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#satnam waheguru ji #satnam shri waheguru ji #Meetha Lage Tera bhana
satnam waheguru ji - सेवा रहसि गुण गावा सुरति गुरमुखि गिआनु बीचारा।।खोजी उपजै बादी बिनसै हउ बलि बलि गुर करतारा।। HoT अर्थः हे भाई! सच्चा भक्त वह है जिसकी सुरति सेवा में टिकी हो। वह परमात्मा के गुणों का गायन किसी डर से नहीं , बल्कि आंतरिक खुशी और रहसि आनंद के साथ करता है।जो व्यक्ति गुरमुख बनता है अर्थात अपना मुख गुरु की शिक्षाओं की ओर रखता है, वही वास्तव में सच्चे ज्ञान का चिंतन कर पाता है। यह ज्ञान किताबी नहीं, बल्कि जीवन लगे जीने का ढंग है।जब इंसान अपने भीतर सत्य की खोज शुरू करता है, तो उसके और एक नई चेतना का जन्म होता है। वह भीतर से अंदर नए आरध्यात्मेक गुणों , उपजै (विकसित ) होता है। जो लोग केवल तर्क-वितर्क, बहस और अपनी विद्वत्ता दिखाने में उलझे रहते हैं   उनका आध्यात्मिक जीवन नष्ट हो जाता है क्योंकि वे নহা अहंकार की दीवार नहीं गिरा पाते। में गुरु ं साहिब कहते हैं कि मैं उस करतार (परमात्मा ) अंत 377 Tೌ ' पर बार-्बार बलिहारी जाता हूँ, जिसने मुझे अहंकार त्याग कर खोजी बनने की समझ दी। इस शबद का मुख्य सार यह है कि " बहस छोड़ो और खोज शुरू करो।" भाणा से बहस करते हैं कि कौन सही है, तो हमारा दूसरों : जब हम स्व (अहंकार ) बढ़ता है। लेकिन जब हम स्वयं के भीतर सत्य की खोज करते हैं और निस्वार्थ सेवा करते हैं, तो हमारा अहंकार मिटता है और हमें उस आनंद की प्राप्ति होती है जिसका वर्णन इस वाणी में किया गया है। सेवा रहसि गुण गावा सुरति गुरमुखि गिआनु बीचारा।।खोजी उपजै बादी बिनसै हउ बलि बलि गुर करतारा।। HoT अर्थः हे भाई! सच्चा भक्त वह है जिसकी सुरति सेवा में टिकी हो। वह परमात्मा के गुणों का गायन किसी डर से नहीं , बल्कि आंतरिक खुशी और रहसि आनंद के साथ करता है।जो व्यक्ति गुरमुख बनता है अर्थात अपना मुख गुरु की शिक्षाओं की ओर रखता है, वही वास्तव में सच्चे ज्ञान का चिंतन कर पाता है। यह ज्ञान किताबी नहीं, बल्कि जीवन लगे जीने का ढंग है।जब इंसान अपने भीतर सत्य की खोज शुरू करता है, तो उसके और एक नई चेतना का जन्म होता है। वह भीतर से अंदर नए आरध्यात्मेक गुणों , उपजै (विकसित ) होता है। जो लोग केवल तर्क-वितर्क, बहस और अपनी विद्वत्ता दिखाने में उलझे रहते हैं   उनका आध्यात्मिक जीवन नष्ट हो जाता है क्योंकि वे নহা अहंकार की दीवार नहीं गिरा पाते। में गुरु ं साहिब कहते हैं कि मैं उस करतार (परमात्मा ) अंत 377 Tೌ ' पर बार-्बार बलिहारी जाता हूँ, जिसने मुझे अहंकार त्याग कर खोजी बनने की समझ दी। इस शबद का मुख्य सार यह है कि " बहस छोड़ो और खोज शुरू करो।" भाणा से बहस करते हैं कि कौन सही है, तो हमारा दूसरों : जब हम स्व (अहंकार ) बढ़ता है। लेकिन जब हम स्वयं के भीतर सत्य की खोज करते हैं और निस्वार्थ सेवा करते हैं, तो हमारा अहंकार मिटता है और हमें उस आनंद की प्राप्ति होती है जिसका वर्णन इस वाणी में किया गया है। - ShareChat