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#मेरे विचार #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏 प्रेरणादायक विचार #गीता
मेरे विचार - इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके उस परमेश्वरका मनन और निदिध्यासन करना चाहिये ।l ४।l निर्मानमोहा जितसङ्गदोपा - विनिवृत्तकामाः  अध्यात्मनित्या 61 द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ै - र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं  तत्।I जिसका मान और मोह नष्ट हा गया हैं, जिन्होंने आसक्तिरूप दोपको जीत लिया हैं, जिनको परमात्माके स्वरूपमें नित्य स्थिति हैं और जिनको कामनाएँ पूर्णरूपसे नष्ट हो गयो हैंड़वे सुख-दुःख नामक विमुक्त ज्ञानीजन उस अविनाशी परमपदको द्वन्द्वांसे प्राप्त होते हैं Il ५ Il तद्भासयते न शशाङ्को न पावकः | सूर्यों न न   निवर्तन्ते परमं यद्गत्वा নভ্লাস AII जिस परमपदको प्राप्त होकर मनुप्य लौटकर संसारमें नहीं आते, उस स्वयंप्रकाश परमपदको न सूर्य प्रकाशित कर सकता हैं, न चन्द्रमा और न अग्नि हो; वही मेरा परमधाम है * II६।l  परमधाम ' का अर्थ गौता अध्याय ८ श्लोक २१ में देखना चाहिये। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १५ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके उस परमेश्वरका मनन और निदिध्यासन करना चाहिये ।l ४।l निर्मानमोहा जितसङ्गदोपा - विनिवृत्तकामाः  अध्यात्मनित्या 61 द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ै - र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं  तत्।I जिसका मान और मोह नष्ट हा गया हैं, जिन्होंने आसक्तिरूप दोपको जीत लिया हैं, जिनको परमात्माके स्वरूपमें नित्य स्थिति हैं और जिनको कामनाएँ पूर्णरूपसे नष्ट हो गयो हैंड़वे सुख-दुःख नामक विमुक्त ज्ञानीजन उस अविनाशी परमपदको द्वन्द्वांसे प्राप्त होते हैं Il ५ Il तद्भासयते न शशाङ्को न पावकः | सूर्यों न न   निवर्तन्ते परमं यद्गत्वा নভ্লাস AII जिस परमपदको प्राप्त होकर मनुप्य लौटकर संसारमें नहीं आते, उस स्वयंप्रकाश परमपदको न सूर्य प्रकाशित कर सकता हैं, न चन्द्रमा और न अग्नि हो; वही मेरा परमधाम है * II६।l  परमधाम ' का अर्थ गौता अध्याय ८ श्लोक २१ में देखना चाहिये। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १५ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat