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- sn vyas#सीताराम नमामि भक्त वत्सलं, कृपालु शील कोमलं। भजामि ते पदांबुजं, अकामिनां स्वधामदं॥ (१) हे प्रभु! आप भक्तों को शरण देने वाले है, आप सभी पर कृपा करने वाले है, आप अत्यंत कोमल स्वभाव वाले है, मैं आपको नमन करता हूँ। हे प्रभु! आप कामना-रहित जीवों को अपना परम-धाम प्रदान करने वाले है, मैं आपके चरण कमलों का स्मरण करता हूँ। (१) निकाम श्याम सुंदरं, भवांबुनाथ मंदरं। प्रफुल्ल कंज लोचनं, मदादि दोष मोचनं॥ (२) हे प्रभु! आप आसक्ति-रहित हैं, आप श्याम वर्ण में अति सुन्दर हैं, आप ब्रह्माण्ड को मंदराचल पर्वत के समान धारण किये हुए हैं। हे प्रभु! आपके नेत्र खिले हुए कमल के समान है, आप ही अभिमान आदि विकारों का नाश करने वाले हैं। (२) प्रलंब बाहु विक्रमं, प्रभोऽप्रमेय वैभवं। निषंग चाप सायकं, धरं त्रिलोक नायकं॥ (३) हे प्रभु! आप लंबी भुजाओं वाले हैं, आपका पराक्रम और ऐश्वर्य कल्पना से परे हैं। हे प्रभु! आप धनुष-बाण और तुणींर (बाण रखने वाला तरकस) धारण करने वाले हैं, आप ही तीनों लोकों के स्वामी हैं। (३) दिनेश वंश मंडनं, महेश चाप खंडनं॥ मुनींद्र संत रंजनं, सुरारि वृंद भंजनं॥ (४) हे प्रभु! आप चन्द्रवंश को गौरव प्रदान करने वाले हैं, आप ही शिवजी के धनुष को तोड़ने वाले हैं। हे प्रभु! आप श्रेष्ठ मुनियों और संतों को आनंद प्रदान करने वाले हैं, आप ही देवताओं की रक्षा करने वाले और असुरों का नाश करने वाले हैं। (४) मनोज वैरि वंदितं, अजादि देव सेवितं। विशुद्ध बोध विग्रहं, समस्त दूषणापहं॥ (५) हे प्रभु! कामदेव को भस्म करने वाले शिवजी आपकी वंदना करते हैं और ब्रह्मा आदि देव आपकी सेवा करते हैं। हे प्रभु! आप विशुद्ध ज्ञान स्वरूप वाले हैं और आप ही मेरे समस्त दोषों का नाश करने वाले हैं। (५) नमामि इंदिरा पतिं, सुखाकरं सतां गतिं। भजे सशक्ति सानुजं, शची पति प्रियानुजं॥ (६) हे प्रभु! आप ही लक्ष्मी जी के स्वामी हैं, आप सभी सुखों को देने वाले हैं, हे संतो को परम गति प्रदान करने वाले मैं आपको नमन करता हूँ। आप ही शची देवी के पति इन्द्र देव के प्रिय छोटे भाई (वामन अवतार) हैं, हे प्रभु! मैं आपका शक्ति स्वरूप श्री सीता जी और छोटे भाई श्री लक्ष्मण जी सहित स्मरण करता हूँ। (६) त्वदंघ्रि मूल ये नराः, भजंति हीन मत्सराः। पतंति नो भवार्णवे, वितर्क वीचि संकुले॥ (७) हे प्रभु! जो मनुष्य ईर्ष्या-रहित होकर आपके चरण कमलों का निरन्तर स्मरण करते हैं, वह मनुष्य फिर से भयंकर लहरों वाले संसार रूपी सागर में नहीं गिरते हैं (पुनर्जन्म को प्राप्त नही होते हैं)। (७) विविक्त वासिनः सदा, भजंति मुक्तये मुदा। निरस्य इंद्रियादिकं, प्रयांति ते गतिं स्वकं॥ (८) हे प्रभु! प्रसन्नता पूर्वक एकान्त स्थान में रहने वाले जो मनुष्य मोक्ष के लिए आपका निरन्तर ध्यान करते हैं, वह मनुष्य इन्द्रिय-विषयों से आसक्ति-रहित होकर परम गति को प्राप्त होते हैं। (८) तमेकमद्भुतं प्रभुं, निरीहमीश्वरं विभुं। जगद्गुरुं च शाश्वतं, तुरीयमेव केवलं॥ (९) हे प्रभु! आप ही इस जड़ रूपी संसार में एक मात्र चेतन स्वरूप हैं, आप आसक्ति-रहित सर्वव्यापी ईश्वर हैं। हे प्रभु! आप ही शाश्वत जगदगुरु हैं, आप ही केवल अपने वास्तविक स्वरूप को जानने वाले हैं। (९) भजामि भाव वल्लभं, कुयोगिनां सुदुर्लभं। स्वभक्त कल्प पादपं, समं सुसेव्यमन्वहं॥ (१०) हे प्रभु! आप को भाव से ही जाना जा सकता है, योग मार्ग से भटके हुए मनुष्यों के लिये आप को प्राप्त करना अत्यन्त दुर्लभ है। हे प्रभु! आप अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाले हैं, सभी जीवों द्वारा समान रूप से पूजित प्रभु का मैं निरन्तर भजन करता हूँ। (१०) अनूप रूप भूपतिं, नतोऽहमुर्विजा पतिं। प्रसीद मे नमामि ते, पदाब्ज भक्ति देहि मे॥ (११) हे अनुपम रूप वाले समस्त जीवों के स्वामी सीता-पति मैं आपको प्रणाम करता हूँ। हे प्रभु आप मुझ पर प्रसन्न होकर अपने चरण कमलों की भक्ति प्रदान कीजिये आपको मेरा नमस्कार है। (११) पठंति ये स्तवं इदं, नरादरेण ते पदं। व्रजंति नात्र संशयं, त्वदीय भक्ति संयुताः॥ (१२) जो मनुष्य इस स्तुति को आदर-पूर्वक पढ़ते हैं, वह संशय-रहित होकर आपकी भक्ति से युक्त होकर परम पद को प्राप्त होते हैं। (१२) ॥ हरि: ॐ तत् सत् ॥1918
- sn vyas#सीताराम माता की अग्नि परीक्षा ,,,,,,, ( रामायण में अग्नि परीक्षा एक ऐसी घटना है जो चरित्र एवं निष्ठां जैसे देविक विचार की महत्ता को प्रतिपादित करती है ! यह घटना आज के युग में असंभव अवश्य लगती है परन्तु सम्भवतः यह उस युग में विशेष कारणों से शरीर में " अग्नि तत्व " की जांच को कहते हो !) प्रभुश्री राम जी ने हनुमान्जी को बुलाया और कहा तुम लंका की जाओ। जानकी को सब समाचार सुनाओ और उसका कुशल समाचार लेकर तुम चले आओ॥ हनुमानजी आज्ञा पाकर गए और सीताजी को दूर से ही प्रणाम किया। जानकीजी ने पहचान लिया कि यह वही श्री रघुनाथजी का दूत है (और पूछा-) हे तात! कहो, कृपा के धाम मेरे प्रभु छोटे भाई और वानरों की सेना सहित कुशल से तो हैं? हनुमान्जी ने कहा- हे माता! कोसलपति श्री रामजी सब प्रकार से सकुशल हैं। उन्होंने संग्राम में दस सिर वाले रावण को जीत लिया है और विभीषण ने अचल राज्य प्राप्त किया है। हनुमान्जी के वचन सुनकर सीताजी के हृदय में हर्ष छा गया॥ सीता जी आज बहुत खुश है और नेत्रों में (आनंदाश्रुओं का) जल छा गया। वे बार-बार कहती हैं- हे हनुमान्! मैं तुझे क्या दूँ? इस समाचार के समान तीनों लोकों में और कुछ भी नहीं है! हनुमान्जी ने कहा- हे माता! सुनिए, मैंने आज निःसंदेह सारे जगत् का राज्य पा लिया, जो मैं रण में शत्रु को जीतकर भाई सहित निर्विकार श्री रामजी को देख रहा हूँ। जानकीजी ने कहा- हे पुत्र! सुन, समस्त सद्गुण तेरे हृदय में बसें और हे हनुमान्! शेष (लक्ष्मणजी) सहित कोसलपति प्रभु सदा तुझ पर प्रसन्न रहें॥ सुनु सुत सदगुन सकल तव हृदयँ बसहुँ हनुमंत। सानुकूल कोसलपति रहहुँ समेत अनंत॥ सीताजी कहती हैं- अब तुम वही उपाय करो, जिससे मैं इन नेत्रों से प्रभु के कोमल श्याम शरीर के दर्शन करूँ। श्री रामचंद्रजी के पास जाकर हनुमान्जी ने जानकीजी का कुशल समाचार सुनाया॥ श्री रामजी ने संदेश सुनकर युवराज अंगद और विभीषण को बुला लिया (और कहा-) हनुमान् जी के साथ जाओ और जानकी को आदर के साथ ले आओ॥ वे सब तुरंत ही वहाँ गए, जहाँ सीताजी थीं। सब की सब राक्षसियाँ नम्रतापूर्वक उनकी सेवा कर रही थीं। विभीषणजी ने शीघ्र ही उन लोगों को समझा दिया। उन्होंने बहुत प्रकार से सीताजी को स्नान कराया,बहुत प्रकार के गहने पहनाए और फिर वे एक सुंदर पालकी सजाकर ले आए। सीताजी प्रसन्न होकर सुख के धाम प्रियतम श्री रामजी का स्मरण करके उस पर हर्ष के साथ चढ़ीं॥ रीछ-वानर सब दर्शन करने के लिए आए, तब रक्षक क्रोध करके उनको रोकने दौड़े॥ श्री रघुवीर ने कहा- हे मित्र! मेरा कहना मानो और सीता को पैदल ले आओ, जिससे वानर उसको माता की तरह देखें। गोसाईं श्री रामजी ने हँसकर ऐसा कहा॥ प्रभु के वचन सुनकर रीछ-वानर हर्षित हो गए। आकाश से देवताओं ने बहुत से फूल बरसाए। सीताजी (के असली स्वरूप) को पहिले अग्नि में रखा था। अब भीतर के साक्षी भगवान् उनको प्रकट करना चाहते हैं॥ इसी कारण करुणा के भंडार श्री रामजी ने लीला से कुछ कड़े वचन कहे, जिन्हे सुनकर सब राक्षसियाँ विषाद करने लगीं॥ प्रभु के वचनों को सिर चढ़ाकर मन, वचन और कर्म से पवित्र श्री सीताजी बोलीं- हे लक्ष्मण! तुम मेरे धर्माचरण में सहायक बनो और तुरंत आग तैयार करो॥ लक्ष्मणजी के नेत्रों में (विषाद के आँसुओं का) जल भर आया। वे हाथ जोड़े खड़े रहे। वे भी प्रभु से कुछ कह नहीं सकते॥ फिर श्री रामजी का रुख देखकर लक्ष्मणजी दौड़े और आग तैयार करके बहुत सी लकड़ी ले आए। अग्नि को खूब बढ़ी हुई देखकर जानकीजी के हृदय में हर्ष हुआ। उन्हें भय कुछ भी नहीं हुआ॥ सीताजी ने लीला से कहा-) यदि मन, वचन और कर्म से मेरे हृदय में श्री रघुवीर को छोड़कर दूसरी गति (अन्य किसी का आश्रय) नहीं है, तो अग्निदेव जो सबके मन की गति जानते हैं, (मेरे भी मन की गति जानकर) मेरे लिए चंदन के समान शीतल हो जाएँ॥ प्रभु श्री रामजी का स्मरण करके और जिनके चरण महादेवजी के द्वारा वंदित हैं तथा जिनमें सीताजी की अत्यंत विशुद्ध प्रीति है, उन कोसलपति की जय बोलकर जानकीजी ने चंदन के समान शीतल हुई अग्नि में प्रवेश किया। प्रतिबिम्ब (सीताजी की छायामूर्ति) और उनका लौकिक कलंक प्रचण्ड अग्नि में जल गए। प्रभु के इन चरित्रों को किसी ने नहीं जाना। देवता, सिद्ध और मुनि सब आकाश में खड़े देखते हैं॥ तब अग्नि ने शरीर धारण करके वेदों में और जगत् में प्रसिद्ध वास्तविक श्री (सीताजी) का हाथ पकड़ उन्हें श्री रामजी को वैसे ही समर्पित किया जैसे क्षीरसागर ने विष्णु भगवान् को लक्ष्मी समर्पित की थीं। वे सीताजी श्री रामचंद्रजी के वाम भाग में विराजित हुईं। उनकी उत्तम शोभा अत्यंत ही सुंदर है। मानो नए खिले हुए नीले कमल के पास सोने के कमल की कली सुशोभित हो॥ देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे। आकाश में डंके बजने लगे। किन्नर गाने लगे। विमानों पर चढ़ी अप्सराएँ नाचने लगीं॥ श्री जानकीजी सहित प्रभु श्री रामचंद्रजी की अपरिमित और अपार शोभा देखकर रीछ-वानर हर्षित हो गए और सुख के सार श्री रघुनाथजी की जय बोलने लगे। विशेष ,,,, पद्म पुराण के अनुसार रामायण में थी दो माता सीता पद्म पुराण की कुछ कहानियों को आपस में जोड़ा जाए तो इससे ये बात सामने आती है कि रामायण में एक नहीं बल्कि दो सीता थी, पहली असली और दूसरी माया. अगर पद्म पुराण की कहानियों को सच मानें तो माता सीता को कोई अग्नि परीक्षा नहीं देनी पड़ी थी और ना ही उन्हें वनवास जाना पड़ा था. यही नहीं खुद भगवान राम भी माता सीता के इन दोनों रुपों के बारे में जानते थे. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता सीता अग्नि देव की पूजा करती थीं और त्रेतायुग में ये धारणा थी कि अगर कोई व्यक्ति सच्चा है तो उसे अग्नि कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकती. माता सीता की भक्ति से प्रसन्न होकर अग्नि देव ने अग्निपरीक्षा के दौरान सीता की जगह उनकी माया सीता को रखा जिसे रावण अपने साथ अपहरण करके लंका ले गया था ! ऐसा कहा जाता है कि जब सीता को भगवान राम ने रावण से बचाया था उसके बाद उन्होंने माया सीता से विनती की थी कि वो वापस चली जाएं और असली सीता वापस आ जाएं. इसीलिए सीता की अग्निपरीक्षा के दौरान असली सीता बाहर आयी जिन्हें रावण छू भी नहीं पाया था. यहाँ यह विचारणीय है कि माता सीता के चरित्र पर उंगली उठानेवाली प्रजा को जवाब देने के लिए जब राम ने सीता की अग्निपरीक्षा ली तो इससे ये साबित हो गया था कि वो पवित्र और निष्ठावान हैं ! 🌷🌿🌷🌿🌷🌿🌷🌿🌷🌿🌷🌿🌷🌿🌷2113
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- CM Sir@#सीताराम #🪔जय श्री संकट मोचन हनुमान जी(प्रभु राम,लक्ष्मण,सीता माता,) #श्री राम माता सीता लक्ष्मण जी हनुमान जी के साथ सुंदर तस्वीर #सियाराम #Ram ji 🙏 Seeta ji 🙏 Lakshman ji 🙏 🌹4019
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- Sunil Badodiya#सीताराम811
- krishna khatri#श्री शिवाय नमस्तुभ्यं #सीताराम #शुभशुक्रवार -जयमातादी🙏🚩🚩 #🌺 श्री लक्ष्मी नारायण #जय गणेश1313
- sn vyas#सीताराम मैं राजा जनक की पुत्री, सम्पूर्ण संसार की माता और करुणा के सागर भगवान श्रीराम की परम प्रिय पत्नी माता सीता (जानकीजी) के दोनों चरणकमलों को प्रणाम करता हूँ। मैं उनसे प्रार्थना करता हूँ कि वे मुझ पर अपनी कृपा करें, जिससे मुझे निर्मल, पवित्र और सद्बुद्धि प्राप्त हो तथा मैं भगवान श्रीराम की महिमा का सही वर्णन कर सकूँ। सरल संदेश: माता सीता करुणा, पवित्रता, धैर्य, त्याग और आदर्श नारीत्व की मूर्ति हैं। उनकी कृपा से मन शुद्ध होता है, बुद्धि निर्मल बनती है और भगवान के प्रति सच्ची भक्ति प्राप्त होती है। इसलिए हमें भी माता जानकी के आदर्शों—धैर्य, विनम्रता, करुणा और पवित्र आचरण—को अपने जीवन में अपनाने का प्रयास करना चाहिए। 🙏🌸🚩 मैं राजा जनक की पुत्री, सम्पूर्ण संसार की माता और करुणा के सागर भगवान श्रीराम की परम प्रिय पत्नी माता सीता (जानकीजी) के दोनों चरणकमलों को प्रणाम करता हूँ। मैं उनसे प्रार्थना करता हूँ कि वे मुझ पर अपनी कृपा करें, जिससे मुझे निर्मल, पवित्र और सद्बुद्धि प्राप्त हो तथा मैं भगवान श्रीराम की महिमा का सही वर्णन कर सकूँ।2218