#❤️जीवन की सीख #☝आज का ज्ञान
राजा चंद्रपाल राजस्थान के करौली के शासक थे, लेकिन उनका मन सदैव श्रीधाम वृंदावन में रमा रहता था। वे 'नाम संकीर्तन' के इतने आश्रित थे कि शरीर से करौली में रहते हुए भी मानसिक रूप से हमेशा वृंदावन का ही अनुभव करते थे। उनकी भक्ति का सबसे मुख्य अंग 'वैष्णव सेवा' था। उन्होंने अपने राज्य में यह नियम बना रखा था कि महल से चार-चार कोस दूर तक सैनिक तैनात रहते थे, लेकिन उनके हाथों में शस्त्रों के बजाय माला, पुष्प और गुलाब जल होता था। उनका कार्य केवल यह था कि कहीं से भी कोई तिलकधारी या कंठी-माला पहने वैष्णव आता दिखे, तो उसे सम्मानपूर्वक राजा के पास आमंत्रित करें।
वैष्णव सत्कार और भाव
जब भी कोई वैष्णव राजा के महल में आता, तो राजा और रानी स्वयं उनके चरण धोते, उस चरणामृत का पान करते और पूरे नगर में छिड़कवाते थे। वे वैष्णव को अपनी राज-गद्दी पर बिठाते और स्वयं उनके सामने निर्लज्ज होकर नृत्य करते थे। विदा करते समय राजा-रानी इतने भावुक हो जाते थे कि वे बिलख-बिलख कर रोने लगते थे। राजा का मानना था कि ठाकुर जी ने हमें स्वीकार किया है या नहीं, इसका प्रमाण यही है कि हमें उनके भक्तों को देखकर हृदय में प्रेम और सम्मान का भाव जागृत हो।
परीक्षा और फूटी कौड़ी का प्रसंग
राजा चंद्रपाल की इस अटूट श्रद्धा की चर्चा सुनकर एक अन्य राजा ने उनकी परीक्षा लेनी चाही। उसने एक ऐसे व्यक्ति को भेजा जो भक्ति से विहीन था। वह व्यक्ति जब वैष्णव वेश बनाकर गया, तो चंद्रपाल ने उसे भी वही सम्मान दिया। अंत में जब उसने दक्षिणा मांगी, तो राजा ने उसे अपने खजाने से मनचाहा धन ले जाने दिया, लेकिन अंत में एक रेशमी कपड़े में लिपटी 'फूटी कौड़ी' भी दी। विद्वानों ने इसका अर्थ यह बताया कि उसे अपार धन तो इसलिए मिला क्योंकि उसने वैष्णव वेश धारण किया था, लेकिन 'फूटी कौड़ी' उस राजा की संकीर्ण मानसिकता और परीक्षा लेने के प्रयास का परिणाम थी।
तोता-मैना का उदाहरण और निष्कर्ष
बाद में जब एक वास्तविक विद्वान ब्राह्मण उस दूसरे राजा के पास चंद्रपाल के महल से लौटे, तो वे अपने साथ वहां की एक मैना (पक्षी) लेकर आए। वह मैना भी निरंतर भगवत नाम का जाप करती थी और सांसारिक चर्चा करने वालों को टोकती थी। यह देखकर वह अभिमानी राजा भी नतमस्तक हो गया और समझ गया कि जिस राजा के राज्य में पशु-पक्षी भी हरि नाम लेते हैं, वहां की भक्ति कितनी महान होगी।
🙏राधे राधे 🙏


