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#गीता #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏 प्रेरणादायक विचार
गीता - अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। fafaerg guragr aa aax 9BqqI इस विपयमें अर्थात् कर्मोंकीं सिद्धिमें अधिष्ठान१ और कर्ता तथा भिन्न-भिन्न प्रकारके करण२ एवं नाना प्रकारकी अलग-्अलग चेपष्टाएँ और वैसे ही पोँचवाँ हेतु दैवरे है Il १४ Il शरीरवाइमनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः | न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः I। मनुप्य मन, वाणी और शरीरसे शास्त्रानुकूल अथवा विपरीत जो कुछ भी कर्म करता है॰ उसके ये पोँचों कारण हैॅ Il १५ Il तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः | पश्यत्यकृतबुद्धित्वान् स पश्यति दुर्मतिः Il ಔೆತ್' परन्तु ऐसा होनेपर भी जो मनुप्य अशुद्ध होनेके कारण उस विपयमें यानो कर्मोंके केवल शुद्धस्वरूप आत्माको कर्ता समझता है, वह मलिन बुद्धिवाला अज्ञानी यथार्थ नहीं समझता II १६ I१ अधिष्ठान ' ४। १. जिसकै आश्रय कर्म किये जार्ये ठसका नाम २. जिन-जिन इन्द्रियादिकों और साधनांक द्वारा कर्म किये எர் 8 எ1 74 க'81 ३० पूर्वंकृत शुभाशुभ कर्मौके संस्कारोंका नाप ' दैव ' ४।  ४. सत्सङ्ग ओर शास्त्रके अभ्याससे तथा भगवदर्थ कर्म और কনেম  সনুষ্বন্ধী বু্তি যুভ চানী ৮, কমলিব उपासनाके जो उपयुंक्त साधनांसे रहित ऐ उसको बुरि अशुद t॰ ऐसा सपझना   चाहिये। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १८ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। fafaerg guragr aa aax 9BqqI इस विपयमें अर्थात् कर्मोंकीं सिद्धिमें अधिष्ठान१ और कर्ता तथा भिन्न-भिन्न प्रकारके करण२ एवं नाना प्रकारकी अलग-्अलग चेपष्टाएँ और वैसे ही पोँचवाँ हेतु दैवरे है Il १४ Il शरीरवाइमनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः | न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः I। मनुप्य मन, वाणी और शरीरसे शास्त्रानुकूल अथवा विपरीत जो कुछ भी कर्म करता है॰ उसके ये पोँचों कारण हैॅ Il १५ Il तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः | पश्यत्यकृतबुद्धित्वान् स पश्यति दुर्मतिः Il ಔೆತ್' परन्तु ऐसा होनेपर भी जो मनुप्य अशुद्ध होनेके कारण उस विपयमें यानो कर्मोंके केवल शुद्धस्वरूप आत्माको कर्ता समझता है, वह मलिन बुद्धिवाला अज्ञानी यथार्थ नहीं समझता II १६ I१ अधिष्ठान ' ४। १. जिसकै आश्रय कर्म किये जार्ये ठसका नाम २. जिन-जिन इन्द्रियादिकों और साधनांक द्वारा कर्म किये எர் 8 எ1 74 க'81 ३० पूर्वंकृत शुभाशुभ कर्मौके संस्कारोंका नाप ' दैव ' ४।  ४. सत्सङ्ग ओर शास्त्रके अभ्याससे तथा भगवदर्थ कर्म और কনেম  সনুষ্বন্ধী বু্তি যুভ চানী ৮, কমলিব उपासनाके जो उपयुंक्त साधनांसे रहित ऐ उसको बुरि अशुद t॰ ऐसा सपझना   चाहिये। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १८ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat