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#ज्ञानीजन
ज्ञानीजन - ज्ञान के आतंक में मेरे घर का अन्धेरा बाहर निकलने से डरता है ज्ञानीजन हँसते हैं बन्द खिड़कियाँ देखकर उधड़े पलस्तर पर बने भुतैले चेहरों पर अकारण और सीलन से बजबजाती सीढ़ियों की रपटन पर ज्ञान के साथ जिनके पास आई है अकूत सम्पदा और जो कृपण हैं मुझ जैसे दूसरों पर दृष्टिपात करने तक वे अब दर्प से मारते हैं लात मेरे जंग खाए गिराऊ दरवाज़े पर तुम गधे के गधे ही रहे जिस तरह कपड़े के जूतों और नीले बन्द गले के रुई भरे कोटों में माओ के अनुयायी... सर्वज्ञ, अगुआ ज्ञान भण्डार के भट्टारक, महा-प्रज्ञ करते ैंः कताश्ष ज्ञान के आतंक में मेरे घर का अन्धेरा बाहर निकलने से डरता है ज्ञानीजन हँसते हैं बन्द खिड़कियाँ देखकर उधड़े पलस्तर पर बने भुतैले चेहरों पर अकारण और सीलन से बजबजाती सीढ़ियों की रपटन पर ज्ञान के साथ जिनके पास आई है अकूत सम्पदा और जो कृपण हैं मुझ जैसे दूसरों पर दृष्टिपात करने तक वे अब दर्प से मारते हैं लात मेरे जंग खाए गिराऊ दरवाज़े पर तुम गधे के गधे ही रहे जिस तरह कपड़े के जूतों और नीले बन्द गले के रुई भरे कोटों में माओ के अनुयायी... सर्वज्ञ, अगुआ ज्ञान भण्डार के भट्टारक, महा-प्रज्ञ करते ैंः कताश्ष - ShareChat
#हाथों का उठना
हाथों का उठना - हाथों काउना कपना गिर्जाना कितने दिन चलेगा क्ितने दिन और सहेंगे बे कब चीत्कार करेंगें तैयार तक होगैचे कब कबै तक हुँकार भरेगुेग ी कदमों का उठते उटते रूक जामा कितने दिच औरचलेगार दरवाज़ों को ख़ुलना है गिरना हैँटीवारों को। लेकिन 7 कितने दिनतक औरू चलना है अतिचारों का? आँखों का उठना झुकना मुँद जाना कितने दिन और चलेगा? हाथों काउना कपना गिर्जाना कितने दिन चलेगा क्ितने दिन और सहेंगे बे कब चीत्कार करेंगें तैयार तक होगैचे कब कबै तक हुँकार भरेगुेग ी कदमों का उठते उटते रूक जामा कितने दिच औरचलेगार दरवाज़ों को ख़ुलना है गिरना हैँटीवारों को। लेकिन 7 कितने दिनतक औरू चलना है अतिचारों का? आँखों का उठना झुकना मुँद जाना कितने दिन और चलेगा? - ShareChat
#सावन-भादों साठ ही दिन हैं
सावन-भादों साठ ही दिन हैं - सावन भादों साठ ही दिन हैं फिरवो रुत की बात कहाँ अपने अश्क मुसलसल बरसें अपनी सी बरसात कहॉ चाँद ने क्यानक्या मंज़िल कर ली निकला, चमका , डूब गया हम जो आँख झपक लें सो लें ऐ दिल हमको रात कहॉ पीत का कारोबार बहुत है अब तो और भी फैल चला और जो काम जहाँ को देखें , फुरसत दे हालात कहाँ क़ैस का नाम सुना ही होगा हमसे भी मुलाक़ात करो इश्को जुनूँ की मंज़िल मुश्किल सबकी ये औक़ात कहाँ सावन भादों साठ ही दिन हैं फिरवो रुत की बात कहाँ अपने अश्क मुसलसल बरसें अपनी सी बरसात कहॉ चाँद ने क्यानक्या मंज़िल कर ली निकला, चमका , डूब गया हम जो आँख झपक लें सो लें ऐ दिल हमको रात कहॉ पीत का कारोबार बहुत है अब तो और भी फैल चला और जो काम जहाँ को देखें , फुरसत दे हालात कहाँ क़ैस का नाम सुना ही होगा हमसे भी मुलाक़ात करो इश्को जुनूँ की मंज़िल मुश्किल सबकी ये औक़ात कहाँ - ShareChat