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#मेरो मन हरिजू! हठ न तजै
मेरो मन हरिजू! हठ न तजै - हरिजू! हठ न तजै। मेरो मन निसिदिन नाथ देउँ सिख बहु बिधि करत सुभाउ নিভীIIহII ज्यों जुबती अनुभवति प्रसब अति दारुन दुख ತuತl ह्वै अनुकूल बिसारि सूल सठः पुनि खल पतिहिं னI?II 1 लोलुप भ्रमत गृहपसु ्ज्यों जहँ तहँसिर पदत्रान बजै। तदपि अधम बिचरत तेहि मारग , कबहु न मूढ़ लजै।l 31| हौं रारयौ करि जतन बिबिध बिधि, अतिसै प्रबल अजै। तुलसिदास बस होइ तबहिं जब प्रेरक प्रभु बरजैIl 8I हरिजू! हठ न तजै। मेरो मन निसिदिन नाथ देउँ सिख बहु बिधि करत सुभाउ নিভীIIহII ज्यों जुबती अनुभवति प्रसब अति दारुन दुख ತuತl ह्वै अनुकूल बिसारि सूल सठः पुनि खल पतिहिं னI?II 1 लोलुप भ्रमत गृहपसु ्ज्यों जहँ तहँसिर पदत्रान बजै। तदपि अधम बिचरत तेहि मारग , कबहु न मूढ़ लजै।l 31| हौं रारयौ करि जतन बिबिध बिधि, अतिसै प्रबल अजै। तुलसिदास बस होइ तबहिं जब प्रेरक प्रभु बरजैIl 8I - ShareChat