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इस्लाम में 'काफिर' (गैर-मुस्लिम) से मोहब्बत और व्यवहार के बारे में कुरान और हदीस में स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए हैं। इसका उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि 'मोहब्बत' से आपका क्या आशय है—सामाजिक भाईचारा या वैवाहिक संबंध।सामाजिक और मानवीय व्यवहारइस्लाम मानवीय आधार पर गैर-मुस्लिमों के साथ दया, न्याय और अच्छे व्यवहार की अनुमति देता है।न्याय और दया: जो गैर-मुस्लिम आपसे आपके धर्म के कारण नहीं लड़ते या आपको घर से नहीं निकालते, उनके साथ कुरान (60:8) के अनुसार न्याय और दया का व्यवहार करना अनिवार्य है।सद्भावना: इस्लाम किसी को सिर्फ इसलिए नफरत करने का आदेश नहीं देता क्योंकि वह मुसलमान नहीं है।अधिकार: पड़ोसी, बीमार और गरीब चाहे वे किसी भी धर्म के हों, उनकी मदद करना और उनके अधिकारों का सम्मान करना सुन्नत माना जाता है।वैवाहिक संबंध और निकाहधार्मिक दृष्टि से, निकाह के मामले में नियम कड़े हैं।मुस्लिम पुरुष: मुस्लिम पुरुष को 'अहले किताब' (ईसाई या यहूदी) महिलाओं से निकाह की अनुमति है, लेकिन अन्य गैर-मुस्लिम (मुशरिक) महिलाओं से तब तक मना किया गया है जब तक वे ईमान न ले आएं।मुस्लिम महिला: #islam मुस्लिम महिला का निकाह किसी भी गैर-मुस्लिम पुरुष से जायज (वैध) नहीं माना जाता।धार्मिक सीमा: इस्लाम में ऐसी 'मोहब्बत' को हराम माना गया है जो शरीयत की सीमाओं को तोड़ती है या निकाह के हलाल रास्ते से बाहर होती है।
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