MBA Pandit Ji
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भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा- प्रिय उद्धव ! मनुष्यों का मन कर्म-संस्कारों का पुंज है। उन संस्कारों के अनुसार भोग प्राप्त करने के लिये उसके साथ पाँच इन्द्रियाँ भी लगी हुई हैं। इसी का नाम है लिंगशरीर । वही कर्मों के अनुसार एक शरीर से दूसरे शरीर में, एक लोक से दूसरे लोक में आता-जाता रहता है। आत्मा इस लिंगशरीर से सर्वथा पृथक् है। उसका आना-जाना नहीं होता; परन्तु जब वह अपने को लिंगशरीर ही समझ बैठता है, उसी में अहंकार कर लेता है, तब उसे भी अपना जाना-आना प्रतीत होने लगता है। मन कर्मों के अधीन है। वह देखे हुए या सुने हुए विषयों का चिन्तन करने लगता है और क्षणभर में ही उनमें तदाकार हो जाता है तथा उन्हीं पूर्वचिन्तित विषयों में लीन हो जाता है। धीरे-धीरे उसकी स्मृति, पूर्वापर का अनुसन्धान भी नष्ट हो जाता है। श्रीमद्भागवत-महापुराण/११/२२/३६-३७ श्रीमद्भागवत-महापुराण/11/22/36-37 #PuranikYatra #MBAPanditJi #ब्रह्मवैवर्त_पुराण_कथा #shivmahapuran #shiv #shiva #शिवमहापुराण #bhavishypuran #vedpuran #puranam #upanishads #shrimadbhagwat #shrimadbhagwatkatha #bhagwatkatha #bhagwat #bhagwatkathalive #भागवत #भागवतकथा #श्रीमद्भगवद्गीता #श्रीमद्भागवत #श्राद्धकर्म #श्राद्धविधि #श्राद्धपक्ष #shradhpaksh #shradh #naradpuran #naradapuran #naradpurankatha #शिवमहापुराणकथा #shivmahapurankatha #ब्रह्मवैवर्तपुराण #hindu #sanatan #brahmvaivartpuran #भविष्यपुराण #उपनिषद #नारदपुराण #नारद_पुराण_कथा #PuranikYatra #MBAPanditJi
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