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##जय मां गायत्री जय गुरुवर
#जय मां गायत्री जय गुरुवर - ईश्वरीय सत्ता का तत्त्वन्ज्ञान खुशामदपसंद नहीं | किसी की निंदा-स्तुति की परमात्मा उसे आवश्यकता नहीं वह किसी पर प्रसन्न, अप्रसन्न नहीं होता| पूजा - उपासना एक प्रकार का आध्यात्मिक व्यायाम है, EdTTTT जिसके करने से हमारा आत्मबल बढ़ता है, की मात्रा में वृद्धि होती है | ईश्वर को सर्वव्यापक समझने वाला पापों से कोतवाल सामने खडा हो, तो चोर प्रकृति का मनुष्य  डरेगा भी उस समय साधु -सा आचरण करता है । सबसे बड़े कोतवाल  ईश्वर को जो अपने अंदर- बाहर चारों ओर व्यापक देखता है, वह उसके दंड से डरेगा और पाप न कर सकेगा | प्राणीमात्र में ईश्वर को व्यापक देखने वाला व्यक्ति ही सबके साथ अच्छा व्यवहार कर सकता है ईश्वरीय दृष्टि प्राप्त करना, ईश्वर की आराधना का 6 प्रधान उद्देश्य है। ध्यान, प्रार्थना, पूजा, कीर्तन, जप आदि ऐसी  मनोवैज्ञानिक क्रियाएँ हैं, जिनके द्वारा मनोभूमि में चिपके हुए अनेक कुसंस्कार छूटते हैं और उनके स्थान पर सुसंस्कारों की स्थापना होती है। यदि उस अंतरात्मा की पुकार को सुना जाए॰ उसके संकेतों पर चला जाए तो बुरे-से-बुरा मनुष्य भी थोड़े ही समय में श्रेष्ठतम महात्मा बन सकता है। गीता में भगवान ने छोड़ मेरी शरण में आ, मैं तुझे सब पापों -*44 कहा है कि- से मुक्त कर दूँगा । ' मेरी शरण अर्थात् अंतरात्मा की शरण | -अखण्ड ज्योति फरवरी १९५१ पृष्ठ ५ ईश्वरीय सत्ता का तत्त्वन्ज्ञान खुशामदपसंद नहीं | किसी की निंदा-स्तुति की परमात्मा उसे आवश्यकता नहीं वह किसी पर प्रसन्न, अप्रसन्न नहीं होता| पूजा - उपासना एक प्रकार का आध्यात्मिक व्यायाम है, EdTTTT जिसके करने से हमारा आत्मबल बढ़ता है, की मात्रा में वृद्धि होती है | ईश्वर को सर्वव्यापक समझने वाला पापों से कोतवाल सामने खडा हो, तो चोर प्रकृति का मनुष्य  डरेगा भी उस समय साधु -सा आचरण करता है । सबसे बड़े कोतवाल  ईश्वर को जो अपने अंदर- बाहर चारों ओर व्यापक देखता है, वह उसके दंड से डरेगा और पाप न कर सकेगा | प्राणीमात्र में ईश्वर को व्यापक देखने वाला व्यक्ति ही सबके साथ अच्छा व्यवहार कर सकता है ईश्वरीय दृष्टि प्राप्त करना, ईश्वर की आराधना का 6 प्रधान उद्देश्य है। ध्यान, प्रार्थना, पूजा, कीर्तन, जप आदि ऐसी  मनोवैज्ञानिक क्रियाएँ हैं, जिनके द्वारा मनोभूमि में चिपके हुए अनेक कुसंस्कार छूटते हैं और उनके स्थान पर सुसंस्कारों की स्थापना होती है। यदि उस अंतरात्मा की पुकार को सुना जाए॰ उसके संकेतों पर चला जाए तो बुरे-से-बुरा मनुष्य भी थोड़े ही समय में श्रेष्ठतम महात्मा बन सकता है। गीता में भगवान ने छोड़ मेरी शरण में आ, मैं तुझे सब पापों -*44 कहा है कि- से मुक्त कर दूँगा । ' मेरी शरण अर्थात् अंतरात्मा की शरण | -अखण्ड ज्योति फरवरी १९५१ पृष्ठ ५ - ShareChat