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#sad life #poetry #poems #feeling ##️⃣DilShayarana💘
sad life - भ्रम में हैं लोग जो आए हैं गंगा नहाने , आरती देखने , उन्हीं लोगों में एक मैं भी हूँ। फर्क बस इतना है कि उन्हें अपना भ्रम दिखता नहीं , और मैं उसे पहचानकर भी छोड़ नहीं पाती हूँ। दीयों की लौ में सब अपने अपने अंधेरे छिपाने आए हैं, मंत्रों की गूंज में अपने भीतर का शोर दबाने आए हैं। कोई मुक्ति खोज रहा है, कोई सांत्वना, और मैं अपने ही सवालों का बोझ उठाए खड़ी हूँ। कहते हैं गंगा सबका उद्धार कर देती है, पर मुझे डर लगता है उन हाथों से जो दिन भर इंसानों को बाँटते हैं को उसी गंगा के आगे सिर झुका देते हैं। और शाम मैं चंबल में डुबकी लगा लूँगी , पर गंगा में नहीं। क्योंकि चंबल ने कभी देवी कहलाने की ज़िद नहीं की, उसने कभी पाप और पुण्य का व्यापार नहीं किया।  वह बस बहती रही- अपने घावों , अपनी बदनामी और अपने सच के साथ। गंगा से मुझे शिकायत नहीं है, शिकायत तो उन चेहरों से है जो पवित्रता का मुखौटा पहनकर आते हैं, और लौटकर वही अन्याय, वही छल, वही क्रूरता ओढ़ लेते / मैं जानती हूँ कि मैली मैं भी हूँ॰ मेरे भीतर भी दोष हैं, अहंकार है, कमजोरियाँ हैं। मगर कम से कम मैं उन्हें पुण्य " का नाम देकर छिपाती नहीं। इसलिए यदि कभी लगाऊँगी , डुबकी  तो किसी नदी में नहीं, अपने भीतर उतरूँगी। क्योंकि पानी शरीर धो सकता है, आत्मा को नहीं। और जिस दिन मन सचमुच निर्मल हो जाएगा, भी दूर नहीं लगेगी।  उस दिन शायद गंगा तब तक मैं भीड में खड़ी एक और यात्री हूँ - भ्रम को ढोती हुई, अपने उसे पहचानती हुई, और उसी पहचान के दर्द के साथ जीती हुई। भ्रम में हैं लोग जो आए हैं गंगा नहाने , आरती देखने , उन्हीं लोगों में एक मैं भी हूँ। फर्क बस इतना है कि उन्हें अपना भ्रम दिखता नहीं , और मैं उसे पहचानकर भी छोड़ नहीं पाती हूँ। दीयों की लौ में सब अपने अपने अंधेरे छिपाने आए हैं, मंत्रों की गूंज में अपने भीतर का शोर दबाने आए हैं। कोई मुक्ति खोज रहा है, कोई सांत्वना, और मैं अपने ही सवालों का बोझ उठाए खड़ी हूँ। कहते हैं गंगा सबका उद्धार कर देती है, पर मुझे डर लगता है उन हाथों से जो दिन भर इंसानों को बाँटते हैं को उसी गंगा के आगे सिर झुका देते हैं। और शाम मैं चंबल में डुबकी लगा लूँगी , पर गंगा में नहीं। क्योंकि चंबल ने कभी देवी कहलाने की ज़िद नहीं की, उसने कभी पाप और पुण्य का व्यापार नहीं किया।  वह बस बहती रही- अपने घावों , अपनी बदनामी और अपने सच के साथ। गंगा से मुझे शिकायत नहीं है, शिकायत तो उन चेहरों से है जो पवित्रता का मुखौटा पहनकर आते हैं, और लौटकर वही अन्याय, वही छल, वही क्रूरता ओढ़ लेते / मैं जानती हूँ कि मैली मैं भी हूँ॰ मेरे भीतर भी दोष हैं, अहंकार है, कमजोरियाँ हैं। मगर कम से कम मैं उन्हें पुण्य " का नाम देकर छिपाती नहीं। इसलिए यदि कभी लगाऊँगी , डुबकी  तो किसी नदी में नहीं, अपने भीतर उतरूँगी। क्योंकि पानी शरीर धो सकता है, आत्मा को नहीं। और जिस दिन मन सचमुच निर्मल हो जाएगा, भी दूर नहीं लगेगी।  उस दिन शायद गंगा तब तक मैं भीड में खड़ी एक और यात्री हूँ - भ्रम को ढोती हुई, अपने उसे पहचानती हुई, और उसी पहचान के दर्द के साथ जीती हुई। - ShareChat