#तीर्थ स्थल
प्रश्न:मनुष्य तीर्थ पर जाकर भी लड़ाई झगड़ा करता है और नशे करता है तो क्या उसे तीर्थ स्थल पर जाने का लाभ मिलता है???
उत्तर:मेरे उत्तर ऐसे होते हैं कि उससे बड़ा विरोधाभास उत्पन्न होने की संभावना रहती है क्योंकि मन को अच्छा लगने वाले उत्तर दे पाना बड़ा कठिन होता है क्योंकि ऐसा करने के लिए सत्य को अंतर्ध्यान करना पड़ता है।।
ये तीर्थ पर जाते धार्मिक स्थलों पर घूमते मंदिरों में भीड़ किए हुए कहीं से भी धार्मिक नहीं है अपितु देखा देखी जाने के प्रचलन को अपनाए हुए हैं।।अब कोई कपटी श्रीकाशी में जाएगा तो भी वह कपटी ही रहेगा।।
मान लीजिए कि आप ही दुष्ट प्रवृत्ति के हैं और हरिद्वार चले गए हैं तो भी आप तो आप ही रहेंगे न कुछ और तो नहीं हो जाएंगे।।
श्री काशी अथवा अयोध्या में जाने पर भी आपको कुछ नहीं मिलेगा क्योंकि यदि वहां जाने मात्र से कुछ मिल रहा होता तो श्री अयोध्या के मंदिर के कर्मचारी चोर नहीं होते और समस्त स्थान पर इनकी खिल्ली न उड़ रही होती।।चोर वैश्यालय में रहे कि मंदिर में चोर तो चोर ही रहेगा।।
इसीलिए जीवन में सदगुरू की आवश्यकता होती है क्योंकि परिवर्तन पहले अंदर करना होता है उसके पश्चात बाहर परिवर्तन होता है।।
यदि अपने अंदर मर्यादा पुरुषोत्तम को अनुभव न कर पाए तो बाहर कहीं भी चले जाओ कोई मिलने वाला नहीं है क्योंकि जो श्री काशी में है वह तो हमारे अंदर भी है।।
आपके अंदर एक आप रहते हैं और एक आप का बाप रहता है।।
कोई ऐसा मनुष्य जो अपने अंदर झांक पाया हो और वह जब अयोध्या में जाता है तो उसको अयोध्या में मर्यादा पुरुषोत्तम साक्षात विराजमान मिलते हैं और यह बड़ी गहरी बात है और जितनी गहरी है उतनी ही सत्य भी है।।
नशा करने वाला किसी स्थान पर जाए तो नशे की दुकान ढूंढ लेता है और भक्त किसी स्थान पर जाए तो मंदिर ढूंढ लेता है क्योंकि एक के भीतर नशा है और एक के अंदर मंदिर है।।
जो भीतर होता है न वही बाहर होता है।।
संसार बाहर नहीं अपितु भीतर होता है।।वेद का प्रमाण है चित एव ही संसारा।।
अतः भावनाओं में बहकर और देखा देखी कहीं जाओ तो वहां जाकर बड़े ध्यान से देखो तो पाओगे कि वहां रहने वाले भी इसी तरह के कपटी और दुष्ट हैं।।
जिसके भीतर प्रकाश है उससे मिलोगे तो पाओगे कि वह जहां जा रहा है वहां भी उसे प्रकाश ही दिखाई दे रहा है।।
जिसके मन में राम हो उसे बाहर भी राम ही दिखाई देते हैं।।
गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने कहा है न
सिया राम मय सब जग जानी
चूंकि गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज के अंदर रोम रोम में राम है अतः गोस्वामी जी को हर स्थान पर राम ही दिखाई दे रहे हैं।।
चोर और दुष्ट के मन में कपट और दुष्टता है अतः हर स्थान पर कपट और दुष्टता ही देखेगा और अवसर मिलने पर ऐसा ही करेगा।।
जितना जान पाया उतना लिखने का प्रयास किया है किसी की भावना आहत हुई हो तो मैं अग्रिम क्षमा प्रार्थी हूं किन्तु किसी की भावना आहत न हो इसके लिए असत्य लिखना मेरे वश में नहीं है।।
यही तत्व ज्ञान का प्रथम अध्याय भी है।।
जान सके तो जान।।
जय भोलेनाथ 🙏 जय जगन्नाथ 🙏


