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#☝ मेरे विचार
☝ मेरे विचार - शरब्दांकाजाढ कबीर की चादर कबीर ने बुनी सूत के ताने-बाने से एक चादर और उढ़ा दी प्रेम से लोईको चादर बुनी कबीर ने दूसरी  और बेच आए काशी के हाट मेँ आखिर पालना था कमाल और कमाली को कबीर ने तीसरी चादर बुनी और दे दी किसी साधो को समझाते हुए- सुनो भई साधो ! यह जानकर भी कि कहा न मानत कोईरे कबीर ने उढ़ाई नहीं चादर किसी सुलतान को और न किसी मठाधीश को कबीर ने फैलाई नहीं चादर লিব ! भिक्षा के ন বন্ধ चादर और बुनी बस कबीर इंगला पिँगला सुखमन तार से और ओढ़ लिया उसे बड़े ही जतन से.. அ, -नरेश जबलपुर ( मूल कविता के सम्पादित अंश ) भास्कर कविता उत्सवकी शीर्ष १०० कवि शरब्दांकाजाढ कबीर की चादर कबीर ने बुनी सूत के ताने-बाने से एक चादर और उढ़ा दी प्रेम से लोईको चादर बुनी कबीर ने दूसरी  और बेच आए काशी के हाट मेँ आखिर पालना था कमाल और कमाली को कबीर ने तीसरी चादर बुनी और दे दी किसी साधो को समझाते हुए- सुनो भई साधो ! यह जानकर भी कि कहा न मानत कोईरे कबीर ने उढ़ाई नहीं चादर किसी सुलतान को और न किसी मठाधीश को कबीर ने फैलाई नहीं चादर লিব ! भिक्षा के ন বন্ধ चादर और बुनी बस कबीर इंगला पिँगला सुखमन तार से और ओढ़ लिया उसे बड़े ही जतन से.. அ, -नरेश जबलपुर ( मूल कविता के सम्पादित अंश ) भास्कर कविता उत्सवकी शीर्ष १०० कवि - ShareChat