sn vyas
🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏
🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏
#भाग_२५/७
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🦚 प्रारब्ध तो भोगने से ही छुटकारा मिलता है 🦚
*गतांक से आगे*
*🔥(कर्म बुद्धयानुसारिण्) 🔥*
*उसके विपरीत क्रियमाण कर्म करने में जीव स्वतंत्र होने से उसका नया क्रियमाण कर्म शुद्ध या अशुद्ध बुद्धि के अनुसरण से होता है ,,,, जितनी बुद्धि शुद्ध और सात्विक उतना नया क्रियमाण कर्म शुद्ध और सात्विक बनता है। भगवत गीता में उसको "व्यवसायात्मिका " बुद्धि कहते हैं।*
*नए क्रियमाण करने में बुद्धि के ऊपर काबू रहता है और उसमें "व्यवसाय आत्मिका" बुद्धि का जितना उपयोग होगा उतना वह अच्छा काम कर सकता।*
*किंतु जन्म जन्मांतर की कामना और वासनाओं के पुट जिसके अंतर करण के पलट पर पड़े हुए हैं वह जीव कामना और वासना के बस में हो जाता है,, और उसकी बुद्धि उसको नये गलत क्रियमाण कर्म कराती है ,,, जो भविष्य में प्रारब्ध होकर उसके सामने आते हैं ,,,*
*यह आदमी अगर अपनी कामना और भावनाओं पर ठीक काबू रखें ( जो उसके हाथ की बात है और वह काबू रखने में उसको परमात्मा ने स्वतंत्रता दी है) तो उसकी बुद्धि" व्यवसायात्मिका " याने विशुद्ध और सात्विक बने और कुकर्म करने से वह रोके और धर्म न्याय नीति से चलने में उसको मदद करें।*
*अतः इस अनुसार प्रारब्ध भोगने में "बुद्धि कर्मानुसारिणी" बुद्धि कर्म का अनुसरण करती है ,, जबकि नए क्रियमाण कर्म करने में "कर्म बुध्दयानुसारिणम् "कर्म बुद्धि के अनुसार होते हैं।*
*प्रारब्ध भोगने में जैसा कर्म वैसे ही बुद्धि होती है ,,, और क्रियमाण कर्म में जैसी बुद्धि वैसा ही कर्म होता है।*
*प्रारब्ध भोगने में बुद्धि पूर्व कृतं कर्म के कहने के अनुसार बर्तती है ,,, जबकि नए क्रियमाण कर्म बुद्धि के कहने के अनुसार बनते हैं।*
क्रमश: ✍🏽
#कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta