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परमात्मा मूलतः एक ही है। जो लोग ईश्वर के निराकार और साकार रूप को अलग-अलग मानकर विवाद करते हैं, वे भ्रम में हैं।ईश्वर वास्तव में इंद्रियों और बुद्धि से परे (अगम) है, उसका कोई भौतिक आकार नहीं है (अरूप), वह दिखाई नहीं देता (अलख) और वह जन्म-मरण से मुक्त है (अजन्मा)। लेकिन जब कोई भक्त उसे सच्चे हृदय से पुकारता है और उससे अगाध प्रेम करता है, तो वही निराकार ईश्वर अपने भक्त की प्रीति के कारण मानव या किसी अन्य सुंदर रूप में प्रकट हो जाता है। जैसे पानी और बर्फ में कोई अंतर नहीं है (पानी ही जमकर बर्फ बनता है), वैसे ही निर्गुण ब्रह्म ही भक्त के प्रेम के कारण सगुण रूप धारण करता है।
अगुनहिं सगुनहिं नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा॥अगम अरूप अलख अज जोई। भगत प्रेम बस सगुन सोई होई॥
अर्थ: निर्गुण (बिना आकार) और सगुण (आकार सहित) ईश्वर में कोई भेद नहीं है। जो अगम, अरूप और अजन्मा है, वही भक्तों के प्रेम के वश में होकर साकार हो जाता है।
संदेश: ईश्वर एक है: परमात्मा के रूपों में कोई अंतर नहीं है, रास्ते अलग हो सकते हैं पर गंतव्य एक है।प्रेम की शक्ति: भक्ति और प्रेम में इतनी शक्ति है कि वह अदृश्य और अजन्मा ईश्वर को भी साकार रूप में धरती पर आने के लिए विवश कर देती है।
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