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"हर उस आवाज़ को अस्वीकार कर दो जो तुम्हे डराती हो "🖤🤎👍🏻👍🏻 #आचार्य प्रशांत - Aacharya Prashant #realty of life #आचार्य प्रशांत की बाते #Aachrya parsant #Life Truth
आचार्य प्रशांत - Aacharya Prashant - डर तुमको बार - बार बताती हैं कि डरो और बीमा कराओ । और तुम्हें लगता है कि इन्होंने जाएगी जिसमें तुम हो , तुम्हारी बीवी है और एक बच्चा है । और फिर एक दूसरी तस्वीर दिखाई जाएगी जिसमें तुम गायब हो जाओगे , और कहा जाएगा कि अब कुछ करो हमारे हित की बात की । तो बीमे का विज्ञापन आएगा , उसमें एक बड़ी तस्वीर दिखाई और तुम तुरन्त जाओगे और वो बीमा खरीद लाओगे । एक दूसरा विज्ञापन आएगा , जिसमें तुम चले जा रहे हो और तुम अपने साधारण कपड़ो में हो , कोई इत्र नहीं लगा रखा है । और लड़कियाँ आती हैं तुम्हारे आसपास , नाक सिकोड़कर के चली जाती हैं । अब तुमसे कहा जाएगा , ' ये लो , ये खास मर्दाना इत्र , इससे तुम्हारा पुरुषत्व जगेगा , अन्यथा जीवन सूना रह जाएगा , साथी पास नहीं आएँगे । ' डर लगातार बैठाया जा रहा है । पर तुम इसको समझोगे नहीं , तुम कहोगे , ' भले की बात की । ' और जाओगे और वही इत्र खरीदकर ले आओगे । हर उस आवाज़ को अस्वीकार कर दो जो तुम्हें डराती हो । वो आवाज़ तुम्हारी हितैषी नहीं हो सकती , बिलकुल अस्वीकार कर दो । हाँ ! करूँगा , काम करूँगा , पर अपने आनन्द में करूँगा , प्रेम में करूंगा । डराकर कराओगे तो नहीं करूँगा , क्योंकि डरकर जीना जीवन का अपमान है । एक दबा - सहमा जीवन जीवन है ही नहीं , वो सिर्फ़ घुटते रहने की एक दुखद प्रक्रिया भर है । और हमें उस प्रक्रिया में नहीं रहना , बिलकुल नहीं रहना । अपनेआप से अभी बोल दो कि मुझे उस प्रक्रिया से बाहर होना है । ‘ मैं ऐसे सिस्टम में नहीं रहूँगा जो डर पर आधारित हो । ' और सिस्टम , तुमसे फिर कह रहा हूँ , बाहर ही नहीं है , कि तुम कहो कि सर , क्या हम पूरी व्यवस्था को बदल सकते हैं । मैं वो सब बात नहीं कर रहा हूँ । मैं तुम्हारी मानसिक व्यवस्था की बात कर रहा हूँ , याद रखना । तुममें बचपन से ही डर बैठाया गया है । बचपन में तुम नहीं जान पाते थे तो अब जानो न कि किन माध्यमों से , किन साधनों से उस डर को खुराक दी जा रही है । उस खुराक को रोक दो , बड़े नुकसान हैं उसके । डरा आदमी हिंसक हो जाता है , बहुत हिंसक हो जाता है । डरा आदमी उलझा हुआ रहता है , बोरियत में जीता है । उसकी ज़िन्दगी में कोई ऊर्जा नहीं होती , गर्मी नहीं होती , सिर्फ़ एक संकुचन होता है । वो अपने आप में सिकुड़ जाता है । उसमें विस्तार नहीं होता कि वो फैले , दूसरों तक भी पहुँचे । उसमें घुटन होती है , एक संकुचन । वो कहीं पर होता है तो उसको लगता है कि बस किसी तरीके से सिकुड़ जाऊँ , यहाँ न आऊँ तो ज़्यादा अच्छा है । या उसके विपरीत उसको लगता है कि सबको मार दूँ । हिंसा डर से ही निकलती है । वो जीवन को बस ढोता है । ... हमें ढोना नहीं है , हम सब काबिल हैं और हमारे सामने एक पूरा जीवन पड़ा हुआ है , उसको पूरी निडरता में हमें जीना है । writing MS | X1 X - TRA SUPER DARK HO / 2 ड दो बैठे कि - ShareChat