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#हाथों का उठना
हाथों का उठना - हाथों काउना कपना गिर्जाना कितने दिन चलेगा क्ितने दिन और सहेंगे बे कब चीत्कार करेंगें तैयार तक होगैचे कब कबै तक हुँकार भरेगुेग ी कदमों का उठते उटते रूक जामा कितने दिच औरचलेगार दरवाज़ों को ख़ुलना है गिरना हैँटीवारों को। लेकिन 7 कितने दिनतक औरू चलना है अतिचारों का? आँखों का उठना झुकना मुँद जाना कितने दिन और चलेगा? हाथों काउना कपना गिर्जाना कितने दिन चलेगा क्ितने दिन और सहेंगे बे कब चीत्कार करेंगें तैयार तक होगैचे कब कबै तक हुँकार भरेगुेग ी कदमों का उठते उटते रूक जामा कितने दिच औरचलेगार दरवाज़ों को ख़ुलना है गिरना हैँटीवारों को। लेकिन 7 कितने दिनतक औरू चलना है अतिचारों का? आँखों का उठना झुकना मुँद जाना कितने दिन और चलेगा? - ShareChat
#सावन-भादों साठ ही दिन हैं
सावन-भादों साठ ही दिन हैं - सावन भादों साठ ही दिन हैं फिरवो रुत की बात कहाँ अपने अश्क मुसलसल बरसें अपनी सी बरसात कहॉ चाँद ने क्यानक्या मंज़िल कर ली निकला, चमका , डूब गया हम जो आँख झपक लें सो लें ऐ दिल हमको रात कहॉ पीत का कारोबार बहुत है अब तो और भी फैल चला और जो काम जहाँ को देखें , फुरसत दे हालात कहाँ क़ैस का नाम सुना ही होगा हमसे भी मुलाक़ात करो इश्को जुनूँ की मंज़िल मुश्किल सबकी ये औक़ात कहाँ सावन भादों साठ ही दिन हैं फिरवो रुत की बात कहाँ अपने अश्क मुसलसल बरसें अपनी सी बरसात कहॉ चाँद ने क्यानक्या मंज़िल कर ली निकला, चमका , डूब गया हम जो आँख झपक लें सो लें ऐ दिल हमको रात कहॉ पीत का कारोबार बहुत है अब तो और भी फैल चला और जो काम जहाँ को देखें , फुरसत दे हालात कहाँ क़ैस का नाम सुना ही होगा हमसे भी मुलाक़ात करो इश्को जुनूँ की मंज़िल मुश्किल सबकी ये औक़ात कहाँ - ShareChat
#इक बार कहो तुम मेरी हो।
इक बार कहो तुम मेरी हो। - हम घूम चुके बस्ती-बन में फाँस लिए मन में इक आस का कोई साजन हो, कोई प्यारा हो कोई दीपक हो, कोई तारा हो जब जीवन रात अंधेरी हो कहो तुम मेरी हो। इक बार छाए हों जब सावन बादल जब फागुन फूल खिलाए हों जब चंदा रूप लुटाता हो जब सूरज धूप नहाता हो या शाम ने बस्ती घेरी हो कहो तुम मेरी हो। इक बार हाँ दिल का दामन फैला है क्यों गोरी का दिल मैला है हम कब तक पीत के धोखे में तक दूर झरोखे में तुम कब दीद से दिल की सेरी हो q कहो तुम मेरी हो। 325 ~R झगड़ा सूद ख़सारे का क्या ये काज नहीं बंजारे का सब सोना रूपा ले जाए सब दुनिया , दुनिया ले जाए ப7=-3=7 " I हम घूम चुके बस्ती-बन में फाँस लिए मन में इक आस का कोई साजन हो, कोई प्यारा हो कोई दीपक हो, कोई तारा हो जब जीवन रात अंधेरी हो कहो तुम मेरी हो। इक बार छाए हों जब सावन बादल जब फागुन फूल खिलाए हों जब चंदा रूप लुटाता हो जब सूरज धूप नहाता हो या शाम ने बस्ती घेरी हो कहो तुम मेरी हो। इक बार हाँ दिल का दामन फैला है क्यों गोरी का दिल मैला है हम कब तक पीत के धोखे में तक दूर झरोखे में तुम कब दीद से दिल की सेरी हो q कहो तुम मेरी हो। 325 ~R झगड़ा सूद ख़सारे का क्या ये काज नहीं बंजारे का सब सोना रूपा ले जाए सब दुनिया , दुनिया ले जाए ப7=-3=7 " I - ShareChat
#कमर बांधे हुए चलने पे यां सब यार बैठे हैं
कमर बांधे हुए चलने पे यां सब यार बैठे हैं - कमर बांधे हुए चलने पे यां सब यार बैठे हैं बोह्त आगे गए, बाक़ी जो हैं तैयार बैठे हैं न छेड़ ए निकहत एनबाद एन्बहारी, राह लग अपनी तुझे अटखेलियां हम बेज़ार बैठे हैं ٤٨ तसव्वुर अर्श पर है और सर है पा-एन्साक़ी पर ग़र्जि कुछ और धुन में इस घड़ी मैनख़्वार बैठे हैं यहअपनी चाल है उफ़तादगी से इन दिनों पहरों नबर आया जहां पर साया-एनदीवार बैठे हैं भला गर्दिश फ़लक की चैन देती है किसे इंशा ग़ानीमत है कि हम सूरत यहां दो चार बैठे हैं कमर बांधे हुए चलने पे यां सब यार बैठे हैं बोह्त आगे गए, बाक़ी जो हैं तैयार बैठे हैं न छेड़ ए निकहत एनबाद एन्बहारी, राह लग अपनी तुझे अटखेलियां हम बेज़ार बैठे हैं ٤٨ तसव्वुर अर्श पर है और सर है पा-एन्साक़ी पर ग़र्जि कुछ और धुन में इस घड़ी मैनख़्वार बैठे हैं यहअपनी चाल है उफ़तादगी से इन दिनों पहरों नबर आया जहां पर साया-एनदीवार बैठे हैं भला गर्दिश फ़लक की चैन देती है किसे इंशा ग़ानीमत है कि हम सूरत यहां दो चार बैठे हैं - ShareChat