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#☝ मेरे विचार
☝ मेरे विचार - सनील जैन हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि हमारे कार्यों से दुर्गुण गिर जाएं हम लोग अधिकांश मौकों पर प्रतिक्रिया में ही जीते हैं। किसी ने कुछ f हमसे कहा, हमारे अच्छा किया या बुरा किया और हम तुरंत रिएक्ट करते हैं। धीरे-्धीरे हमारा मौलिक कृत्य समाप्त हो जाता है। हम बनकर रह जाते हैं। हमारे सुख और दुःख का रिमोट प्रतिक्रिया के पुतले  दूसरों के हाथ में चला जाता है। जबकि होना तो ये चाहिए कि हमारा कृत्य धीरे धीरे सृजन में बदल जाए। और जब कोई भी काम रचनात्मक होता है तो हम अपने आप ईश्वर की ओर चल पडते हैं। हमारे कृत्य में से जब दुर्गुण गिर जाते हैं तो फिर  वह काम पूजा हो जाता है। पूजा का परिणाम ईश्वर का सान्निध्य है। काकभुशुंडि जी ने गरुड़ जी से कहा- काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूँप ते किमि जानहिं रघुपतिहि  मूढ़ परे तम कूप। जो काम॰ क्रोध, मद और लोभ में रत हैं और दुःख रूप घर में आसक्त हैं ন হমুনাথ ` जी को कैसे जान सकते है? वे अंधकार मूर्ख तो रूपी कुएं में पडे़े है। हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि हमारे  कोयों में से दुरगुण गिर जाएं। जो उपलब्ध होगा, वो श्रेष्ठ होगा।  Facebook :Pt Vijayshankar Mehta सनील जैन हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि हमारे कार्यों से दुर्गुण गिर जाएं हम लोग अधिकांश मौकों पर प्रतिक्रिया में ही जीते हैं। किसी ने कुछ f हमसे कहा, हमारे अच्छा किया या बुरा किया और हम तुरंत रिएक्ट करते हैं। धीरे-्धीरे हमारा मौलिक कृत्य समाप्त हो जाता है। हम बनकर रह जाते हैं। हमारे सुख और दुःख का रिमोट प्रतिक्रिया के पुतले  दूसरों के हाथ में चला जाता है। जबकि होना तो ये चाहिए कि हमारा कृत्य धीरे धीरे सृजन में बदल जाए। और जब कोई भी काम रचनात्मक होता है तो हम अपने आप ईश्वर की ओर चल पडते हैं। हमारे कृत्य में से जब दुर्गुण गिर जाते हैं तो फिर  वह काम पूजा हो जाता है। पूजा का परिणाम ईश्वर का सान्निध्य है। काकभुशुंडि जी ने गरुड़ जी से कहा- काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूँप ते किमि जानहिं रघुपतिहि  मूढ़ परे तम कूप। जो काम॰ क्रोध, मद और लोभ में रत हैं और दुःख रूप घर में आसक्त हैं ন হমুনাথ ` जी को कैसे जान सकते है? वे अंधकार मूर्ख तो रूपी कुएं में पडे़े है। हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि हमारे  कोयों में से दुरगुण गिर जाएं। जो उपलब्ध होगा, वो श्रेष्ठ होगा।  Facebook :Pt Vijayshankar Mehta - ShareChat