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अलविदा बशीर बद्र #✒ शायरी
✒ शायरी - अलविदा बशीर बद्र उजाले अपनी यादों के साथ रहने दो हमारे न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे दुश्मनी  कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिदा न हों जब मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं पाँव फैलाऊं तो दीवार में सर लगता है लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला अलविदा बशीर बद्र उजाले अपनी यादों के साथ रहने दो हमारे न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे दुश्मनी  कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिदा न हों जब मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं पाँव फैलाऊं तो दीवार में सर लगता है लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला - ShareChat