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#संत रामपाल जी महाराज जी
संत रामपाल जी - "कवीर वॉणी 8 प्रेम गली अति सांकरी , तामें दो न समाय। जब मैं था तब हरि नहीं , अब हरि हैं मैं नाहीं।। भावार्थः- कबीर दास जी इस दोहे में प्रेम और अहंकार (ego) के बारे में गहरा संदेश देते हैं। वे कहते हैं कि प्रेम की राह बहुत संकरी होती है, जिसमें दो चीजें एक साथ नहीं रह सकतीं   अहंकार (मैं) और भगवान (हरि) | जब तक मनुष्य के अंदर * मैं॰॰ यानी अहंकार रहता है॰ तब तक वह भगवान को प्राप्त नहीं कर सकता | लेकिन जब व्यक्ति अपने अहंकार को छोड़ देता है और विनम्र बन जाता है। "कवीर वॉणी 8 प्रेम गली अति सांकरी , तामें दो न समाय। जब मैं था तब हरि नहीं , अब हरि हैं मैं नाहीं।। भावार्थः- कबीर दास जी इस दोहे में प्रेम और अहंकार (ego) के बारे में गहरा संदेश देते हैं। वे कहते हैं कि प्रेम की राह बहुत संकरी होती है, जिसमें दो चीजें एक साथ नहीं रह सकतीं   अहंकार (मैं) और भगवान (हरि) | जब तक मनुष्य के अंदर * मैं॰॰ यानी अहंकार रहता है॰ तब तक वह भगवान को प्राप्त नहीं कर सकता | लेकिन जब व्यक्ति अपने अहंकार को छोड़ देता है और विनम्र बन जाता है। - ShareChat