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#☝ मेरे विचार
☝ मेरे विचार - पैरकप्रसंग डरने के बजाय सजग अवलोकन 77 13 संत ओर दार्शनिक रपण पहषि पर লীনম্সুব্ বিন के कहलाते थे। "శ] 15 केवल एक उपाधि ही नहीं, उनके अस्तित्व का सत्य शी था। यर प्रेस्य Te बताता ह कि कैसे उन्होने निर्थय 7 94 तोकर सत्य का साश्षात किया था। 17 4 1 हो रमण महर्षि के जीवन का एक बहुत प्रसिद्ध గౌ '৭ ব্মাল ৪৫?' ব্ূধী और महत्वपूर्ण प्रसंग है॰ 9 उनकी पहली प्रत्यक्ष अनुभूति।  सन् १८९६ मेंचे केवल सोलह वर्ष के थे। उनका नाम तब वेंकटरमण था। एक दिन अचानक उन्हें अपने अंत की तीत्र प्रतीति ने घेर बिल्कुल लिया। शरीर तो स्वस्थ थाः फिर भी भौतर से लगा कि अब अंतिम सम्रय आ गया हे। सामान्य व्यक्ति की तरह घबराने या किसी को बुलाने के बजाय उन्होंने उस अनुभव का सीधे ही साक्षात करने का निर्णय लिया। वे जमीन पर लेट गए॰ शरीर को शव की तरह कठोर कर लिया सांस रोक ली॰ ओर 1 भीतर ही भीतर देखने लगे। उन्होंने स्वयं से अगर मुझे मृत्यु आ गई तो इस शरीर को कहा लोग उठाकर श्मशान ले जाएंगे , जला देंगे। पर भी समाप्त होे जाऊँगा ? क्या इससे मैं यह शरीर तो निश्चल पड़ा उन्होंने सोचा है॰ लेकिन जो इंस सबको देख रहा है- क्या वह পী ৭ং ববন্না ৯? उसी क्षण उनके भीतर एक गहरा बोध जागा कि भैं शरीर नहीं हूं। शरीर तो नश्वर है, परजो मैं' का साक्षी है, वह मृत्यु के पार है। यही आत्मसाक्षात्कार वेंकटरमण के रमण महर्षि बनने की शुरुआत थी।  हम शरीर और विचार भर नहीं॰॰  उस घटना के बाद उनका जीवन पूरी तरह बदल गया। संसार के प्रति आकर्षण लगभग  মমাদ तमिलनाड हो गया और कुछ ही समय बाद वे के अरुणाचलेश्वर मंदिर चले गए। इस प्रसंग की सबसे प्रेरक बात यह है कि उन्होंने एक कठिन क्षण से डरकर भागने के बजाय उसे पूरी सजगता से देखा था। इसीलिए वे कहते - मनुष्य के अधिकांश भय इसलिए हें क्योकि रम अपने को केवल शरीर और बिचारों तक सोमित मान लेते हैंl ॰ 1 मिनट रीड पैरकप्रसंग डरने के बजाय सजग अवलोकन 77 13 संत ओर दार्शनिक रपण पहषि पर লীনম্সুব্ বিন के कहलाते थे। "శ] 15 केवल एक उपाधि ही नहीं, उनके अस्तित्व का सत्य शी था। यर प्रेस्य Te बताता ह कि कैसे उन्होने निर्थय 7 94 तोकर सत्य का साश्षात किया था। 17 4 1 हो रमण महर्षि के जीवन का एक बहुत प्रसिद्ध గౌ '৭ ব্মাল ৪৫?' ব্ূধী और महत्वपूर्ण प्रसंग है॰ 9 उनकी पहली प्रत्यक्ष अनुभूति।  सन् १८९६ मेंचे केवल सोलह वर्ष के थे। उनका नाम तब वेंकटरमण था। एक दिन अचानक उन्हें अपने अंत की तीत्र प्रतीति ने घेर बिल्कुल लिया। शरीर तो स्वस्थ थाः फिर भी भौतर से लगा कि अब अंतिम सम्रय आ गया हे। सामान्य व्यक्ति की तरह घबराने या किसी को बुलाने के बजाय उन्होंने उस अनुभव का सीधे ही साक्षात करने का निर्णय लिया। वे जमीन पर लेट गए॰ शरीर को शव की तरह कठोर कर लिया सांस रोक ली॰ ओर 1 भीतर ही भीतर देखने लगे। उन्होंने स्वयं से अगर मुझे मृत्यु आ गई तो इस शरीर को कहा लोग उठाकर श्मशान ले जाएंगे , जला देंगे। पर भी समाप्त होे जाऊँगा ? क्या इससे मैं यह शरीर तो निश्चल पड़ा उन्होंने सोचा है॰ लेकिन जो इंस सबको देख रहा है- क्या वह পী ৭ং ববন্না ৯? उसी क्षण उनके भीतर एक गहरा बोध जागा कि भैं शरीर नहीं हूं। शरीर तो नश्वर है, परजो मैं' का साक्षी है, वह मृत्यु के पार है। यही आत्मसाक्षात्कार वेंकटरमण के रमण महर्षि बनने की शुरुआत थी।  हम शरीर और विचार भर नहीं॰॰  उस घटना के बाद उनका जीवन पूरी तरह बदल गया। संसार के प्रति आकर्षण लगभग  মমাদ तमिलनाड हो गया और कुछ ही समय बाद वे के अरुणाचलेश्वर मंदिर चले गए। इस प्रसंग की सबसे प्रेरक बात यह है कि उन्होंने एक कठिन क्षण से डरकर भागने के बजाय उसे पूरी सजगता से देखा था। इसीलिए वे कहते - मनुष्य के अधिकांश भय इसलिए हें क्योकि रम अपने को केवल शरीर और बिचारों तक सोमित मान लेते हैंl ॰ 1 मिनट रीड - ShareChat