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#चंदू, मैंने सपना देखा,
चंदू, मैंने सपना देखा, - चंदू , मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू चंदू मैंने सपना देखा, खेल॰्कूद में हो बेकाबू मैंने सपना देखा देखा, कल परसों ही छूट रहे हो चंदू , मैंने सपना देखा, खूब पतंगें लूट रहे हो चंदू , मैंने सपना देखा, लाएहो तुम नया कैलंडर चंदू , मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर मैं हूँ अंदर चंदू , मैंने सपना देखा, अमुआ से पटना आए हो चंदू, मैंने सपना देखा, मेरे लिए शहद लाए हो चंदू मैंने सपना देखा, फैल गया है सुयश तुम्हारा चंदू मैंने सपना देखा, तुम्हें जानता भारत सारा चंदू मैंने सपना देखा, बहुत बड़े डाक्टर हो तुम तो चंदू मैंने सपना देखा, अपनी ड्यूटी में तत्पर हो चंदू , मैंने सपना देखा, इम्तिहान में बैठे हो तुम चंदू , मैंने सपना देखा, पुलिसऱ्यान में बैठे हो तुम चंदू , मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ अंदर चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कैलेंडर चंदू , मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू चंदू मैंने सपना देखा, खेल॰्कूद में हो बेकाबू मैंने सपना देखा देखा, कल परसों ही छूट रहे हो चंदू , मैंने सपना देखा, खूब पतंगें लूट रहे हो चंदू , मैंने सपना देखा, लाएहो तुम नया कैलंडर चंदू , मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर मैं हूँ अंदर चंदू , मैंने सपना देखा, अमुआ से पटना आए हो चंदू, मैंने सपना देखा, मेरे लिए शहद लाए हो चंदू मैंने सपना देखा, फैल गया है सुयश तुम्हारा चंदू मैंने सपना देखा, तुम्हें जानता भारत सारा चंदू मैंने सपना देखा, बहुत बड़े डाक्टर हो तुम तो चंदू मैंने सपना देखा, अपनी ड्यूटी में तत्पर हो चंदू , मैंने सपना देखा, इम्तिहान में बैठे हो तुम चंदू , मैंने सपना देखा, पुलिसऱ्यान में बैठे हो तुम चंदू , मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ अंदर चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कैलेंडर - ShareChat
#मैं हरि, पतित पावन सुने।
मैं हरि, पतित पावन सुने। - ShareChat
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#और काहि माँगिये, को मागिबो निवारै
और काहि माँगिये, को मागिबो निवारै - और काहि माँगिये , को मागिबो निवारै। अभिमत दातार कौन, दुख दरिद्र दारै।I धरम धाम राम कामनकोटि-रूप रूरो। साहब सब बिधि सुजान , दान खड्ग सूरो। सुखमय दिन द्वै निसान सबके द्वार बाजै। कुसमय दसरथके दानि! तैं गरीब निवाजै।I fJ' गुन बिहीन दीनता सेवा सुनाये। जे जे तैं निहाल किये फूले फिरत पाये।I तुलसीदास जाचक रुचि जानि दान दीजै। रामचंद्र चंद तू, चकोर मोहि कीजैII और काहि माँगिये , को मागिबो निवारै। अभिमत दातार कौन, दुख दरिद्र दारै।I धरम धाम राम कामनकोटि-रूप रूरो। साहब सब बिधि सुजान , दान खड्ग सूरो। सुखमय दिन द्वै निसान सबके द्वार बाजै। कुसमय दसरथके दानि! तैं गरीब निवाजै।I fJ' गुन बिहीन दीनता सेवा सुनाये। जे जे तैं निहाल किये फूले फिरत पाये।I तुलसीदास जाचक रुचि जानि दान दीजै। रामचंद्र चंद तू, चकोर मोहि कीजैII - ShareChat
#यह बिनती रहुबीर गुसाईं
यह बिनती रहुबीर गुसाईं - यह बिनती रहुबीर गुसाईं। और आस बिस्वास भरोसो , हरौ जीव जड़ताई II१ II चहौं न सुगति, संपति कछु रिधि सिधि सुमति- बिपुल  बड़ाई। हेतु रहित अनुराग रामपद , बढ अनुदिन अधिकाई II ?/| कुटिल करम लै जाइ मोहि, जहँ-जहँ अपनी ayii तहँ-्तहँ जनि छिन छोह छाँडिये, कमठ अण्डकी नाई।।३| यहि जगमें , जहँ लगि या तनुकी श्रीति प्रतीति सगाई। ते सब तुलसिदास प्रभु ही सों , होहिं सिमिति इक ಕತIl8 Il यह बिनती रहुबीर गुसाईं। और आस बिस्वास भरोसो , हरौ जीव जड़ताई II१ II चहौं न सुगति, संपति कछु रिधि सिधि सुमति- बिपुल  बड़ाई। हेतु रहित अनुराग रामपद , बढ अनुदिन अधिकाई II ?/| कुटिल करम लै जाइ मोहि, जहँ-जहँ अपनी ayii तहँ-्तहँ जनि छिन छोह छाँडिये, कमठ अण्डकी नाई।।३| यहि जगमें , जहँ लगि या तनुकी श्रीति प्रतीति सगाई। ते सब तुलसिदास प्रभु ही सों , होहिं सिमिति इक ಕತIl8 Il - ShareChat
#ऐसा प्रभाव भर दे, मेरे अधीर मन में॥
ऐसा प्रभाव भर दे, मेरे अधीर मन में॥ - मैं ढूँढता तुझे था, जब कुंज और वन में। तू खोजता मुझे था, तब दीन के सदन में Il तू 'आहे' बन किसी की, मुझको पुकारता था। मैं था तुझे बुलाता, संगीत में भजन में Il मेरे लिए खडा था, दुखियों के द्वार पर तू मैं बाट जोहता था, तेरी किसी चमन में ।l बनकर किसी के आँसू, मेरे लिए बहा तू। आँखे लगी थी मेरी , तब मान और धन में।l बजाबजा कर, मैं था नुझे रिझाता | শডী तब तू लगा हुआ था, पतितों के संगठन में। मैं था विरक्त तुझसे , जग की अनित्यता पर। HII तब तू किसी ' उत्थान भर रहा था, बेबस गिरे हुओं के, तू बीच में खड़ा था। मैं स्वर्ग देखता था, झुकता कहाँ चरन में IIl तूने दिया अनेकों अवसर न मिल सका मैं। तू कर्म में मगन ' था, मैं व्यस्त था कथन मेंIl तेरा पता सिकंदर को , मैं समझ रहा था। पर तू बसा हुआ था, फरहाद कोहकन में Il मैं ढूँढता तुझे था, जब कुंज और वन में। तू खोजता मुझे था, तब दीन के सदन में Il तू 'आहे' बन किसी की, मुझको पुकारता था। मैं था तुझे बुलाता, संगीत में भजन में Il मेरे लिए खडा था, दुखियों के द्वार पर तू मैं बाट जोहता था, तेरी किसी चमन में ।l बनकर किसी के आँसू, मेरे लिए बहा तू। आँखे लगी थी मेरी , तब मान और धन में।l बजाबजा कर, मैं था नुझे रिझाता | শডী तब तू लगा हुआ था, पतितों के संगठन में। मैं था विरक्त तुझसे , जग की अनित्यता पर। HII तब तू किसी ' उत्थान भर रहा था, बेबस गिरे हुओं के, तू बीच में खड़ा था। मैं स्वर्ग देखता था, झुकता कहाँ चरन में IIl तूने दिया अनेकों अवसर न मिल सका मैं। तू कर्म में मगन ' था, मैं व्यस्त था कथन मेंIl तेरा पता सिकंदर को , मैं समझ रहा था। पर तू बसा हुआ था, फरहाद कोहकन में Il - ShareChat
#तिल्ली ने थी पाली पिल्ली
तिल्ली ने थी पाली पिल्ली - धोती कुरता झिल्ली पहने गमछे से लटकाये किल्ली অএনী ঘরীড়ী লিল্লী कस कर तिल्ली सिंह जा पहुँचे दिल्ली पहले मिले शेख जी चिल्ली उनकी बहुत उड़ाई खिल्ली चिल्ली ने पाली थी बिल्ली तिल्ली ने थी पाली पिल्ली पिल्ली थी दुमकटी चिबिल्ली उसने धर दबोच दी बिल्ली मरी देख कर अपनी बिल्ली गुस्से से झुँझलाया चिल्ली लेकर लाठी एक गठिल्ली उसे मारने दौड़ा चिल्ली लाठी देख डर गया तिल्ली तुरंत हो गई धोती ढिल्ली ঘ্রীড়ী লিল্লী कस कर झटपट rहिंहने छोडी दिल्ली faf নি্লী हल्ला तिल्ली सिंह ने जीती दिल्ली! धोती कुरता झिल्ली पहने गमछे से लटकाये किल्ली অএনী ঘরীড়ী লিল্লী कस कर तिल्ली सिंह जा पहुँचे दिल्ली पहले मिले शेख जी चिल्ली उनकी बहुत उड़ाई खिल्ली चिल्ली ने पाली थी बिल्ली तिल्ली ने थी पाली पिल्ली पिल्ली थी दुमकटी चिबिल्ली उसने धर दबोच दी बिल्ली मरी देख कर अपनी बिल्ली गुस्से से झुँझलाया चिल्ली लेकर लाठी एक गठिल्ली उसे मारने दौड़ा चिल्ली लाठी देख डर गया तिल्ली तुरंत हो गई धोती ढिल्ली ঘ্রীড়ী লিল্লী कस कर झटपट rहिंहने छोडी दिल्ली faf নি্লী हल्ला तिल्ली सिंह ने जीती दिल्ली! - ShareChat
#अस्तोदय की वीणा
अस्तोदय की वीणा - बाजे अस्तोदय की वीणा --क्षण क्षण गगनांगण में हुआ प्रभात छिप गए तारे, संध्या हुई भानु भी हारे, यह उत्थान पतन है व्यापक प्रति कण ्कण में रे।। ह्रासनविकास विलोक इंदु में, Rg  Rgfs# fs कुछ भी है थिर नहीं जगत के संघर्षण में रे।। ऐसी ही गति तेरी होगी, निश्चित है क्यों देरी होगी, गाफ़िल तू क्यों है विनाश के आकर्षण में रे।। निश्चय करके फिर न ठहर तू, तन रहते प्रण पूरण कर तू॰ विजयी बनकर क्यों न रहे तू जीवन रण में रे? बाजे अस्तोदय की वीणा --क्षण क्षण गगनांगण में हुआ प्रभात छिप गए तारे, संध्या हुई भानु भी हारे, यह उत्थान पतन है व्यापक प्रति कण ्कण में रे।। ह्रासनविकास विलोक इंदु में, Rg  Rgfs# fs कुछ भी है थिर नहीं जगत के संघर्षण में रे।। ऐसी ही गति तेरी होगी, निश्चित है क्यों देरी होगी, गाफ़िल तू क्यों है विनाश के आकर्षण में रे।। निश्चय करके फिर न ठहर तू, तन रहते प्रण पूरण कर तू॰ विजयी बनकर क्यों न रहे तू जीवन रण में रे? - ShareChat