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#☝ मेरे विचार
☝ मेरे विचार - प्ररक प्रसंग महामना ने दिया धैर्य का परिचय महामना के नाम से विख्यात पंः मदन् मोहन मालवीय ने अपने जीवन கதச प्रसंगों में इतने मोद्यत्चरपूरणरकप्रस अनुकरणीय परिचय दिया था कि उसके बारे में जानना हमारे लिए भी प्रेरणा का विषय बन सकता है। मदन मोहन मालवीय के जीवन में अनेक ऐसे प्रसंग हैं, जो उनके आदर्श त्याग और शिक्षा के प्रति समर्पण को दिखाते हैं। इनमें से कई प्रसिद्ध प्रसंग काशी हिंदू विश्वविद्यालय  की स्थापना से जुड़े हैं। जब मालवीय जी ने विश्वविद्यालय बनाने का संकल्प लिया (6' यह केवल एक शैक्षणिक संस्था बनाने भर की योजना नहीं थीः वे ऐसा केंद्र बनाना चाहते थे आधुनिक विज्ञान और भारतीय संस्कृति 6 साथन्साथ विकसित हों। लेकिन बडी इतनी कल्पना के लिए धन जुटाना बड़ी चुनौती थी।  तब मालवीय जी स्वयं राजाओं  उद्योगपतियों और आम लोगों के जाकर  आर्थिक पास मांगने से संकोच नहीं करते थे। सहथती है कि एक बार वे एक समृद्ध कहा जाता व्यक्ति के पास चंदा मांगने पहुंचे। उस व्यक्त ने उन्हें बहुत कम राशि दी। मालवीय जी ने वह राशि भी पूरे सम्मान से स्वीकार ली और कहा कि यह भी उतनी ही पवित्र है, क्योंकि यह किसी के हृदय से निकली है। उनके लिए दान की मात्रा से अधिक दान देने की भावना महत्वपूर्ण थी। एक बार एक रियासत के राजा ने उनकी विनती टाल दी। मालवीय जी इससे भी निराश नहीं हुए। उन्होंने कहा वे किसी व्यक्ति नहीं बल्कि शिक्षा के भविष्य से सहायता मांग रहे हैं। सहयोग भावना  का जागरण०  मालवीय जी की इसी विनम्रता , धैर्य और उद्देश्य  देखकर अंततः राजा उनका ஈ के प्रति सहायता की। इन तमाम प्रसंगों का सार यह है कि अगर आप किसी बड़े काम को केवल संसाधनों के आधार पर नहीं देखते हैं और यदि लोकहित का होता है तो लोगों के उसका उददेश्य भीतर सहयोग की भावना जगाई जा सकती है। मालवीय जी के लिए शिक्षा भी केवल नौकरी पाने का साधन नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और মিনয বীভ राष्ट्र-निर्माण का साधन थी। ५ प्ररक प्रसंग महामना ने दिया धैर्य का परिचय महामना के नाम से विख्यात पंः मदन् मोहन मालवीय ने अपने जीवन கதச प्रसंगों में इतने मोद्यत्चरपूरणरकप्रस अनुकरणीय परिचय दिया था कि उसके बारे में जानना हमारे लिए भी प्रेरणा का विषय बन सकता है। मदन मोहन मालवीय के जीवन में अनेक ऐसे प्रसंग हैं, जो उनके आदर्श त्याग और शिक्षा के प्रति समर्पण को दिखाते हैं। इनमें से कई प्रसिद्ध प्रसंग काशी हिंदू विश्वविद्यालय  की स्थापना से जुड़े हैं। जब मालवीय जी ने विश्वविद्यालय बनाने का संकल्प लिया (6' यह केवल एक शैक्षणिक संस्था बनाने भर की योजना नहीं थीः वे ऐसा केंद्र बनाना चाहते थे आधुनिक विज्ञान और भारतीय संस्कृति 6 साथन्साथ विकसित हों। लेकिन बडी इतनी कल्पना के लिए धन जुटाना बड़ी चुनौती थी।  तब मालवीय जी स्वयं राजाओं  उद्योगपतियों और आम लोगों के जाकर  आर्थिक पास मांगने से संकोच नहीं करते थे। सहथती है कि एक बार वे एक समृद्ध कहा जाता व्यक्ति के पास चंदा मांगने पहुंचे। उस व्यक्त ने उन्हें बहुत कम राशि दी। मालवीय जी ने वह राशि भी पूरे सम्मान से स्वीकार ली और कहा कि यह भी उतनी ही पवित्र है, क्योंकि यह किसी के हृदय से निकली है। उनके लिए दान की मात्रा से अधिक दान देने की भावना महत्वपूर्ण थी। एक बार एक रियासत के राजा ने उनकी विनती टाल दी। मालवीय जी इससे भी निराश नहीं हुए। उन्होंने कहा वे किसी व्यक्ति नहीं बल्कि शिक्षा के भविष्य से सहायता मांग रहे हैं। सहयोग भावना  का जागरण०  मालवीय जी की इसी विनम्रता , धैर्य और उद्देश्य  देखकर अंततः राजा उनका ஈ के प्रति सहायता की। इन तमाम प्रसंगों का सार यह है कि अगर आप किसी बड़े काम को केवल संसाधनों के आधार पर नहीं देखते हैं और यदि लोकहित का होता है तो लोगों के उसका उददेश्य भीतर सहयोग की भावना जगाई जा सकती है। मालवीय जी के लिए शिक्षा भी केवल नौकरी पाने का साधन नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और মিনয বীভ राष्ट्र-निर्माण का साधन थी। ५ - ShareChat