत्नी कुन्तीसे एकान्तमें इस प्रकार बोले - 'देवि! यह हमारे लिये आपत्तिकाल है, इस समय संतानोत्पादनके लिये जो आवश्यक प्रयत्न हो, उसका तुम समर्थन करो ।। २७ ।। अपत्यं नाम लोकेषु प्रतिष्ठा धर्मसंहिता । इति कुन्ति विदुर्धीराः शाश्वतं धर्मवादिनः ।। २८ ।। इष्टं दत्तं तपस्तप्तं नियमश्च स्वनुष्ठितः । सर्वमेवानपत्यस्य न पावनमिहोच्यते ।। २९ ।। 'सम्पूर्ण लोकोंमें संतान ही धर्ममयी प्रतिष्ठा है- कुन्ती ! सदा धर्मका प्रतिपादन करनेवाले धीर पुरुष ऐसा ही मानते हैं। संतानहीन मनुष्य इस लोकमें यज्ञ, दान, तप और नियमोंका भलीभाँति अनुष्ठान कर ले, तो भी उसके किये हुए सब कर्म पवित्र नहीं कहे जाते ।। २८-२९ ।। सोऽहमेवं विदित्वैतत् प्रपश्यामि शुचिस्मिते । अनपत्यः शुभाँल्लोकान् न प्राप्स्यामीति चिन्तयन् ।। ३० ।। 'पवित्र मुसकानवाली कुन्तिभोजकुमारी! इस प्रकार सोच-समझकर मैं तो यही देख रहा हूँ कि संतानहीन होनेके कारण मुझे शुभ लोकोंकी प्राप्ति नहीं हो सकती। मैं निरन्तर इसी चिन्तामें डूबा रहता हूँ ।। ३० ।। मृगाभिशापान्नष्टं मे जननं ह्यकृतात्मनः । नृशंसकारिणो भीरु यथैवोपहतं पुरा ।। ३१ ।। 'मेरा मन अपने वशमें नहीं, मैं क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाला हूँ। भीरु! इसीलिये मृगके शापसे मेरी संतानोत्पादन-शक्ति उसी प्रकार नष्ट हो गयी है, जिस प्रकार मैंने उस मृगका वध करके उसके मैथुनमें बाधा डाली थी ।। ३१ ।। इमे वै बन्धुदायादाः षट् पुत्रा धर्मदर्शने । षडेवाबन्धुदायादाः पुत्रास्ताञ्छृणु मे पृथे ।। ३२ ।। 'पृथे! धर्मशास्त्रमें ये आगे बताये जानेवाले छः पुत्र 'बन्धुदायाद' कहे गये हैं, जो कुटुम्बी होनेसे सम्पत्तिके उत्तराधिकारी होते हैं और छः प्रकारके पुत्र 'अबन्धुदायाद' हैं, जो कुटुम्बी न होनेपर भी उत्तराधिकारी बताये गये हैं। इन सबका वर्णन मुझसे सुनो ।। ३२ ।। स्वयंजातः प्रणीतश्च तत्समः पुत्रिकासुतः। पौनर्भवश्च कानीनः भगिन्यां यश्च जायते ।। ३३ ।। 'पहला पुत्र वह है, जो विवाहिता पत्नीसे अपने द्वारा उत्पन्न किया गया हो; उसे 'स्वयंजात' कहते हैं। दूसरा प्रणीत कहलाता है, जो अपनी ही पत्नीके गर्भसे किसी उत्तम पुरुषके अनुग्रहसे उत्पन्न होता है। तीसरा जो अपनी पुत्रीका पुत्र हो, वह भी उसके ही समान माना गया है। चौथे प्रकार के पुत्र की पौनर्भवः संज्ञा है, जो दूसरी बार ब्याही हुई स्त्रीसे उत्पन्न हुआ हो। पाँचवें प्रकारके पुत्रकी कानीन संज्ञा है (विवाहसे पहले ही जिस कन्याको इस शर्तके साथ दिया जाता है कि इसके गर्भसे उत्पन्न होनेवाला पुत्र मेरा पुत्र समझा जायगा उस कन्याके पुत्रको 'कानीन' कहते हैं)। जो बहनका पुत्र (भानजा) है, वह छठा कहा गया है ।। ३३ ।। दत्तः क्रीतः कृत्रिमश्च उपगच्छेत् स्वयं च यः । सहोढो ज्ञातिरेताश्च हीनयोनिधृतश्च यः ।। ३४ ।। 'अब छः प्रकारके अबन्धुदायाद पुत्र कहे जाते हैं- दत्त (जिसे माता-पिताने स्वयं समर्पित कर दिया हो), क्रीत (जिसे धन आदि देकर खरीद लिया गया हो), कृत्रिम-जो स्वयं मैं आपका पुत्र हूँ, यों कहकर समीप आया हो, सहोढ (जो कन्यावस्थामें ही गर्भवती होकर ब्याही गयी हो, उसके गर्भसे उत्पन्न पुत्र सहोढ कहलाता है), ज्ञातिरेता (अपने कुलका पुत्र) तथा अपनेसे हीन जातिकी स्त्रीके गर्भसे उत्पन्न हुआ पुत्र। ये सभी अबन्धुदायाद हैं ।। ३४ ।। पूर्वपूर्वतमाभावं मत्वा लिप्सेत वै सुतम् । उत्तमादवराः पुंसः काङ्क्षन्ते पुत्रमापदि ।। ३५ ।। 'इनमेंसे पूर्व-पूर्वके अभावमें ही दूसरे दूसरे पुत्रकी अभिलाषा करे। आपत्तिकालमें नीची जातिके पुरुष श्रेष्ठ पुरुषसे भी पुत्रोत्पत्तिकी इच्छा कर सकते हैं ।। ३५ ।। अपत्यं धर्मफलदं श्रेष्ठं विन्दन्ति मानवाः । आत्मशुक्रादपि पृथे मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ।। ३६ ।। 'पृथे! अपने वीर्यके बिना भी मनुष्य किसी श्रेष्ठ पुरुषके सम्बन्धसे श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त कर लेते हैं और वह धर्मका फल देनेवाला होता है, यह बात स्वायम्भुव मनुने कही है ।। ३६ ।। तस्मात् प्रहेष्याम्यद्य त्वां हीनः प्रजननात् स्वयम् । सदृशाच्छ्रेयसो वा त्वं विद्धापत्यं यशस्विनि ।। ३७ ।। 'अतः यशस्विनी कुन्ती! मैं स्वयं संतानोत्पादनकी शक्तिसे रहित होनेके कारण तुम्हें आज दूसरेके पास भेजूंगा। तुम मेरे सदृश अथवा मेरी अपेक्षा भी श्रेष्ठ पुरुषसे संतान प्राप्त करो' ।। ३७ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डुपृथासंवादे ऊनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। ११९ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डु-पृथा-संवादविषयक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११९ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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