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#ईदुल अज़हा# कूफे़ में गूँजती है आवाज-ए कर्बला, मुस्लिमعके ख़ून से हुआ आगाज़-ए कर्बला।
ईदुल अज़हा# - कूफ़े में ईदुल अज़हा का मंज़र अजीब है इक लाश बे कफ़न है वो कितना ग़रीब है पैरों में बेड़ियाँ हैं और तन पे नहीं है सर मुस्लिमट्टबिन अक़ील का कैसा नसीब है लोगों दिल॰ए ज़हरा पे क़यामत की घड़ी है आगाज़ ए कर्बला है मुसीबत ये बड़ी है तुम ईद की खुशियों में कहीं भूल न जाना बाज़ार में मुस्लिमट्ट की अभी लाश पड़ी है कूफ़े में ईदुल अज़हा का मंज़र अजीब है इक लाश बे कफ़न है वो कितना ग़रीब है पैरों में बेड़ियाँ हैं और तन पे नहीं है सर मुस्लिमट्टबिन अक़ील का कैसा नसीब है लोगों दिल॰ए ज़हरा पे क़यामत की घड़ी है आगाज़ ए कर्बला है मुसीबत ये बड़ी है तुम ईद की खुशियों में कहीं भूल न जाना बाज़ार में मुस्लिमट्ट की अभी लाश पड़ी है - ShareChat