#श्री कृष्ण #जय श्री कृष्ण
द्वापर युग के अंतिम दिनों की बात है। वृंदावन से दूर एक छोटे से नगर में माधव नाम का एक युवक रहता था। वह भगवान श्रीकृष्ण को अपना मित्र, अपना रक्षक और अपना सर्वस्व मानता था। उसके पास न धन था, न कोई बड़ा पद, लेकिन उसके हृदय में श्रीकृष्ण के प्रति अटूट प्रेम था। हर सुबह वह उठकर सबसे पहले कृष्ण का नाम लेता, उनके सामने दीप जलाता और कहता, "हे कान्हा, संसार चाहे मेरा साथ छोड़ दे, पर मुझे विश्वास है कि आप कभी मेरा हाथ नहीं छोड़ेंगे।" लोग उसकी भक्ति देखकर मुस्कुराते थे। कुछ उसका सम्मान करते थे, तो कुछ उसे भोला समझकर उपहास भी उड़ाते थे। लेकिन माधव को इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता था।
एक दिन नगर के एक धनी व्यापारी ने उसे अपने गोदाम की देखभाल का काम सौंपा। माधव ईमानदारी से अपना कार्य करता था। कुछ ही समय में व्यापारी को उस पर पूरा विश्वास हो गया। लेकिन जहां विश्वास होता है, वहां ईर्ष्या भी जन्म लेती है। व्यापारी के कुछ कर्मचारी माधव की सच्चाई और लोकप्रियता से जलने लगे। उन्होंने एक षड्यंत्र रचा। एक रात उन्होंने गोदाम से बहुमूल्य रत्न और सोने के आभूषण चुरा लिए और सारा दोष माधव पर डाल दिया। सुबह जब चोरी का पता चला तो पूरे नगर में हड़कंप मच गया। सभी उंगलियां माधव की ओर उठने लगीं।
व्यापारी, जिसने कभी उस पर विश्वास किया था, अब क्रोध से भर गया। बिना पूरी जांच के उसने माधव को दोषी मान लिया। नगर के लोगों ने भी उसे चोर कहना शुरू कर दिया। माधव बार-बार कहता रहा कि उसने कोई चोरी नहीं की, लेकिन उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं था। अंततः उसे राजदरबार में प्रस्तुत किया गया। राजा ने आदेश दिया कि अगले दिन सूर्योदय तक यदि चोरी का सामान नहीं मिला तो माधव को कठोर दंड दिया जाएगा। यह सुनकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। पहली बार उसके जीवन में ऐसा संकट आया था जहां उसे हर ओर अंधेरा दिखाई दे रहा था।
उस रात माधव को एक छोटे से कक्ष में बंद कर दिया गया। बाहर पहरेदार खड़े थे और भीतर वह अकेला बैठा था। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे। उसने आकाश की ओर देखकर कहा, "हे मेरे कृष्ण, मैंने जीवन भर आपका नाम लिया। यदि आज मैं निर्दोष होते हुए भी अपराधी कहलाऊं तो मेरा जीवन व्यर्थ हो जाएगा। मैं अपनी रक्षा नहीं कर सकता। अब सब कुछ आपके हाथ में है।" इतना कहकर वह रोते-रोते वहीं बैठ गया। धीरे-धीरे उसकी आंख लग गई, लेकिन उसके होंठों पर अब भी कृष्ण का नाम था।
उसी रात एक अद्भुत घटना घटी। कहा जाता है कि भगवान अपने भक्त की पुकार कभी अनसुनी नहीं करते। नगर के बाहर एक अज्ञात युवक दिखाई दिया। उसके चेहरे पर दिव्य तेज था, लेकिन वह साधारण वस्त्रों में था। वह सीधे उस स्थान पर पहुंचा जहां असली चोर चोरी का सामान छिपाकर बैठे थे। जैसे ही उन्होंने उस युवक को देखा, उनके हृदय में अजीब भय उत्पन्न हो गया। युवक ने मुस्कुराकर कहा, "जो वस्तु तुम्हारी नहीं है, उसे छिपाकर कब तक रखोगे?" उसके शब्द सुनते ही उनके शरीर कांपने लगे। उन्हें लगा जैसे स्वयं उनका अंत सामने खड़ा हो। भय और पश्चाताप से भरकर उन्होंने सारी चोरी स्वीकार कर ली और सामान लेकर राजा के महल की ओर चल पड़े।
लेकिन लीला यहीं समाप्त नहीं हुई। उसी समय नगर के लोगों ने एक और विचित्र घटना देखी। रात जैसे ठहर सी गई थी। जिन्हें लग रहा था कि कुछ ही क्षण बीते हैं, उन्हें पता ही नहीं चला कि घंटों गुजर चुके थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो स्वयं काल ने अपनी गति धीमी कर दी हो। बाद में संतों ने कहा कि वह समय स्वयं श्रीकृष्ण की लीला थी। यदि समय अपने सामान्य वेग से चलता, तो सूर्योदय हो जाता और माधव को दंड मिल जाता। इसलिए अपने भक्त की लाज बचाने के लिए भगवान ने समय को ही रोक दिया।
प्रातःकाल से ठीक पहले असली चोर राजदरबार पहुंच गए। उन्होंने सबके सामने अपना अपराध स्वीकार कर लिया और चोरी का सारा सामान लौटा दिया। यह देखकर राजा, व्यापारी और नगरवासी स्तब्ध रह गए। माधव को तुरंत मुक्त कर दिया गया। व्यापारी उसके चरणों में गिर पड़ा और क्षमा मांगने लगा। जिन्होंने उसे चोर कहा था, वे भी शर्म से सिर झुकाने लगे। लेकिन माधव के मन में किसी के प्रति क्रोध नहीं था। उसकी आंखों में केवल अपने प्रिय कृष्ण के प्रति कृतज्ञता थी।
जब वह अपने घर लौटा तो उसे अपने द्वार पर एक मोरपंख पड़ा मिला। उसके पास कोई नहीं था, लेकिन वातावरण में बांसुरी की मधुर ध्वनि गूंज रही थी। माधव समझ गया कि यह सब उसके कान्हा की लीला थी। वह भावविभोर होकर रो पड़ा और बोला, "हे प्रभु, आपने सचमुच मेरी लाज रख ली। जब सारी दुनिया ने मुझे छोड़ दिया, तब आप मेरे साथ खड़े रहे।"
तब से नगर के लोग यह कथा सुनाते हैं कि सच्चा भक्त कभी अकेला नहीं होता। जब हर रास्ता बंद हो जाए, जब कोई आशा न बचे, तब भी भगवान अपने भक्त का हाथ नहीं छोड़ते। कभी वे मित्र बनकर आते हैं, कभी रक्षक बनकर, और कभी ऐसी अद्भुत लीला करते हैं कि समय भी उनके आदेश का पालन करता है। क्योंकि भगवान के लिए सबसे प्रिय वस्तु न धन है, न वैभव, बल्कि अपने भक्त का सच्चा और निष्कपट प्रेम है। श्रीकृष्ण अपने भक्तों की लाज रखने के लिए आज भी हर युग में, हर रूप में, उनके साथ खड़े रहते हैं।
जय श्रीकृष्ण।
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