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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣8️⃣4️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः कृपाचार्य, द्रोण और अश्वत्थामा की उत्पत्ति तथा द्रोण को परशुरामजी से अस्त्र-शस्त्र की प्राप्ति की कथा...(दिन 384) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ जनमेजय उवाच कथं समभवद् द्रोणः कथं चास्त्राण्यवाप्तवान् । कथं चागात् कुरून् ब्रह्मन् कस्य पुत्रः स वीर्यवान् ।। ३१ ।। जनमेजयने पूछा- ब्रह्मन् ! द्रोणाचार्यकी उत्पत्ति कैसे हुई? उन्होंने किस प्रकार अस्त्र-विद्या प्राप्त की? वे कुरुदेशमें कैसे आये? तथा वे महापराक्रमी द्रोण किसके पुत्र थे? ।। ३१ ।। कथं चास्य सुतो जातः सोऽश्वत्थामास्त्रवित्तमः । एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण प्रकीर्तय ।। ३२ ।। साथ ही अस्त्र-शस्त्रके विद्वानोंमें श्रेष्ठ अश्वत्थामा, जो द्रोणका पुत्र था, कैसे उत्पन्न हुआ? यह सब मैं सुनना चाहता हूँ। आप विस्तारपूर्वक कहिये ।। ३२ ।। वैशम्पायन उवाच गङ्गाद्वारं प्रति महान् बभूव भगवानृषिः । भरद्वाज इति ख्यातः सततं संशितव्रतः ।। ३३ ।। सोऽभिषेक्तुं ततो गङ्गां पूर्वमेवागमन्नदीम् । महर्षिभिर्भरद्वाजो हविर्धाने चरन् पुरा ।। ३४ ।। ददर्शाप्सरसं साक्षाद् घृताचीमाप्लुतामृषिः । रूपयौवनसम्पन्नां मददृप्तां मदालसाम् ।। ३५ ।। तस्याः पुनर्नदीतीरे वसनं पर्यवर्तत । व्यपकृष्टाम्बरां दृष्ट्वा तामृषिश्चकमे ततः ।। ३६ ।। वैशम्पायनजीने कहा- जनमेजय ! गंगाद्वारमें भगवान् भरद्वाज नामसे प्रसिद्ध एक महर्षि रहते थे। वे सदा अत्यन्त कठोर व्रतोंका पालन करते थे। एक दिन उन्हें एक विशेष प्रकारके यज्ञका अनुष्ठान करना था। इसलिये वे भरद्वाज मुनि महर्षियोंको साथ लेकर गंगाजीमें स्नान करनेके लिये गये। वहाँ पहुँचकर महर्षिने प्रत्यक्ष देखा, घृताची अप्सरा पहलेसे ही स्नान करके नदीके तटपर खड़ी हो वस्त्र बदल रही है। वह रूप और यौवनसे सम्पन्न थी। जवानीके नशेमें मदसे उन्मत्त हुई जान पड़ती थी। उसका वस्त्र खिसक गया और उसे उस अवस्थामें देखकर ऋषिके मनमें कामवासना जाग उठी ।। ३३-३६ ।। तत्र संसक्तमनसो भरद्वाजस्य धीमतः । ततोऽस्य रेतश्चस्कन्द तदृ‌षिर्दोण आदधे ।। ३७ ।। परम बुद्धिमान् भरद्वाजजीका मन उस अप्सरामें आसक्त हुआ; इससे उनका वीर्य स्खलित हो गया। ऋषिने उस वीर्यको द्रोण (यज्ञकलश) में रख दिया ।। ३७ ।। ततः समभवद् द्रोणः कलशे तस्य धीमतः । अध्यगीष्ट स वेदांश्च वेदाङ्गानि च सर्वशः ।। ३८ ।। तब उन बुद्धिमान् महर्षिको उस कलशसे जो पुत्र उत्पन्न हुआ, वह द्रोणसे जन्म लेनेके कारण द्रोण नामसे ही विख्यात हुआ। उसने सम्पूर्ण वेदों और वेदांगोंका अध्ययन किया ।। ३८ ।। अग्निवेशं महाभागं भरद्वाजः प्रतापवान्। प्रत्यपादयदाग्नेयमस्त्रमस्त्रविदां वरः ।। ३९ ।। प्रतापी महर्षि भरद्वाज अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ थे। उन्होंने महाभाग अग्निवेशको आग्नेय अस्त्रकी शिक्षा दी थी ।। ३९ ।। अग्नेस्तु जातः स मुनिस्ततो भरतसत्तम । भारद्वाजं तदाग्नेयं महास्त्रं प्रत्यपादयत् ।। ४० ।। जनमेजय ! अग्निवेश मुनि साक्षात् अग्निके पुत्र थे। उन्होंने अपने गुरुपुत्र भरद्वाजनन्दन द्रोणको उस आग्नेय नामक महान् अस्त्रकी शिक्षा दी ।। ४० ।। भरद्वाजसखा चासीत् पृषतो नाम पार्थिवः । तस्यापि द्रुपदो नाम तदा समभवत् सुतः ।। ४१ ।। उन दिनों पृषत नामसे प्रसिद्ध एक भूपाल महर्षि भरद्वाजके मित्र थे। उन्हें भी उसी समय एक पुत्र हुआ, जिसका नाम द्रुपद था ।। ४१ ।। स नित्यमाश्रमं गत्वा द्रोणेन सह पार्थिवः। चिक्रीडाध्ययनं चैव चकार क्षत्रियर्षभः ।। ४२ ।। वह राजकुमार क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ था। वह प्रतिदिन भरद्वाज मुनिके आश्रममें जाकर द्रोणके साथ खेलता और अध्ययन करता था ।। ४२ ।। ततो व्यतीते पृषते स राजा द्रुपदोऽभवत्। पञ्चालेषु महाबाहुरुत्तरेषु नरेश्वर ।। ४३ ।। नरेश्वर जनमेजय ! पृषतकी मृत्यु हो जानेपर महाबाहु द्रुपद उत्तर-पंचाल देशके राजा हुए ।। ४३ ।। भरद्वाजोऽपि भगवानारुरोह दिवं तदा । तत्रैव च वसन् द्रोणस्तपस्तेपे महातपाः ।। ४४ ।। कुछ दिनों बाद भगवान् भरद्वाज भी स्वर्गवासी हो गये और महातपस्वी द्रोण उसी आश्रम में रहकर तपस्या करने लगे ।। ४४ ।। वेदवेदाङ्गविद्वान् स तपसा दग्धकिल्विषः । ततः पितृनियुक्तात्मा पुत्रलोभान्महायशाः ।। ४५ ।। शारद्वतीं ततो भार्या कृपीं द्रोणोऽन्वविन्दत । अग्निहोत्रे च धर्मे च दमे च सततं रताम् ।। ४६ ।। वे वेदों और वेदांगोंके विद्वान् तो थे ही, तपस्याद्वारा अपनी सम्पूर्ण पापराशिको दग्ध कर चुके थे। उनका महान् यश सब ओर फैल चुका था। एक समय पितरोंने उनके मनमें पुत्र उत्पन्न करनेकी प्रेरणा दी; अतः द्रोणाचार्यने पुत्रके लोभसे शरद्वान्‌की पुत्री कृपीको धर्मपत्नीके रूपमें ग्रहण किया। कृपी सदा अग्निहोत्र, धर्मानुष्ठान तथा इन्द्रियसंयममें उनका साथ देती थी ।। ४५-४६ ।। अलभद् गौतमी पुत्रमश्वत्थामानमेव च । स जातमात्रो व्यनदद् यथैवोच्चैःश्रवा हयः ।। ४७ ।। गौतमी कृपीने द्रोणसे अश्वत्थामा नामक पुत्र प्राप्त किया। उस बालकने जन्म लेते ही उच्चैःश्रवा घोडेके समान शब्द किया ।। ४७ ।। तच्छ्रुत्वान्तर्हितं भूतमन्तरिक्षस्थमब्रवीत् । अश्वस्येवास्य यत् स्थाम नदतः प्रदिशो गतम् ।। ४८ ।। अश्वत्थामैव बालोऽयं तस्मान्नाम्ना भविष्यति । सुतेन तेन सुप्रीतो भारद्वाजस्ततोऽभवत् ।। ४९ ।। उसे सुनकर अन्तरिक्षमें स्थित किसी अदृश्य चेतनने कहा- 'इस बालकके चिल्लाते समय अश्वके समान शब्द सम्पूर्ण दिशाओंमें गूंज उठा है; अतः यह अश्वत्थामा नामसे ही प्रसिद्ध होगा।' उस पुत्रसे भरद्वाजनन्दन द्रोणको बड़ी प्रसन्नता हुई ।। ४८-४९ ।। तत्रैव च वसन् धीमान् धनुर्वेदपरोऽभवत् । स शुश्राव महात्मानं जामदग्न्यं परंतपम् ।। ५० ।। सर्वज्ञानविदं विप्रं सर्वशस्त्रभृतां वरम् । ब्राह्मणेभ्यस्तदा राजन् दित्सन्तं वसु सर्वशः ।। ५१ ।। बुद्धिमान् द्रोण उसी आश्रममें रहकर धनुर्वेदका अभ्यास करने लगे। राजन् ! किसी समय उन्होंने सुना कि 'महात्मा जमदग्निनन्दन परशुरामजी इस समय सर्वज्ञ एवं सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं तथा शत्रुओंको संताप देनेवाले वे विप्रवर ब्राह्मणोंको अपना सर्वस्व दान करना चाहते हैं ।। ५०-५१ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
महाभारत - श्रीमह्रभाखमूु श्रीमह्रभाखमूु - ShareChat