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#पूजन विधि
पूजन विधि - देवी छिन्नमस्ता जयन्ती की कथा एक समय देवी पार्वती अपनी डाकिनी (जया) एवं वर्णिनी (विजया) नामक दो सहचरियों सहित मन्दाकिनी नदी में स्नान करने हेतु पहुँची। स्नान करने के पश्चात क्षुदाग्नि (भूख) के प्रभाव से वह कृष्ण वर्ण की हो गयीं। उसी समय जया-विजया ने से भोजन प्रदान करने हेतु प्रार्थना की। देवी पार्वती ने उन दोनों ক্ী মানা पार्वती  सहचरियों से कुछ समय के लिये प्रतीक्षा को कहा। किन्तु कुछ समय प्रतीक्षा करने 49: करने के पश्चात भूख से व्याकुल होकर जया-विजया माता से भोजन प्रदान हुये कहा, "माँ हमें भोजन दें! आप समस्त संसार की माता हैं करने का आग्रह करते एवं शिशु तो सदैव प्रत्येक वस्तु हेतु अपनी माँ से ही याचना करता है। इसीलिये हम भी अपनी क्षुदा शान्त करने के लिये भोजन की याचना कर रहे हैं।" माँ पार्वती ने उन दोनों से कहा, "भवन पहुँचते ही मैं तुम्हारे लिये भोजन का प्रबन्ध कर दूँगी। " माता पार्वती के वचन सुनकर, डाकिनी एवं वर्णिनी नामक उन सहचरियों ने देवी माँ से निवेदन करते हुये मधुर स्वर में कहा, "हे माते! जगदम्बा! माँ तो भूख लगने शिशुओं को तत्काल भोजन प्रदान करती है, हम क्षुदाग्नि से अत्यन्त पर अपने व्याकुल हो रही हैं। कृपया हमें कुछ भोजन प्रदान करें जो हमारी क्षुदा को शान्त कर सके।" अपनी सहचरियों के विनम्र को सुनकर देवी माँ ने तत्क्षण अपने नख की 44# नोक से अपना शीश काट दिया। देवी का कटा हुआ मस्तक उनके बायें हाथ में आ प्रवाहित होने लगीं | रक्त की दो गिरा तथा उनके कबन्ध (धड़) रक्त की तीन धारायें धाराओं का देवी ने अपनी सहचरियों की ओर प्रवाहित कर दिया जिसका पान कर वह दोनों प्रसन्न एवं आनन्दित होने लगीं | बायीं ओर की रक्तधारा का डाकिनी तथा दायीं ओर की धारा का पान वर्णिनी ने किया। तीसरी धारा का पान देवी माँ स्वयं में स्थित कटे हुये मस्तक से करने लगीं। तदोपरान्त देवी अपनी अपने बायें हाथ सहचरियों सहित भवन को लौट आयीं। यह समस्त घटनाक्रम अति गोपनीय रूप से घटित हुआ था। देवी के इस छिन्न भिन्न स्वरूप के कारण उसी समय से समस्त लोकों में देवी, छिन्नमस्ता के नाम से विख्यात हुयीं।  देवी छिन्नमस्ता जयन्ती की कथा एक समय देवी पार्वती अपनी डाकिनी (जया) एवं वर्णिनी (विजया) नामक दो सहचरियों सहित मन्दाकिनी नदी में स्नान करने हेतु पहुँची। स्नान करने के पश्चात क्षुदाग्नि (भूख) के प्रभाव से वह कृष्ण वर्ण की हो गयीं। उसी समय जया-विजया ने से भोजन प्रदान करने हेतु प्रार्थना की। देवी पार्वती ने उन दोनों ক্ী মানা पार्वती  सहचरियों से कुछ समय के लिये प्रतीक्षा को कहा। किन्तु कुछ समय प्रतीक्षा करने 49: करने के पश्चात भूख से व्याकुल होकर जया-विजया माता से भोजन प्रदान हुये कहा, "माँ हमें भोजन दें! आप समस्त संसार की माता हैं करने का आग्रह करते एवं शिशु तो सदैव प्रत्येक वस्तु हेतु अपनी माँ से ही याचना करता है। इसीलिये हम भी अपनी क्षुदा शान्त करने के लिये भोजन की याचना कर रहे हैं।" माँ पार्वती ने उन दोनों से कहा, "भवन पहुँचते ही मैं तुम्हारे लिये भोजन का प्रबन्ध कर दूँगी। " माता पार्वती के वचन सुनकर, डाकिनी एवं वर्णिनी नामक उन सहचरियों ने देवी माँ से निवेदन करते हुये मधुर स्वर में कहा, "हे माते! जगदम्बा! माँ तो भूख लगने शिशुओं को तत्काल भोजन प्रदान करती है, हम क्षुदाग्नि से अत्यन्त पर अपने व्याकुल हो रही हैं। कृपया हमें कुछ भोजन प्रदान करें जो हमारी क्षुदा को शान्त कर सके।" अपनी सहचरियों के विनम्र को सुनकर देवी माँ ने तत्क्षण अपने नख की 44# नोक से अपना शीश काट दिया। देवी का कटा हुआ मस्तक उनके बायें हाथ में आ प्रवाहित होने लगीं | रक्त की दो गिरा तथा उनके कबन्ध (धड़) रक्त की तीन धारायें धाराओं का देवी ने अपनी सहचरियों की ओर प्रवाहित कर दिया जिसका पान कर वह दोनों प्रसन्न एवं आनन्दित होने लगीं | बायीं ओर की रक्तधारा का डाकिनी तथा दायीं ओर की धारा का पान वर्णिनी ने किया। तीसरी धारा का पान देवी माँ स्वयं में स्थित कटे हुये मस्तक से करने लगीं। तदोपरान्त देवी अपनी अपने बायें हाथ सहचरियों सहित भवन को लौट आयीं। यह समस्त घटनाक्रम अति गोपनीय रूप से घटित हुआ था। देवी के इस छिन्न भिन्न स्वरूप के कारण उसी समय से समस्त लोकों में देवी, छिन्नमस्ता के नाम से विख्यात हुयीं। - ShareChat