#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣8️⃣0️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
भीमसेन के न आने से कुन्ती आदि की चिन्ता, नागलोक से भीमसेन का आगमन तथा उनके प्रति दुर्योधन की कुचेष्टा...(दिन 380)
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न च प्रीणयते चक्षुः सदा दुर्योधनस्य सः ।
क्रूरोऽसौ दुर्मतिः क्षुद्रो राज्यलुब्धोऽनपत्रपः ।। १५ ।।
'वह सदा दुर्योधनकी आँखोंमें खटकता रहता है। दुर्योधन क्रूर, दुर्बुद्धि, क्षुद्र, राज्यका लोभी तथा निर्लज्ज है ।। १५ ।।
निहन्यादपि तं वीरं जातमन्युः सुयोधनः । तेन मे व्याकुलं चित्तं हृदयं दह्यतीव च ।। १६ ।।
'अतः सम्भव है, वह क्रोधमें वीर भीमसेनको धोखा देकर मार भी डाले। इसी चिन्तासे मेरा चित्त व्याकुल हो उठा है, हृदय दग्ध-सा हो रहा है' ।। १६ ।।
विदुर उवाच
मैवं वदस्व कल्याणि शेषसंरक्षणं कुरु । प्रत्यादिष्टो हि दुष्टात्मा शेषेऽपि प्रहरेत् तव ।। १७ ।।
विदुरजीने कहा-कल्याणी! ऐसी बात मुँहसे न निकालो, शेष पुत्रोंकी रक्षा करो। यदि दुर्योधनको उलाहना देकर इस विषयमें पूछ-ताछ की जायगी तो वह दुष्टात्मा तुम्हारे शेष पुत्रोंपर भी प्रहार कर सकता है ।। १७ ।।
दीर्घायुषस्तव सुता यथोवाच महामुनिः । आगमिष्यति ते पुत्रः प्रीतिं चोत्पादयिष्यति ।। १८ ।।
महामुनि व्यासने पहले जैसा कहा है, उसके अनुसार तुम्हारे ये सभी पुत्र दीर्घजीवी हैं, अतः तुम्हारा पुत्र भीमसेन कहीं भी क्यों न गया हो, अवश्य लौटेगा और तुम्हें आनन्द प्रदान करेगा ।। १८ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा ययौ विद्वान् विदुरः स्वं निवेशनम् । कुन्ती चिन्तापरा भूत्वा सहासीना सुतैगृहे ।। १९ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! विद्वान् विदुर यों कहकर अपने घरमें चले गये। इधर कुन्ती चिन्तामग्न होकर अपने चारों पुत्रोंके साथ चुपचाप घरमें बैठ रही ।। १९ ।।
ततोऽष्टमे तु दिवसे प्रत्यबुध्यत पाण्डवः ।
तस्मिंस्तदा रसे जीर्णे सोऽप्रमेयबलो बली ।। २० ।।
उधर, नागलोकमें सोये हुए बलवान् भीमसेन आठवें दिन, जब वह रस पच गया, जगे। उस समय उनके बलकी कोई सीमा नहीं रही ।। २० ।।
तं दृष्ट्वा प्रतिबुध्यन्तं पाण्डवं ते भुजङ्गमाः ।
सान्त्वयामासुव्यग्रा वचनं चेदमब्रुवन् ।। २१ ।।
पाण्डुनन्दन भीमको जगा हुआ देख सब नागोंने शान्त-चित्तसे उन्हें आश्वासन दिया और यह बात कही- ।। २१ ।।
यत् ते पीतो महाबाहो रसोऽयं वीर्यसम्भृतः । तस्मान्नागायुतबलो रणेऽधृष्यो भविष्यसि ।। २२ ।।
'महाबाहो ! तुमने जो यह शक्तिपूर्ण रस पीया है, इसके कारण तुम्हारा बल दस हजार हाथियोंके समान होगा और तुम युद्धमें अजेय हो जाओगे ।। २२ ।।
गच्छाद्य त्वं च स्वगृहं स्नातो दिव्यैरिमैर्जलैः ।
भ्रातरस्तेऽनुतप्यन्ति त्वां विना कुरुपुङ्गव ।। २३ ।।
'आज तुम इस दिव्य जलसे स्नान करो और अपने घर लौट जाओ। कुरुश्रेष्ठ ! तुम्हारे बिना तुम्हारे सब भाई निरन्तर दुःख और चिन्तामें डूबे रहते हैं' ।। २३ ।।
ततः स्नातो महाबाहुः शुचिः शुक्लाम्बरस्रजः । ततो नागस्य भवने कृतकौतुकमङ्गलः ।। २४ ।।
ओषधीभिर्विषघ्नीभिः सुरभीभिर्विशेषतः।
भुक्तवान् परमान्नं च नागैर्दत्तं महाबलः ।। २५ ।।
तब महाबाहु भीमसेन स्नान करके शुद्ध हो गये। उन्होंने श्वेत वस्त्र और श्वेत पुष्पोंकी माला धारण की। तत्पश्चात् नागराजके भवनमें उनके लिये कौतुक एवं मंगलाचार सम्पन्न किये गये। फिर उन महाबली भीमने विष-नाशक सुगन्धित ओषधियोंके साथ नागोंकी दी हुई खीर खायी ।। २४-२५ ।।
पूजितो भुजगैर्वीर आशीर्भिश्चाभिनन्दितः । दिव्याभरणसंछन्नो नागानामन्त्र्य पाण्डवः ।। २६ ।।
उदतिष्ठत् प्रहृष्टात्मा नागलोकादरिंदमः । उत्क्षिप्तः स तु नागेन जलाज्जलरुहेक्षणः ।। २७ ।।
तस्मिन्नेव वनोद्देशे स्थापितः कुरुनन्दनः ।
ते चान्तर्दधिरे नागाः पाण्डवस्यैव पश्यतः ।। २८ ।।
इसके बाद नागोंने वीर भीमसेनका आदर-सत्कार करके उन्हें शुभाशीर्वादोंसे प्रसन्न किया। दिव्य आभूषणोंसे विभूषित शत्रुदमन भीमसेन नागोंकी आज्ञा ले प्रसन्नचित्त हो नागलोकसे जानेको उद्यत हुए। तब किसी नागने कमलनयन कुरुनन्दन भीमको जलसे ऊपर उठाकर उसी वनमें (गंगातटवर्ती प्रमाणकोटिमें) रख दिया। फिर वे नाग पाण्डुपुत्र भीमके देखते-देखते अन्तर्धान हो गये ।। २६-२८ ।।
तत उत्थाय कौन्तेयो भीमसेनो महाबलः । आजगाम महाबाहुर्मातुरन्तिकमञ्जसा ।। २९ ।।
तब महाबली कुन्तीकुमार महाबाहु भीमसेन वहाँसे उठकर शीघ्र ही अपनी माताके समीप आ गये ।। २९ ।।
ततोऽभिवाद्य जननीं ज्येष्ठं भ्रातरमेव च ।
कनीयसः समाघ्राय शिरः स्वरिविमर्दनः ।। ३० ।।
तदनन्तर शत्रुमर्दन भीमने माता और बड़े भाईको प्रणाम करके स्नेहपूर्वक छोटे भाइयों का सिर सूँघा ।। ३० ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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