*भेलसर की सरज़मीं पर गूंजेगी कलामे इलाही की सदाएं, मदरसा दावतुल हक़ में 20 मई को अज़ीमुश्शान जलसा-ए-तक़सीम असनाद हिफ़्ज़
*22 नौनिहाल हुफ़्फ़ाज़ होंगे दस्तारबंदी से सरफ़राज़, दारुल उलूम नदवा के मशहूर क़ारी मौलाना रियाज़ अहमद नदवी फरमाएंगे सदारत* #deen islam
अल्लाह का फैसला (Divine Judgment)अल्लाह खुद गवाह है: इस्लाम का यह बुनियादी अकीदा है कि अल्लाह सब कुछ देखता और सुनता है। जो लोग अल्लाह की शान में गुस्ताखी करते हैं और तौबा (पछतावा) नहीं करते, उन्हें अल्लाह इस दुनिया में या आखिरत (परलोक) में न्याय के अनुसार खुद सजा देगा अल्लाह ईश्वर को ग़लत बोलने वाले आर एस एस इब्लीश संघी संगठन दुनिया तेरी इबारत नाक बर्बादी का मंज़र देखेंगी इन्शा अल्लाह #allah #islam
#एकता के मुख्य पहलूइंसानियत सर्वोपरि: सम्मान धर्म या जाति देखकर नहीं, बल्कि इंसानियत के नाते होना चाहिए।सुरक्षित समाज: जब पुरुष ठान लें कि वे हर महिला को सम्मान देंगे, तभी समाज सुरक्षित बनेगा।संस्कारों की पहचान: महिलाओं के प्रति हमारा व्यवहार हमारे चरित्र और परवरिश को दर्शाता है।💡 एक नेक विचार: "नारी का सम्मान, असल में मानवता का सम्मान है।" सोशल मीडिया के लिए संदेश"रिश्ता खून का हो या न हो, हर महिला का सम्मान करना एक मर्द का पहला धर्म है।""धर्म कोई भी हो, बहन की इज़्ज़त और सुरक्षा हमारी साझी ज़िम्मेदारी है।""सच्चा मर्द वही है जिसकी मौजूदगी में कोई भी महिला खुद को सुरक्षित महसूस करे इंसानियत: "मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, और इंसानियत सिखाती है हर नारी का सम्मान करना।"संस्कार: "आपकी भाषा और व्यवहार ही बताते हैं कि आपकी परवरिश कैसी हुई है।"सुरक्षा: "जब हम दूसरों की बहनों की इज़्ज़त करेंगे, तभी हमारा समाज हमारे घर की बेटियों के लिए सुरक्षित होगा। सरहदें बाँट सकती हैं ज़मीन को, मगर हमारे फर्ज़ को नहीं,हर बहन की इज़्ज़त करना हमारा ईमान है, कोई मर्ज़ नहीं।चाहे वो किसी भी राह से गुज़रे, किसी भी धर्म की हो,उसकी ढाल बनना ही, एक सच्चे भाई की असली पहचान है।"
इस्लाम में 'काफिर' (गैर-मुस्लिम) से मोहब्बत और व्यवहार के बारे में कुरान और हदीस में स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए हैं। इसका उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि 'मोहब्बत' से आपका क्या आशय है—सामाजिक भाईचारा या वैवाहिक संबंध।सामाजिक और मानवीय व्यवहारइस्लाम मानवीय आधार पर गैर-मुस्लिमों के साथ दया, न्याय और अच्छे व्यवहार की अनुमति देता है।न्याय और दया: जो गैर-मुस्लिम आपसे आपके धर्म के कारण नहीं लड़ते या आपको घर से नहीं निकालते, उनके साथ कुरान (60:8) के अनुसार न्याय और दया का व्यवहार करना अनिवार्य है।सद्भावना: इस्लाम किसी को सिर्फ इसलिए नफरत करने का आदेश नहीं देता क्योंकि वह मुसलमान नहीं है।अधिकार: पड़ोसी, बीमार और गरीब चाहे वे किसी भी धर्म के हों, उनकी मदद करना और उनके अधिकारों का सम्मान करना सुन्नत माना जाता है।वैवाहिक संबंध और निकाहधार्मिक दृष्टि से, निकाह के मामले में नियम कड़े हैं।मुस्लिम पुरुष: मुस्लिम पुरुष को 'अहले किताब' (ईसाई या यहूदी) महिलाओं से निकाह की अनुमति है, लेकिन अन्य गैर-मुस्लिम (मुशरिक) महिलाओं से तब तक मना किया गया है जब तक वे ईमान न ले आएं।मुस्लिम महिला: #islam मुस्लिम महिला का निकाह किसी भी गैर-मुस्लिम पुरुष से जायज (वैध) नहीं माना जाता।धार्मिक सीमा: इस्लाम में ऐसी 'मोहब्बत' को हराम माना गया है जो शरीयत की सीमाओं को तोड़ती है या निकाह के हलाल रास्ते से बाहर होती है।






