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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣0️⃣2️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः भीमसेन, दुर्योधन तथा अर्जुन के द्वारा अस्त्र-कौशल का प्रदर्शन...(दिन 402) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच कुरुराजे हि रङ्गस्थे भीमे च बलिनां वरे । पक्षपातकृतस्नेहः स द्विधेवाभवज्जनः ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! जब कुरुराज दुर्योधन और बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमसेन रंगभूमिमें उतरकर गदायुद्ध कर रहे थे, उस समय दर्शक जनता उनके प्रति पक्षपातपूर्ण स्नेह करनेके कारण मानो दो दलोंमें बँट गयी ।। १ ।। ही वीर कुरुराजेति ही भीम इति जल्पताम् । पुरुषाणां सुविपुलाः प्रणादाः सहसोत्थिताः ।। २ ।। कुछ कहते, 'अहो! वीर कुरुराज कैसा अद्भुत पराक्रम दिखा रहे हैं।' दूसरे बोल उठते, 'वाह! भीमसेन तो गजबका हाथ मारते हैं।' इस तरहकी बातें करनेवाले लोगोंकी भारी आवाजें वहाँ सहसा सब ओर गूंजने लगीं ।। २ ।। ततः क्षुब्धार्णवनिभं रंगमालोक्य बुद्धिमान् । भारद्वाजः प्रियं पुत्रमश्वत्थामानमब्रवीत् ।। ३ ।। फिर तो सारी रंगभूमिमें क्षुब्ध महासागरके समान हलचल मच गयी। यह देख बुद्धिमान् द्रोणाचार्यने अपने प्रिय पुत्र अश्वत्थामासे कहा ।। ३ ।। द्रोण उवाच वारयैतौ महावीर्यों कृतयोग्यावुभावपि । मा भूद् रङ्गप्रकोपोऽयं भीमदुर्योधनोद्भवः ।। ४ ।। द्रोण बोले-वत्स ! ये दोनों महापराक्रमी वीर अस्त्र-विद्यामें अत्यन्त अभ्यस्त हैं। तुम इन दोनोंको युद्धसे रोको, जिससे भीमसेन और दुर्योधनको लेकर रंगभूमिमें सब ओर क्रोध न फैल जाय ।। ४ ।। वैशम्पायन उवाच (तत उत्थाय वेगेन अश्वत्थामा न्यवारयत् । गुरोराज्ञा भीम इति गान्धारे गुरुशासनम् । अलं योग्यकृतं वेगमलं साहसमित्युत ।।) ततस्तावुद्यतगदौ गुरुपुत्रेण वारितौ । युगान्तानिलसंक्षुब्धौ महावेलाविवार्णवौ ।। ५ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! तदनन्तर अश्वत्थामाने बड़े वेगसे उठकर भीमसेन और दुर्योधनको रोकते हुए कहा- 'भीम! तुम्हारे गुरुकी आज्ञा है, गान्धारीनन्दन ! आचार्यका आदेश है, तुम दोनोंका युद्ध बंद होना चाहिये। तुम दोनों ही योग्य हो, तुम्हारा एक-दूसरेके प्रति वेगपूर्वक आक्रमण अवांछनीय है। तुम दोनोंका यह दुःसाहस अनुचित है। अतः इसे बंद करो।' इस प्रकार कहकर प्रलयकालीन वायुसे विक्षुब्ध उत्ताल तरंगोंवाले दो समुद्रोंकी भाँति गदा उठाये हुए दुर्योधन और भीमसेनको गुरुपुत्र अश्वत्थामाने युद्धसे रोक दिया ।। ५ ।। ततो रङ्गाङ्गणगतो द्रोणो वचनमब्रवीत् । निवार्य वादित्रगणं महामेघनिभस्वनम् ।। ६ ।। तत्पश्चात् द्रोणाचार्यने महान् मेघोंके समान कोलाहल करनेवाले बाजोंको बंद कराकर रंगभूमि में उपस्थित हो यह बात कही- ।। ६ ।। यो मे पुत्रात् प्रियतरः सर्वशस्त्रविशारदः । ऐन्द्रिरिन्द्रानुजसमः स पार्थो दृश्यतामिति ।। ७ ।। 'दर्शकगण ! जो मुझे पुत्रसे भी अधिक प्रिय है, जिसने सम्पूर्ण शस्त्रोंमें निपुणता प्राप्त की है तथा जो भगवान् नारायणके समान पराक्रमी है, उस इन्द्रकुमार कुन्तीपुत्र अर्जुनका कौशल आपलोग देखें' ।। ७ ।। आचार्यवचनेनाथ कृतस्वस्त्ययनो युवा । बद्धगोधाङ्गुलित्राणः पूर्णतूणः सकार्मुकः ।। ८ ।। काञ्चनं कवचं बिभ्रत् प्रत्यदृश्यत फाल्गुनः । सार्कः सेन्द्रायुधतडित् ससंध्य इव तोयदः ।। ९ ।। तदनन्तर आचार्यके कहनेसे स्वस्तिवाचन कराकर तरुण वीर अर्जुन गोहके चमड़ेके बने हुए हाथके दस्ताने पहने, बाणोंसे भरा तरकस लिये धनुषसहित रंगभूमिमें दिखायी दिये। वे श्याम शरीरपर सोनेका कवच धारण किये ऐसे सुशोभित हो रहे थे, मानो सूर्य, इन्द्रधनुष, विद्युत् और संध्याकालसे युक्त मेघ शोभा पाता हो ।। ८-९ ।। ततः सर्वस्य रङ्गस्य समुत्पिञ्जलकोऽभवत् । प्रावाद्यन्त च वाद्यानि सशङ्खानि समन्ततः ।। १० ।। फिर तो समूचे रंगमण्डपमें हर्षोल्लास छा गया। सब ओर भाँति-भाँतिके बाजे और शंख बजने लगे ।। १० ।। एष कुन्तीसुतः श्रीमानेष मध्यमपाण्डवः । एष पुत्रो महेन्द्रस्य कुरूणामेष रक्षिता ।। ११ ।। एषोऽस्त्रविदुषां श्रेष्ठ एष धर्मभृतां वरः । एष शीलवतां चापि शीलज्ञाननिधिः परः ।। १२ ।। कुन्त्याः प्रस्रवसंयुक्तैरसैः क्लिन्नमुरोऽभवत् ।। १३ ।। इत्येवं तुमुला वाचः शृण्वत्याः प्रेक्षकेरिताः । 'ये कुन्तीके तेजस्वी पुत्र हैं। ये ही पाण्डुके मझले बेटे हैं। ये देवराज इन्द्रकी संतान हैं। ये ही कुरुवंशके रक्षक हैं। अस्त्र-विद्याके विद्वानोंमें ये सबसे उत्तम हैं। ये धर्मात्माओं और शीलवानोंमें श्रेष्ठ हैं। शील और ज्ञानकी तो ये सर्वोत्तम निधि हैं।' उस समय दर्शकोंके मुखसे तुमुल ध्वनिके साथ निकली हुई ये बातें सुनकर कुन्तीके स्तनोंसे दूध और नेत्रोंसे स्नेहके आँसू बहने लगे। उन दुग्धमिश्रित आँसुओंसे कुन्तीदेवीका वक्षःस्थल भीग गया ।। ११-१३ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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