#श्रीमहाभारतकथा-4️⃣0️⃣5️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
#महाभारत
पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
कर्ण का रंगभूमि में प्रवेश तथा राज्याभिषेक...(दिन 405)
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दुर्योधन उवाच
स्वागतं ते महाबाहो दिष्ट्या प्राप्तोऽसि मानद । अहं च कुरुराज्यं च यथेष्टमुपभुज्यताम् ।। १४ ।।
दुर्योधन बोला- महाबाहो ! तुम्हारा स्वागत है। मानद! तुम यहाँ पधारे, यह हमारे लिये बड़े सौभाग्यकी बात है। मैं तथा कौरवोंका यह राज्य सब तुम्हारे हैं। तुम इनका यथेष्ट उपभोग करो ।। १४ ।।
कर्ण उवाच
कृतं सर्वमहं मन्ये सखित्वं च त्वया वृणे । द्वन्द्वयुद्धं च पार्थेन कर्तुमिच्छाम्यहं प्रभो ।। १५ ।।
कर्णने कहा- प्रभो! आपने जो कुछ कहा है, वह सब पूरा कर दिया, ऐसा मेरा विश्वास है। मैं आपके साथ मित्रता चाहता हूँ और अर्जुनके साथ मेरी द्वन्द्व-युद्ध करनेकी इच्छा है ।। १५ ।।
दुर्योधन उवाच
भुङ्क्ष्व भोगान् मया सार्थ बन्धूनां पियकृद् भव । दुर्हदां कुरु सर्वेषां मूर्ध्नि पादमरिंदम ।। १६ ।।
दुर्योधन बोला-शत्रुदमन! तुम मेरे साथ उत्तम भोग भोगो। अपने भाई-बन्धुओंका प्रिय करो और समस्त शत्रुओंके मस्तकपर पैर रखो ।। १६ ।।
वैशम्पायन उवाच
ततः क्षिप्तमिवात्मानं मत्वा पार्थोऽभ्यभाषत । कर्ण भ्रातृसमूहस्य मध्येऽचलमिव स्थितम् ।। १७ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! उस समय अर्जुनने अपने-आपको कर्णद्वारा तिरस्कृत-सा मानकर दुर्योधन आदि सौ भाइयोंके बीचमें अविचल से खड़े हुए कर्णको सम्बोधित करके कहा ।। १७ ।।
अर्जुन उवाच
अनाहूतोपसृष्टानामनाहूतोपजल्पिनाम् । ये लोकास्तान् हतः कर्ण मया त्वं प्रतिपत्स्यसे ।। १८ ।।
अर्जुन बोले-कर्ण ! बिना बुलाये आनेवालों और बिना बुलाये बोलनेवालोंको जो (निन्दनीय) लोक प्राप्त होते हैं, मेरे द्वारा मारे जानेपर तुम उन्हीं लोकोंमें जाओगे ।। १८ ।।
कर्ण उवाच
रङ्गोऽयं सर्वसामान्यः किमत्र तव फाल्गुन । वीर्यश्रेष्ठाश्च राजानो बलं धर्मोऽनुवर्तते ।। १९ ।।
कर्णने कहा-अर्जुन ! यह रंगमण्डप तो सबके लिये साधारण है, इसमें तुम्हारा क्या लगा है? जो बल और पराक्रममें श्रेष्ठ होते हैं, वे ही राजा कहलानेयोग्य हैं। धर्म भी बलका ही अनुसरण करता है ।। १९ ।।
किं क्षेपैर्दुर्बलायासैः शरैः कथय भारत ।
गुरोः समक्ष यावत् ते हराम्यद्य शिरः शरैः ।। २० ।।
भारत ! आक्षेप करना तो दुर्बलोंका प्रयास है। इससे क्या लाभ है? साहस हो तो बाणोंसे बातचीत करो। मैं आज तुम्हारे गुरुके सामने ही बाणोंद्वारा तुम्हारा सिर धड़से अलग किये देता हूँ ।। २० ।।
वैशम्पायन उवाच
ततो द्रोणाभ्यनुज्ञातः पार्थः परपुरंजयः ।
भ्रातृभिस्त्वरयाऽऽश्लिष्टो रणायोपजगाम तम् ।। २१ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन् ! तदनन्तर शत्रुओंके नगरको जीतनेवाले कुन्तीनन्दन अर्जुन आचार्य द्रोणकी आज्ञा ले तुरंत अपने भाइयोंसे गले मिलकर युद्धके लिये कर्णकी ओर बढ़े ।। २१ ।।
ततो दुर्योधनेनापि सभ्रात्रा समरोद्यतः ।
परिष्वक्तः स्थितः कर्णः प्रगृह्य सशरं धनुः ।। २२ ।।
तब भाइयोंसहित दुर्योधनने भी धनुष-बाण ले युद्धके लिये तैयार खड़े हुए कर्णका आलिंगन किया ।। २२ ।।
ततः सविद्युत्स्यनितैः सेन्द्रायुधपुरोगमैः ।
आवृतं गगनं मेधैर्बलाकापङ्क्तिहासिभिः ।। २३ ।।
उस समय बकपंक्तियोंके व्याजसे हास्यकी छटा बिखेरनेवाले बादलोंने बिजलीकी चमक, गड़गड़ाहट और इन्द्रधनुषके साथ समूचे आकाशको ढक लिया ।। २३ ।।
ततः स्नेहाद्धरिहयं दृष्ट्वा रङ्गावलोकिनम् ।
भास्करोऽप्यनयन्नाशं समीपोपगतान् घनान् ।। २४ ।।
तत्पश्चात् अर्जुनके प्रति स्नेह होनेके कारण इन्द्रको रंगभूमिका अवलोकन करते देख भगवान् सूर्यने भी अपने समीपके बादलोंको छिन्न-भिन्न कर दिया ।। २४ ।।
मेघच्छायोपगूढस्तु ततोऽदृश्यत फाल्गुनः । सूर्यातपपरिक्षिप्तः कर्णोऽपि समदृश्यत ।। २५ ।।
तब अर्जुन मेघकी छायामें छिपे हुए दिखायी देने लगे और कर्ण भी सूर्यकी प्रभासे प्रकाशित दीखने लगा ।। २५ ।।
धार्तराष्ट्रा यतः कर्णस्तस्मिन् देशो व्यवस्थिताः ।
भारद्वाजः कृपो भीष्मो यतः पार्थस्ततोऽभवन् ।। २६ ।।
धृतराष्ट्रके पुत्र जिस ओर कर्ण था, उसी ओर खड़े हुए तथा द्रोणाचार्य, कृपाचार्य और भीष्म जिधर अर्जुन थे, उस ओर खड़े थे ।। २६ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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